हिन्दुस्तान के हर हिस्से के पास अपना स्थानीय इतना खूबसूरत, इतना समृद्ध है कि, उसी से इलाके को समृद्ध किया जा सकता है। स्थानीय क्षमताओं के भरोसे बहुत कुछ हो सकता है। रण उत्सव में अपना यह भरोसा फिर से पक्का हुआ है कि, हिन्दुस्तान का हर कोना अपने में इतना समेटे है कि, उसी से उसकी समृद्धि हासिल की जा सकती है। स्थानीय कलाओं को संरक्षित रखने कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए हर इलाक़े में ऐसे सैकड़ों-हज़ारों रण उत्सव की जरूरत है। लोगों के रोजगार की मुश्किल और शहरों पर बढ़ते दबाव को भी इससे कम किया जा सकता है और यह आसानी से किया जा सकता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हो भी रहा है। माघमेला हर साल प्रयाग में संगम की रेती पर लगता है, बिना बुलावे का मेला। अब समय बदला है, बुलावे वाले मेले खूब लगने चाहिए।


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