प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी संसदीय दल की बैठक की यह तस्वीर साझा की है। इसमें आडवाणी जी हैं लेकिन, दिखते नहीं हैं। भारतीय राजनीति में भी आडवाणी वैसे ही हो चले हैं। ऐसे कि, किसी को आडवाणी कह दीजिए तो, गाली जैसा मान बैठता है। लेकिन, इसकी गलती नरेंद्र मोदी या अमित शाह के सिर मढ़ देना उचित नहीं होगा। मोदी-शाह आडवाणी को जानते हैं, इसलिए ये सोचना कि, उन्हें राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाया ? लेकिन, क्या आडवाणी खुद को नहीं जान पा रहे। वे लालकृष्ण आडवाणी हैं, क्यों भूल गए हैं। क्या सिर्फ मोदी-शाह से सार्वजनिक तौर पर पैर छुआना ही उनके जीवन का आखिरी उद्देश्य हो गया है? दुर्भाग्य, आडवाणी और भारतीय राजनीति का कि, वे भूल गए कि भारतीय राजनीति के गैर-कांग्रेस बुनियाद के वे कितने बड़े नायक हैं। भूल गए हैं कि, वे चाहते तो, अटल जी के खिलाफ प्रधानमंत्री के मजबूत दावेदार हो सकते थे। आडवाणी को कौन याद दिलाएगा कि सत्ता के शीर्ष पर वे रहे हैं। अब जरूरत इस बात की है कि, समाज के शीर्ष पर जा बैठें। संसदीय राजनीति छोड़कर देश में अच्छा-बुरा बताने का काम वे कर सकते हैं। वे भारत निर्माण काम कर सकते हैं, ऐसा भी क्या मोह कि, वे संसद सदस्यता न छोड़ पा रहे। ऐसे मोही आडवाणी को देखकर लगता है कि, अच्छा ही हुआ वे राष्ट्रपति न बने।