9 सितम्बर 2017 दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर

गौरी लंकेश को कर्नाटक सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम विदाई दी। गौरी लंकेश को राजकीय सम्मान दिया गया और सलामी दी गई। इस तरह की विदाई आमतौर पर शहीद को दी जाती है। भारतीय इतिहास में किसी पत्रकार को हत्या के बाद इस तरह का सम्मान दिया गया हो, ऐसा कोई उदाहरण ध्यान में नहीं आता है। गौरी लंकेश की हत्या के बाद जिस तरह से पहला कड़ा सवाल राज्य सरकार से होना चाहिए था, उससे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पहले ही मुक्ति मिल गई। वजह ये कि घनघोर वामपन्थी कार्यकर्ता गौरी लंकेश हिन्दुत्व के खिलाफ, दक्षिणपन्थ के खिलाफ लिखती रहती थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घनघोर आलोचक थीं। बस इतने भर से ही आसानी से कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार को लेफ्ट और लेफ्ट लिबरल विचारकों ने पहले ही क्लीनचिट दे दी।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पत्रकारों को बताया कि गौरी लंकेश का निधन कर्नाटक के लिए और निजी तौर पर उनके लिए कितना बड़ा नुकसान है। सिद्धारमैया ने कहाकि एक प्रगतिशील आवाज चली गई और उनके लिए एक दोस्त का जाना है। और उस दोस्त को राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम विदाई दी गई। ये सचमुच देश को नहीं, तो कम से कम कर्नाटक राज्य की जनता को जानना चाहिए कि आखिर गौरी लंकेश की अन्तिम विदाई राजकीय सम्मान के साथ क्यों की गई। सिर्फ इसलिए कि जल्दी ही कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होना है और उससे पहले एक वामपन्थी पत्रकार की हत्या में दक्षिणपन्थियों को कठघरे में खड़ा कर देना है। सिर्फ इसलिए कि राज्य में कहीं फिर से भारतीय जनता पार्टी की सरकार न आ जाए। इस तरह की शातिर राजनीति कांग्रेस ही कर सकती है। कमाल की बात ये है कि गौरी का दोस्त होने का दावा करने के बावजूद गौरी का परिवार सिद्धारमैया की सरकार पर भरोसा नहीं कर रहा।
गौरी के भाई इंद्रेश ने साफ कहाकि कलबुर्गी के मामले में जिस तरह से राज्य सरकार की जांच एजेन्सियां किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकीं, उससे उनका राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। सीआईडी की एक जांच रिपोर्ट के हवाले से मीडिया में ये खबरें छपीं थीं कि कलबुर्गी की हत्या की वजह सम्पत्ति विवाद भी हो सकती है। हालांकि, ये मीडिया रिपोर्ट अधिकारिक तौर पर सामने नहीं आई। गौरी लंकेश के भाई का साफ कहना है कि सीसीटीवी की फुटेज से सब एकदम साफ हो जाएगा। लेकिन, उस रिपोर्ट के आने से पहले ही दक्षिणपन्थी, हिन्दुत्ववादी ताकतों को गौरी का हत्यारा साबित करने की कोशिश की गई। इसके बावजूद कि खुद कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा है कि इसमें नक्सलियों के शामिल होने की भी हम जांच कर रहे हैं। गृह मंत्री रामलिंगा रेड्डी कह रहे हैं कि हमने सबूत इकट्ठा किया है, तब तक का इन्तजार कीजिए। लेकिन, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इन्तजार करने को तैयार नहीं हैं। राहुल गांधी ने गौरी लंकेश की हत्या पर बयान दिया है कि जो भी संघ-भाजपा की विचारधार के खिलाफ है, उसके ऊपर दबाव है और उसकी हत्या कर दी जा रही है।
राहुल गांधी ने इस हत्या में संघ-भाजपा को जोड़ने की कोशिश की है। जबकि, अभी तक कोई भी सबूत किसी के पक्ष या खिलाफ में नहीं गए हैं। और जब राहुल गांधी ने सीधे संघ-भाजपा को घसीट ही लिया, तो सिद्धारमैया क्यों पीछे रहते। उन्होंने कहाकि, कलबुर्गी, पन्सारे और दाभोलकर की हत्या जैसा हथियार ही गौरी लंकेश की हत्या में भी इस्तेमाल किया गया है। ये कहकर सिद्धारमैया उसी सिद्धान्त को हवा देते रहने की कोशिश को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जिसके आधार पर कलबुर्गी, पन्सारे और दाभोलकर के हिन्दू विरोधी होने के आधार पर दक्षिणपन्थी ताकतों की वजह से हुई हत्या साबित किया जा सके। लेकिन, ये सम्भव नहीं है। वैसे, भी सिद्धारमैया इस बात में ज्यादा व्यस्त हैं कि कैसे लिंगायत को हिन्दू से निकालकर अलग धर्म बनवा दिया जाए। वो इसमें भी व्यस्त हैं कि कैसे कर्नाटक को देश के खांचे से बाहर निकाला जाए। इसके लिए वो कन्नड़ और हिन्दी की लड़ाई में राज्य की जनता को व्यस्त रखे हुए हैं। सवाल ये है कि कम से कम अपने राज्य में हुई हत्या के अपराधी को सिद्धारमैया और दूसरी कांग्रेस सरकारें खोजतीं और साबित करते कि हत्या किसने की। लेकिन, ये कांग्रेस की राजनीति में फिट नहीं बैठता है। कांग्रेस की राजनीति में सन्देह बना रहे, ये श्रेष्ठ स्थिति है। उसका उदाहरण देखिए। एम एम कलबुर्गी की हत्या कांग्रेस के राज में 30 अगस्त 2015 को हुई, अभी तक हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं। पुणे में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कांग्रेस के राज में 20 अगस्त 2013 को हुई, उसमें भी कुछ पता नहीं चला। नरेंद्र दाभोलकर अंधविश्वास निर्मूलन के काम में लगे हुए थे, इसलिए मान लिया गया कि संघ और भाजपा सिर्फ इसी बात पर नरेंद्र दोभालकर की विरोधी थी। जनवरी 2014 में यूपीए की सरकार ने नरेंद्र दाभोलकर को मरणोपरान्त पद्मश्री पुरस्कार दिया। 67 साल में दाभोलकर की हत्या होने के बाद ही कांग्रेस सरकार को ये लगा कि अब उन्हें पद्मश्री दिया जाना चाहिए। उसके तुरन्त बाद लोकसभा के चुनाव थे और अभी जब गौरी लंकेश की राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई, तो भी चुनावी राजनीति ही नजर आती है।
हिन्दू परम्परा और हिन्दू अन्धविश्वास को एक साथ जोड़कर लम्बे समय से लिबरल और लेफ्ट लिबरल बुद्धिजीवियों अपनी बात साबित करने की कोशिश करते रहे हैं और इसके हवा देने का काम कांग्रेस करती है। सन्देह की स्थिति बनाए रखने का काम कांग्रेस करती है। और इसकी शुरुआत आजादी के तुरन्त बाद हुई महात्मा गांधी की हत्या के साथ ही हो गई थी। महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की। और शर्मनाक कृत्य के लिए संघ ने खुलतौर गोडसे को हत्यारा कहा। लेकिन, संघ के खिलाफ कांग्रेस को ये सबसे बड़ा हथियार मिल गया। क्योंकि, गोडसे को भी लगता था कि महात्मा गांधी हिन्दू हितों के खिलाफ जा रहे हैं। बस इसी आधार पर संघ को गांधी की हत्या के साथ जोड़ दिया गया। अभी भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उस मामले पर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान एक रैली में कहा था कि आरएसएस के लोगों ने गांधी को मारा। बाद में अदालत में राहुल गांधी ने कहाकि आरएसएस की विचारधारा ने गांधी को मारा। कांग्रेस का ये बहुत पुराना तरीका है। बार-बार संघ और भाजपा के ऊपर भले ये आरोप लगता रहा है कि संघ परिवार विभाजन की राजनीति करता है। लेकिन, जिस तरह के विभाजन और भावनाओं को भड़काकर वोट बटोरने की राजनीति करने की राजनीति कांग्रेस करती है, उसके सामने सब फेल हो जाते हैं। नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पन्सारे और एम एम कलबुर्गी के बाद गौरी लंकेश की हत्या पर कांग्रेस हत्यारों को नहीं पकड़ना चाहती और न ही न्याया दिलाना चाहती है। वो दरअसल इसी बहाने संघ, भाजपा और मोदी को सन्देह के दायरे में बांध देना चाहती है।


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