बिहार में जिस तरह से नीतीश कुमार ने पाला बदला है। उससे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की हवा निकल गई है। अब बड़ा सावल ये है कि क्या लालू प्रसाद यादव अब भी उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनाव के लिए मायावती, अखिलेश और कांग्रेस को एक साथ लाने की अपनी रणनीति बढ़ा पाएंगे। क्योंकि, अब तो वो प्रयोग बिहार में ही विफल हो चुका है। ऐसे लग रहा है जैसे अमित शाह ने विपक्ष का खेल शुरू होने से पहले ही मैदान मार लिया। ये सब चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि, राज्यसभा से मायावती ने जिस नाटकीय अन्दाज में इस्तीफा दिया, उससे एक बात तो साफ थी कि ये इस्तीफा भावावेश में आकर नहीं दिया गया है। सीबीआई के शिकन्जे में फंसते लालू प्रसाद यादव के बयानों से पहले ही मायावती का इस्तीफा, कमजोर विपक्ष को नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ाई का एक आधार देने के तौर पर देखा जा रहा था। अचानक खबर आ गई कि विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए लालू प्रसाद यादव बिहार से राष्ट्रीय जनता दल के कोटे से मयावती को राज्यसभा में भेजेंगे। लेकिन, सवाल ये कि जब मायावती को फिर से राज्यसभा में आना ही था, तो अप्रैल 2018 तक राज्यसभा में ही रहकर क्यों नहीं उच्च सदन में विपक्षी एकता को मजबूत करती। इसी के बाद एक नई रणनीति सामने आ गई। वो नई रणनीति ये है कि मायावती इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा सीट से संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा का उपचुनाव लड़ें। संयुक्त विपक्ष मतलब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ बीएसपी। ये वो समीकरण है, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय नहीं बन पाया था। अब लालू प्रसाद यादव कह रहे हैं कि अखिलेश यादव और मायावती को साथ लाने की उनकी कोशिश काफी हद तक सफल हो रही है, इसीलिए नरेंद्र मोदी उनके पीछ सीबीआई, ईडी को लगाए हुए हैं।
इस नई रणनीति से उत्तर प्रदेश में जीत की उम्मीद के साथ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनावी अति आत्मविश्वास को भी थोड़ा कमजोर करने पर विपक्ष काम कर रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 39।7% मत मिले हैं। मत प्रतिशत के लिहाज से दूसरे स्थान पर रही बीएसपी को 22।2%, तीसरे स्थान पर रही समाजवादी पार्टी को 21।8% और चौथे स्थान पर रही कांग्रेस को 6।2% मत मिले हैं। सामान्य गणित लगाएं, तो पहले स्थान पर रही बीजेपी के सामने दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रही बीएसपी, एसपी और कांग्रेस के मत जोड़ देने भर से बीजेपी बुरी तरह हार जाएगी। इस गणित के लिहाज से बीजेपी का विधानसभा चुनाव में मत 39।7% और बीएसपी, एसपी और कांग्रेस का संयुक्त मत प्रतिशत हो गया 50।2%। भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्री गैर विधायक बनाकर विपक्ष को अपनी इस संयुक्त ताकत का अहसास करने का मौका भी दिया है। इसी मौके को परिणाम में बदलने के लिए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की लोकसभा सीट फूलपुर से मायावती संयुक्त विपक्ष की प्रत्याशी हो सकती हैं।
क्या विपक्ष के एकजुट होकर मायावती को लोकसभा उपचुनाव लड़ाने के इरादे से बीजेपी डर गई है? ऊपर के आंकड़े के लिहाज से जवाब आएगा- बीजेपी को डरना भी चाहिए। क्योंकि, विधानसभा चुनाव 2017 में 39।7% के मुकाबले 50।2% का मत प्रतिशत डराने के लिए काफी है। लेकिन, फूलपुर लोकसभा सीट पर आंकड़े जरा हटकर हैं। इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा सीट से चुनकर केशव प्रसाद मौर्या आए हैं और अब उपमुख्यमंत्री बनने की वजह से उनका विधानसभा में पहुंचना जरूरी है। केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा चुनाव अपनी लोकसभा सीट की 5 सीटों में से कहीं से लड़ेंगे या फिर कहीं और से, ये भारतीय जनता पार्टी तय करेगी। लेकिन, उससे पहले संयुक्त विपक्ष के तौर पर मायावती के फूलपुर से लड़ने और इस डर से केशव प्रसाद को केंद्र में भेजने के गणित को सुलझाने की कोशिश करते हैं। इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा सीट से पहली बार भारतीय जनता पार्टी जीती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य को फूलपुर में 5 लाख 3 हजार 564 मत मिले थे। मत प्रतिशत के लिहाज से ये कुल पड़े मतों का 52।43% है। दूसरे स्थान पर रहे समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को 1 लाख 95 हजार 256 मत मिले। समाजवादी पार्टी का मत प्रतिशत रहा 20।33%। तीसरे स्थान पर 1 लाख 63 हजार 710 मतों के साथ बहुजन समाज पार्टी के कपिलमुनि करवरिया रहे, उनका मत प्रतिशत रहा 17।05%। चौथे स्थान पर 58 हजार 127 मतों के साथ कांग्रेस के मोहम्मद कैफ रहे। कांग्रेस प्रत्याशी को 6।05% मत मिले। इन तीनों पार्टियों का कुल मत प्रतिशत 43।43% ही रहा। इस गणितीय आधार पर भी भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी आसानी से उपचुनाव जीत जाएगा। अब संयुक्त विपक्ष की परिकल्पना को और बड़ा करते हैं। यहां से 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी भी चुनाव लड़ी। 7384 मत मिले, मत प्रतिशत रहा 0।77%। इस गणित के आधार पर भी विपक्ष बीजेपी के सामने कहीं खड़ा नहीं होता।
इसलिए मायावती के संयुक्त विपक्ष प्रत्याशी होने भर से नरेंद्र मोदी और अमित शाह केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री से फिर केंद्र की राजनीति में ले आएंगे। ये ख्याली पुलाव ज्यादा लगता है। दूसरी बात ये भी है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ संत हैं। लेकिन, जिस तरह से योगी को ठाकुर नेता के तौर पर विपक्ष प्रचारित कर रहा है, उसमें एक पिछड़े मजबूत उप मुख्यमंत्री को राज्य से हटाना हर तरह से बीजेपी की ताजा रणनीति के खिलाफ दिखता है। क्योंकि, दूसरे उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा भी ब्राह्मण हैं। इसलिए किसी भी आधार पर, सिर्फ मायावती के संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी होने से बीजेपी केशव प्रसाद मौर्य को लेकर अपनी रणनीति बदलती नहीं दिख रही है। होने को तो राजनीति में कुछ भी हो सकता है।

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