बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मैं भी पटना और उससे सटे इलाकों में था। बिहार के लगभग हर इलाके के लोगों से बातचीत होती थी। संयोगवश सबसे ज्यादा बातचीत भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं से ही होती थी। पत्रकारों से भी होती थी। सबसे बातचीत में एक ही ध्वनि निकलती थी कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के स्वाभाविक नेता नीतीश कुमार हैं। बिहार की राजनीति और वहां के नेताओं के बारे में अपनी राजनीतिक समझ बहुत अच्छी नहीं है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई की वजह से ढेर सारे बिहार के छात्र सम्पर्क में हैं और बाद में दिल्ली में पत्रकारों में ढेर सारे बिहार के रहने वाले मित्र सम्पर्क में आए। कुल मिलाकर अपना बिहार का ज्ञान बस इतना ही है। उत्तर प्रदेश को लेकर मैं ये दावा ठसके से करता हूं कि आप विधानसभा की जातीय, सामाजिक संरचना पर मुझसे कभी भी बात कर सकते हैं। ये इसलिए क्योंकि, उत्तर प्रदेश का ही रहने वाला हूं। लगभग हर जिले में खुद गया हूं। वहां के लोगों से नियमित बात होती है। इसलिए सीधे वहां की राजनीति समझ में आ जाती है। लेकिन, बिहार की राजनीति कतई न समझ में आने के बावजूद, यह बात मैं बार-बार कहता रहा हूं कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के स्वाभाविक नेता नीतीश कुमार ही हैं। यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि इतनी आसानी से मुझे दिखी यह बात मूलत: बिहार के ही रहने वाले बड़का टाइप के पत्रकारों को कभी क्यों नहीं दिखी।
दरअसल बिहार से निकलकर दिल्ली आए ज्यादातर पत्रकार लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर जाने कौन सी धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई लड़ने में जुटे हुए हैं। आज से नहीं, बरसों से। इस कदर कि उसी में जब नीतीश लालू के नजदीक, तो धर्मनिरपेक्ष विपक्षी गठजोड़ के विकल्प और जब बीजेपी के साथ, तो अपने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से समझौता करते दिखने लगते थे। बिहार के और दूसरे घोर बीजेपी विरोधी पत्रकार यही लम्बे अरसे से करते चले आ रहे हैं। वही पत्रकार इस समय आडवाणी और वाजपेयी का युग याद करते हुए नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं। लेकिन, यकीन मानिए वह सारे पत्रकार कोई नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी के विरोधी नहीं हुए हैं। उससे पहले भी वह सब उतने ही बीजेपी विरोधी थे। हां, अब उन्हें अटल, आडवाणी इसीलिए अच्छे लग रहे हैं, क्योंकि इससे मोदी-शाह पर हमला करने में आसानी हो।
भारतीय लोकतंत्र में हर किसी का तय स्थान है। नेता, अधिकारी, न्यायाधीश और पत्रकार। लोकतंत्र के खम्भे के तौर पर यह चारों इसीलिए जाने जाते रहे हैं कि इन चारों के अपनी तय भूमिका में रहने से लोक का तंत्र बेहतर चलता है। लेकिन, धीरे-धीरे हर कोई नेता वाली जगह पहुंच जाना चाहता है। या फिर ये भ्रम तैयार कर देना चाहता है कि नेता जो कुछ भी कर रहे हैं, उसमें उसी की भूमिका है। अधिकारी, न्यायपालिका और पत्रकार नेता बनाने-बिगाड़ने के खेल में लग गए। गठबन्धन सरकारों के दौर में यह खूब चला। ऐसा चला कि कई पत्रकार, अधिकारी, न्यायाधीश सरकार के कई मंत्रियों से ज्यादा ताकतवर दिखने लगे। बाकायदा मंत्री बनाने की ताकत इनके हाथ में रही। इसी से राजनीति को बनाने-बिगाड़ने की ताकत का भ्रम भी इनको होने लगा और लोकतंत्र कमजोर होने लगा। पत्रकार, बुद्धिजीवियों को अगर ये बात अब भी समझ में आ जाए कि इनका काम जो समाज में हो रहा है, उसकी रिपोर्ट करना, समाज की बेहतर कैसे हो, इसके बारे में बताना है। राजनीति कैसे चले ये बताना कतई नहीं। बड़ी बारीक रेखा इसके बीच में है। पत्रकार कब उसे पार कर गए, उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन, अब मोदी-शाह की जोड़ी की राजनीति के बहाने ही सही पत्रकारों को समझ आने लगा है कि राजनीति करना उनका काम नहीं है। उनका काम पत्रकारिता करना है। सरकार में कोई भी हो, मोदी-शाह की भी, जमकर आलोचना करना है। लेकिन, मोदी-शाह को सत्ता से हटाने की साजिश में शामिल होना, पत्रकारों का काम नहीं है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सत्ता सुख से वन्चित रखने के लिए जनता का भरोसा जीतना होगा और वो काम विपक्ष का है। आज भी टेलीविजन पर ढेरों रुआंसे पत्रकारों को देखकर लग रहा है कि वो अभी अपनी भूमिका सीखने, समझने को तैयार नहीं हैं। पूर्ण बहुमत की सत्ता से घबड़ाने की जरूरत नहीं है। लेकिन, उनको जो पत्रकारिता करना चाहते हैं। जो मोदी-शाह को सत्ता से हटाने की साजिश रचने में विपक्षी पार्टियों के साथ जुटे हैं, उनको घबड़ाना ही चाहिए। अब तो पूरे विपक्ष की एकमात्र उम्मीद नीतीश कुमार भी मोदी-शाह के साथ आ गए हैं। लोकतंत्र की मजबूती कमजोर सत्ता से कभी नहीं होती। उस दौर में पत्रकारिता भी मजबूत नहीं होती। भले ही लगे कि कुछ पत्रकार निजी तौर पर बहुत मजबूत हो गए हैं। लोकतंत्र के सभी खम्भों की मजबूती अपनी भूमिका निभाने से होती है। सत्ता अपनी मजबूती के लिए हरसम्भव कोशिश कर रही है। अब बारी विपक्ष, प्रशासन, न्यायपालिका और पत्रकारिता की है। सामान्य सी समझ की बात है, अगर समझना चाहें तो। फिलहाल स्वागत कीजिए कि एक साबित अपराधी के परिवारवादी शासन से बिहार को मुक्ति मिली है।

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