यशवन्त सिन्हा ने कहाकि अर्थव्यवस्था बुरे दौर में है। जयन्त सिन्हा ने कहाकि अर्थव्यवस्था अच्छे दौर में है। खैर, अर्थव्यवस्था का अच्छा-बुरा होना बाप-बेटे की राय भर से तय नहीं होने वाला। लेकिन, यह सवाल बड़ा हो गया है। नोटबन्दी का फैसला सही है क्या? उसका परिणाम अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा रहा या बुरा? इस सवाल का जवाब इतनी आसानी से तो नहीं मिलने वाला। इस सवाल का जवाब समय-समय पर मिलता रहेगा। इस सवाल का एक जवाब तब मिला, जब रिजर्व बैंक से जानकारी मिली कि बैंकों में ज्यादातर रकम वापस आ गई है। इसके आधार पर नोटबन्दी के पहले दिन से विरोधियों को मजबूत तर्क मिल गया कि नोटबन्दी पूरी तरह से असफल रही। अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार में बीती तिमाही में आई गिरावट से ये बात आम आदमी को समझाने में भी ज्यादा मुश्किल नहीं होती है। सरकार ने भी ढेर सारे आंकड़े दिए। जिसमें फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट का वो आंकड़ा भी शामिल रहा, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम सन्देह के दायरे में है। लेकिन, जिस तरह से अर्थव्यवस्था में कमजोरी के लक्षण हैं, उसमें नोटबन्दी और जीएसटी के पक्ष में बोलने वालों के लिए तर्क खोजना कठिन होता जा रहा है। लेकिन, नोटबन्दी को असफल बताने वाले एक ही सांस में दोनों बात कहते हैं कि अर्थव्यवस्था में कमजोरी आ गई है, नोटबन्दी से नौकरियां चली गई हैं। और ऐसे लोग ये भी मानने को तैयार नहीं हैं कि काले धन पर कोई चोट पहुंची है। जबकि, सच्चाई यही है कि काले धन पर, नकदी के लेन-देन पर लगी रोक की ही वजह से अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार धीमी हुई है। और, इसमें जीएसटी का आना भी एक बड़ी वजह रहा है।
जेपी मॉर्गन चेज के चेयरमैन जेमी डिमोन भारत आए हुए हैं। उनसे नोटबन्दी के फैसले के आधार पर अर्थव्यवस्था के कमजोर होने और इसके लम्बे समय में किसी अच्छे परिणाम की उम्मीद पर सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब था कि- नोटबन्दी का मूल उद्देश्य ज्यादातर लोगों के खाते खोलना और अवैध कमाई को पकड़ना था। ये दोनं ही उद्देश्य काफी हद तक पूरे हुए हैं। उन्होंने कहाकि ये बहुत साहसिक फैसला है, जो दूसरे देश इसीलिए नहीं कर सके क्योंकि, ऐसा करने में वे डरते हैं। जबकि, भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए ये बड़ा हथियार है। डिमोन का कहना है कि काला धन कैंसर की तरह है, जो सरकार, छोटे उद्योगों और आम लोगों को नुकसान पहुंचाता है।
जेपी मॉर्गन चेज के चेयरमैन जेमी डिमोन बीती तिमाही में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार में आई कमी पर कहते हैं कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। भारत ने भविष्य के लिहाज से कई अच्छे बदलाव किए हैं। एक तिमाही के नतीजे से इन बदलावों का असर नहीं दिखने वाला। लेकिन, आधार, जीएसटी और बैंकरप्सी कानून- सभी बहुत अच्छे बदलाव हैं और इनका असर बेहतर होगा।
कुछ इसी तरह की बात भारत सरकार पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में कही। दूसरी तिमाही की जीडीपी ग्रोथ पर रंगराजन का कहना है कि अर्थव्यवस्था में कमजोरी की वजह अस्थाई हैं। जीएसटी लागू होने और कुछ हद तक नोटबन्दी की वजह से अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार में गिरावट देखने को मिली है। लेकिन, अगर अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार को हम ध्यान से देखें, तो ये समझ में आता है कि पिछले साल की आखिरी तिमाही और इस साल की पहली तिमाही में तरक्की की रफ्तार 5.6% और 5.7% रही है। मुझे लगता है कि ये नीचे जा चुकी है और अब अर्थव्यवस्था में तेजी देखने को मिलेगी।
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने कहाकि इस वित्तीय वर्ष में 6.5% की तरक्की की रफ्तार हासिल करने के लिए अगली तीनों तिमाही में 7% की तरक्की जरूरी होगी। रंगराजन ने इस साल के लिए 6.5% की तरक्की की रफ्तार का अनुमान लगाया है। अर्थव्यवस्था के लिए सरकार की तरफ से किसी राहत पैकेज पर सी रंगराजन ने कहाकि निजी निवेश बढ़ाने के लिए ऐसा जरूरी हो जाता है। निजी निवेश तेजी से घटा है। जबकि, सरकारी निवेश बढ़ा है। रंगराजन ने कहाकि अगर नोटबन्दी पर अगर सरकार की तैयारी बेहतर होती, तो और बेहतर परिणाम आते। जीएसटी को बेहद अच्छा फैसला बताते हुए रंगराजन ने कहाकि जीएसटी जब भी लागू किया जाता, यही होता। शुरुआती मुश्किलें आना तय था। कर सुधारों की दिशा में इसे बहुत बड़ा सुधार बताते हुए रंगराजन ने कहाकि सरकार को इसे लागू करने में कतई देर नहीं करना चाहिए था।
सी रंगराजन की ही बात को जेमी डिमोन ने भी आगे बढ़ाया है। जेपी मॉर्गन चेज के चेयरमैन ने कहाकि भारत को एक बेहतर और मजबूत प्रधानमंत्री मिला है। 4 साल पहले की स्थिति में लोगों को निराशा हो रही थी। लेकिन, अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढेर सारे बदलाव किए हैं। और ये बदलाव अच्छे हैं। ये सरकार फैसले ले रही है और सबसे अच्छी बात, ये फैसले किसी एक समूह के लिए नहीं, सबके लिए हो रहे हैं। इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। अच्छी बात ये है कि सरकार को इस बात का अच्छे से अन्दाजा है कि नोटबन्दी और जीएसटी के एक साथ आने से अर्थव्यवस्था हिल गई है और इसको फिर से मजबूती देने के लिए राहत पैकेज लाने के संकेत हैं। लेकिन, कुल मिलाकर भारत के दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों को सुनते इतना तो पक्के तौर पर समझा आ रहा है कि सरकार के फैसले और उन फैसलों के असर से अर्थव्यवस्था इतनी भी खराब नहीं हुई है, जितना कहा जा रहा है। सी रंगराजन की ये बात अर्थव्यवस्था की बेहतरी की आशा जगाती है कि अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार सबसे निचले स्तर पर जा चुकी, अब यहां से बेहतर ही होगी।