दैनिक जागरण 1 नवम्बर

इस बात की चर्चा जब भी होती है कि कांग्रेस इस तरह से देश से क्यों गायब होती गई, तो उसमें ढेर सारी वजहों के ऊपर एक सबसे बड़ी वजह कोई भी बता देगा कि कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। कांग्रेस एक परिवार की पार्टी बन गई, यही कांग्रेस पार्टी के रसातल में जाने की सबसे बड़ी वजह के तौर पर चिन्हित कर दिया जाता है। और, काफी हद तक यह सच भी है। इसीलिए जब भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में पत्रकारों के साथ दीपावली मंगल मिलन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्रकारों से राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र का अध्ययन करने को कहा, तो मुझे साफ दिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किस ओर इशारा कर रहे हैं। हो सकता है कि गुजरात चुनाव के दौरान ही राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया जाए। राहुल गांधी जिस जोश से गुजरात में चुनाव प्रचार कर रहे हैं, उससे कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर मन बनाकर बैठने का राहुल गांधी का पक्का फैसला दिखता है। राहुल गांधी के इसी मन बनाकर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के फैसले पर ही नरेंद्र मोदी सीधी चोट करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस को परिवारवादी पार्टी कहने वाले मोदी पहले कांग्रेस विरोधी नेता हैं। लेकिन, सत्ता के शिखर पर आसीन होने संभवत: पहले नेता होंगे, जो कांग्रेस के परिवारवादी होने को जनता को ठीक से याद दिलाए रखना चाहते हैं। इसीलिए, इस बात को अमित शाह भी खूब प्रचारित करते हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनके बाद भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा। मणिशंकर अय्यर जैसे लोग जब ये कहते हैं कि कांग्रेस में सिर्फ सोनिया या राहुल गांधी ही अध्यक्ष का चुनाव लड़ सकते हैं, तो दरअसल जाने-अनजाने अय्यर, मोदी-शाह की बात को ही मजबूती दे रहे होते हैं।

1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। और संयोग देखिए कि 1978 में इंदिरा गांधी दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन होती हैं। दिल्ली में हुए विशेष अधिवेशन में इंदिरा गांधी पहली बार 1959 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं थीं। उसके बाद 1960, 61, 62 और 63 में हुए अधिवेशनों में नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1964 में के कामराज को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी मिली, तो 1967 तक वही उस कुर्सी पर काबिज रहे। 1968, 69 में कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी निजलिंगप्पा के पास रही। और, 1970,71 में इस कुर्सी पर जगजीवन राम आसीन हुए। जगजीवन राम से कांग्रेस अध्यक्ष का ताज शंकर दयाल शर्मा के पास 1974 तक रहा। 1975 में इंदिरा गांधी के नजदीकी देवकांत बरुआ ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला, 1977 तक वे इस कुर्सी पर बने रहे। 1978 में इंदिरा गांधी दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं और फिर अपने जीते जी उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद पर किसी और को आसीन नहीं होने दिया।

1959 से 1978 के कांग्रेस अधिवेशनों में कांग्रेस अध्यक्ष का चेहरा बदलते रहने से कार्यकर्ताओं को पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अहसास होता रहा, ये कहा जा सकता है। 1959 में पहली बार इंदिरा गांधी के अध्यक्ष बनने और दूसरी बार 1978 में दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बीच भले सत्ता गांधी परिवार के ही पास रही हो लेकिन, पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करना कठिन हो जाता है। लेकिन, जब 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लगातार बदलते रहे और पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का अहसास कराते रहे। उस दौरान कांग्रेस में कहने को भी आंतरिक लोकतंत्र बड़ी मुश्किल से बचा दिखता है। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि 1978 में इंदिरा गांधी जब दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, तब से लेकर आज तक कांग्रेस के सिर्फ 5 राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए हैं। पूरी 39 साल में सिर्फ 5 राष्ट्रीय अध्यक्ष और उसे थोड़ा और विस्तार दें, तो 1978 से 84 तक इंदिरा गांधी, 1985-91 तक राजीव गांधी और 1998 से आज तक सोनिया गांधी। यानी 5 में से भी ज्यादातर समय अध्यक्ष रहने वाले 3 परिवार के ही। बीच के वर्षों में 1992-96 तक पी वी नरसिंहाराव और 1996-98 तक सीताराम केसरी राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। और, अब फिर से 2017 में राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी तय माना जा रहा है।

अब 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को अध्यक्ष के पैमाने पर आंक लेते हैं। 1980 में पार्टी बनी तो पहले अध्यक्ष बने अटल बिहारी बाजपेयी, उसके बाद 1986 में लालकृष्ण आडवाणी, 1991 में मुरली मनोहर जोशी, 1993 में फिर से लालकृष्ण आडवाणी, 1998 में कुशाभाऊ ठाकरे, 2000 में बंगारू लक्ष्मण, 2001 में जना कृष्णमूर्ति, 2002 में वेंकैया नायडू, 2004 में लालकृष्ण आडवाणी तीसरी बार, 2005 में राजनाथ सिंह, 2010 में नितिन गडकरी, 2013 में दोबारा राजनाथ सिंह और 2014 से अभी तक अमित शाह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

1978 में इंदिरा गांधी के दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनने के 2 साल बाद बनी बीजेपी में 1980 से लेकर 2017 तक यानी 37 साल में 9 अलग-अलग लोग राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। इसमें से सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके पास 3 बार में करीब 10 साल बीजेपी के अध्यक्ष का पद रहा। शायद यही वजह रही कि तीसरी बार जब लालकृष्ण आडवाणी 2004 में अध्यक्ष बने, तो पार्टी में जान नहीं फूंक पाए। उस समय बीजेपी में खत्म होते आंतरिक लोकतंत्र को बीजेपी का कार्यकर्ता ही नहीं पचा पा रहा था। अब जब ये बात जोर-शोर से मान ली गई है कि मोदी-शाह की जोड़ी ही बीजेपी है और बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र बीते जमाने की बात हो गई है। उसी दौर में सर्वशक्तिमान दिखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं कि मुझे नहीं पता कि मेरे बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा और उसी समय मोदी-शाह के मुकाबले खड़े होते राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी से कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी लेते दिख रहे हैं। मां से बेटे के हाथ में जाती कांग्रेस लोकतंत्र में इतने भर से ही कितनी कमजोर हो जाती है, दुर्भाग्य है कि इसका अहसास कांग्रेस को अभी भी नहीं हो पा रहा है।
(यह लेख NewsLaundryHindi पर छपा है)


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