दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर 20 नवम्बर 2017

त्रिपुरा के नौजवान पत्रकार शान्तनु भौमिक की हत्या के 2 महीने बीत गए हैं। लेकिन, शान्तनु की हत्या के अपराधियों को अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है। शान्तनु त्रिपुरा की जनजातीय पार्टी आईपीएफटी के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे थे। उस दौरान सीपीएम और आईपीएफटी के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई। पुलिस ने उस इलाके में धारा 144 लगा रखा था। धारा 144 लगे होने के बावजूद और उस इलाके में पुलिस के भारी बन्दोबस्त के बाद भी शान्तनु की जिस तरह से हत्या हुई, उससे माणिक सरकार पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यहां तक कि शान्तनु के पिता और वहां के मीडिया संगठनों ने भी माणिक सरकार से मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। लेकिन, त्रिपुरा की वामपन्थी सरकार पत्रकार की हत्या के मामले को सीबीआई को देने से इनकार कर रही है। राज्य सरकार ने सीबीआई जांच की मांग के बाद एसआईटी का गठन किया है लेकिन, अभी तक शान्तनु की हत्या के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है। शान्तनु वामपन्थी विचार से जुड़ा हुआ पत्रकार था और स्थानीय चैनल दिनरात के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। शान्तनु की हत्या को मुद्दा बनाते हुए सीपीएम नेताओं ने शान्तनु की हत्या का दोष वहां की जनजातीय पार्टी आईपीएफटी पर डाला था और इससे बीजेपी को जोड़ने की कोशिश की थी। सीपीएम महासचिवव सीताराम येचुरी से लेकर बृंदा करात ने पत्रकार शान्तनु भौमिक की हत्या को सीधे भाजपा से जोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि आखिर बरसों से त्रिपुरा में राज कर रही वामपन्थी सरकार एक नौजवान पत्रकार की हत्या के मामले को सीबीआई से देने से क्यों बच रही है। जबकि, त्रिपुरा के 9 पत्रकार संगठनों ने भी राज्य सरकार पर अविश्वास करते हुए भौमिक की हत्या की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रही है।

त्रिपुरा में हो रही राजनीतिक हत्याओं पर भारतीय जनता पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडलल त्रिपुरा गया था। उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्य दमोह के सांसद प्रहलाद पटेल ने एक चौंकाने वाली बात बताई। उन्होंने बताया कि शान्तनु भौमिक के पिता ने कहाकि सीपीएम के किसी नेता ने शान्तनु को फोन करके वहां बुलाया था। इलाके में धारा 144 लगी होने की वजह से मीडिया के लोगों को भी वहां जाने की इजाजत पुलिस नहीं दे रही थी। फिर शान्तनु को वहां जाने की इजाजत क्यों दी गई और शान्तनु को पुलिस के इतने भारी बंदोबस्त में भी बचाया क्यों नहीं जा सका। प्रहलाद पटेल और शान्तनु भौमिक के पिता के आरोप से त्रिपुरा की माणिक सरकार पर सन्देह गहराता है। दरअसल, त्रिपुरा की चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में कम ही होती है और होती भी है, तो बस यही खबरें चलती हैं कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार बेहद सादगी पसन्द हैं। उनके साधारण व्यक्ति की तरह रहने की चर्चाओं में वहां की कानून व्यवस्था और दूसरे जरूरी मुद्दे दब जाते हैं। कांग्रेस विधायक रतन लाल नाथ के एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने बताया की इस साल के पहले 10 महीने में अप्राकृतिक मौत के 1148 मामले दर्ज हुए हैं, मतलब हर रोज करीब 3 मौतें त्रिपुरा में हुई हैं। मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने यह भी बताया कि राज्य में 119 महिला अपहरण और 207 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। मुख्यमंत्री माणिक सरकार के दिए यह आंकड़े राज्य की कानून व्यवस्था की कितनी गम्भीर स्थिति को बता रहे हैं, इसका अन्दाजा लगाने के लिए राज्य के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक गुप्ता की एक प्रेस कांफ्रेंस में कही बात सुनना चाहिए। न्यायाधीश दीपक गुप्ता ने कहाकि, राज्य में एफआईआर ही बहुत कम लिखा जाता है। पुलिस को लोगों की शिकायतें दर्ज करना चाहिए। उन्होंने कहाकि हिमाचल प्रदेश भी एक छोटा राज्य है लेकिन, त्रिपुरा में हिमाचल से दस गुना ज्यादा हत्याएं और महिलाओं के खिलाफ अपराध हो रहे हैं। इस पर मीडिया के लोगों को शोध करना चाहिए।

त्रिपुरा के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक गुप्ता की बात को आगे बढ़ाते हुए भारतीय जनता पार्टी और दूसरी विरोधी पार्टियां माणिक सरकार पर लगातार यह आरोप लगाती रही हैं कि राज्य सरकार के इशारे पर बंगाल और केरल की तरह त्रिपुरा में भी राजनीतिक हत्याएं सामान्य बात है। विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं की हत्या और उनके दफ्तरों को जला देने की बहुतायत घटनाएं होती हैं। बीजेपी का आरोप है कि पिछले कुछ सालों में उनके करीब 450 कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्या हुई है और सैकड़ों दफ्तरों को जला दिया गया। सीपीएम पर राजनीतिक हत्याओं का लाभ लेने का आरोप लगता रहा है। शान्तनु भौमिक के हत्यारे अभी तक नहीं पकड़े गए हैं। और, भौमिक की हत्या के बाद हालात का जायजा लेने दिल्ली से आए एक पत्रकार के टैक्सी ड्राइवर जीबन देबनाथ की लाश कई दिन बाद पुलिस को मिली। शान्तनु की हत्या के 7 दिन बाद 27 सितम्बर को 19 साल की एक युवती प्रियंका रियांग की दुर्गापूजा के दौरान मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने प्रियंका की मौत को दुर्घटना करार दिया। लेकिन, पुलिस यह नहीं बता पा रही है कि दुर्घटना में अगर मौत हुई, तो युवती के शरीर पर कपड़े क्यों नहीं थे। 13 अक्टूबर को एक और छात्रा सुप्रिया मोग मरी हुई पाई गई। सुप्रिया सीपीएम से जुड़े एक एनजीओ प्रयास में कोचिंग कर रही थी। यह कोचिंग संस्थान रेजिडेंशियल है। पुलिस, सुप्रिया की मौत की वजह आत्महत्या बता रही है। जुलाई महीने की 19 तारीख को एक रैली की अगुवाई करने वाले शिक्षक निशिकांत चकमा की हत्या का आरोप भी सीपीएम कार्यकर्ताओं पर है।
अगले साल त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होना है। आईपीएफटी का आरोप है कि माणिक की अगुवाई वाली वामपन्थी सरकार विधानसभा चुनावों से पहले आईपीएफटी पर भौमिक की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाकर उसकी साख को चोट पहुंचाना चाहती है। क्योंकि, सीपीएम के समर्थन वाले जनजातीय समूह को छोड़कर हजारों लोग आईपीएफटी के सदस्य बन गए हैं। सीपीआए और आईपीएफटी एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। लेकिन, एक बात जो माणिक सरकार पर सन्देह खड़ा करती है कि त्रिपुरा जर्नलिस्ट एसोसिएशन सहित 9 पत्रकार संगठनों की सीबीआई जांच की मांग क्यों राज्य सरकार नहीं मान रही है। राज्य की पुलिस ने शान्तनु की हत्या के तुरन्त बाद आईपीएफटी से जुड़े कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया था। लेकिन, अभी तक शान्तनु के असली हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं।

यह सन्देह इसलिए भी गहरा जाता है कि सीपीएम और उससे जुड़े बुद्धिजीवियों ने शान्तनु की हत्या को भी बीजेपी के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जबकि, आईपीएफटी और भाजपा शान्तनु और ऐसी ढेर सारी सन्देहास्पद परिस्थितियों में हुई मौतों की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी के त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है, जहां उसे ढेर सारी उम्मीदें दिख रही हैं। माणिक सरकार 1998 से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। उनकी सादगी वाली छवि को वामपन्थी दल हमेशा अपना चेहरा बनाकर चलता रहा है। लेकिन, इस बार चुनावों से पहले बीजेपी ने माणिक सरकार के राज में राजनीतिक हत्याओं और महिला अपराधों को मुद्दा बनाने की कोशिश की है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बंगाल और केरल के साथ त्रिपुरा को लेकर भी काफी आक्रामक हैं। त्रिपुरा के पूर्व मुख्य न्यायाधीश का राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करना बीजेपी और विपक्षी पार्टियों को आरोप को मजबूती देता है। ऐसे में पत्रकार शान्तनु की हत्या अगले साल होने विधानसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है।


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