बार-बार ये पूछा जाता है कि आखिर किसान को उसकी उपज की सही कीमत कैसे मिल सकती है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर छोटा सा किसान तक इसी का जवाब खोजने में पूरी ताकत लगा रहा है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो बाकायदा 5 साल में किसानों की आमदनी दोगुना करने का लक्ष्य तय कर दिया। राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के जरिये पूरे देश की मन्डियों को एक मन्डी में बदलने की योजना पर भी तेजी से काम हो रहा है। लेकिन, इस सबके बावजूद किसान के हाथ बहुत कुछ नहीं आ रहा है। इसमें एक तो किसानी को हीन बना दिया गया। दूसरा गांवों के सामाजिक तंत्र की जाति वाली बुराई को ऐसा कर दिया गया कि अब जाति से जुड़ा सारा रोजगार शहर की फैक्ट्रियों में आ गया और गांव से जाति की जकड़न तोड़ने के लिए शहर आकर मजदूर बन गया।
अभी पिछले दिनों महीने का सामान लेने बिग बाजार गया, तो देखा कि लाई बिक रही है बिग बाज़ार में। लाई नहीं लिखा था। मुरमुरा लिखा था। अब सोचिए बाक़ायदा इसकी फैक्ट्री लगी होगी। मशीन में चावल डालकर मशीन में से लाई/मुरमुरा निकाल लिया। पैक किया और बेच दिया। लेकिन सोचिए कि यहाँ ये मशीन किसी उद्योगपति/कम्पनी की होगी और जो गाँव में आधा चावल लेकर आधा भूनकर दे देता था, वो इसीलिए गाँव छोड़कर चला आया होगा कि ये भी कोई काम है। बच्चों को ये नहीं करने देना है। जबकि, तकनीक की मदद से गाँव में भी ये काम आसानी से हो सकता है। किसान ये काम करे, तो और बेहतर। बस मार्केटिंग के लिए शहर आ जाए। लेकिन, न तो किसान ये करने जा रहा है और न ही वो कलवार जो आधा चावल लेकर आधा ही देता था। जाति और किसानी को हीन मानते दोनों ही अब शहर में आकर 40 रुपए का 200 ग्राम लाई खरीदकर खा रहे हैं। चमड़े के जूते के कारोबार में भी ऐसा ही है और जाने कितने पारम्परिक कामों में उद्योगपतियों की मशीनों के सामने मालिक मजदूर बनकर खड़ा रह गया है। भारत में जितने भी ब्रान्डेड चमड़े के सामान- जूते, बैग, पर्स और जाने क्या-क्या- बनते हैं, वो सब कहीं किसी के हाथ का हुनर ही होता है।

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