किसी राज्य में एक पार्टी की सरकार के खिलाफ एक कार्यकाल के बाद ही जिस तरह से सत्ता विरोधी रुझान हो जाता है, उसमें 22 साल से एक ही पार्टी की सरकार के खिलाफ माहौल आसानी से बनता दिख जाता है। गुजरात का चुनावी माहौल कुछ ऐसा ही है। और, यही माहौल टीवी स्क्रीन पर ज्यादा तेज आवाज कर रहा है। लेकिन, गुजरात में आने पर साफ दिखता है कि सामान्य तौर पर यहां गुजराती चुनाव को लेकर यूपी, बिहार की तरह अतिउत्साह की मुद्रा में नहीं है। हां, यह जरूर है कि, गुजरातियों से बात करने पर विकास के अगले स्तर पर गुजरात को ले जाने में विजय रुपानी की कमी के बारे मे लोग खुलकर बोलते हैं। हालांकि, यह बात भी बोलने में गुजराती थोड़ा समय लेते हैं। लेकिन, एक बार खुले, तो रुपाणी और मोदी के बीच के बहुत बड़े फासले को भाजपा के लिए मुश्किल बताते हैं। लेकिन, फिर वही गुजराती कह रहा है कि वोट तो मोदी को ही दूंगा। क्यों ? क्योंकि, एक गुजराती देश का ताकतवर प्रधानमंत्री है। और, इस गुजराती प्रधानमंत्री की वजह से दुनिया में गुजरातियों की हैसियत बड़ी है।

अल्पेश-जिग्नेश-हार्दिक की साझा ताकत को इस्तेमाल करने से कांग्रेस चूक गई है। यह बात भी गुजरात में घूमते साफ समझ में आती है। एक बड़ी बात का जवाब भी गुजरात के चुनावी नतीजे तय करेगा कि, क्या अल्पेश-जिग्नेश-हार्दिक के नेतृत्व वाले समूहों के आपसी विरोध की वजह से ही तीनों एक साथ मिलकर कांग्रेस के साथ नहीं आ पाए। हार्दिक की उम्र चुनाव लड़ने की नहीं है, इसलिए बड़ा सवाल है कि, हार्दिक के पीछे खड़ी भीड़ किसे वोट करेगी? कुछ हद तक इसका जवाब नवरंगपुरा की दर्शन सोसायटी के सामने के सैलून बाल कटाते मुझे मिला। मेरे यह कहने पर कि, पाटीदार तो बहुत नाराज है, पाटीदारों को बीजेपी से कुछ मिला नहीं। जवाब आया- पाटीदारों को नहीं मिला, तो मिला किसको? बीजेपी के राज में पाटीदारों की हैसियत सबसे ज्यादा रही है। कारोबार से लेकर सरकार तक पाटीदारों को ही बीजेपी के राज में तवज्जो मिली है। और, ऐसे में हार्दिक के साथ भीड़ तो इकट्ठा हो रही है लेकिन, सीधे तौर पर लाभ पाए इस समूह के लोग मतदान केंद्र में कमल के निशान को अनदेखा कर पाएंगे, ऐसा मुश्किल ही है।

राज्य के स्थानीय चैनलों पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के चुनाव प्रचार में 22 साल का राज ही प्रमुख है। भारतीय जनता पार्टी के चुनावी प्रचार सीधे तौर पर कह रहे हैं कि भाजप के राजनीतिक तौर पर मरने का मतलब होगा, गुजरात का, गुजराती अस्मिता का मरना। और, कांग्रेस 22 साल में भाजप सरकार क्या-क्या नहीं कर सकी है, उसको उभार रही है। लेकिन, इन प्रचार अभियानों पर जनता से बात करने पर एक बात जो समझ में आती है कि 22 सालों और खासकर 2002 के बाद मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी के राज में गुजरातियों की जीवनशैली में जो स्थिरता आई है, उस स्थिरता को तोड़ने की मन:स्थिति गुजरातियों की बनती नहीं दिख रही है। रात के 11 बजे महिलाएं जिस तरह से गुजरात के शहरों में अपने लिए खरीदारी करती नजर आ जाती हैं, वह दूसरे राज्यों की महिलाओं के लिए कल्पना में भी सम्भव नहीं है और यह सब मॉल में नहीं, सड़क के किनारे लगी मोहल्ले के बीच की दुकानों पर हो रहा है। हां, सीधे तौर पर इसे कहा जा सकता है कि गुजरात में दंगे अब नहीं होते और गुजरात में सुरक्षा का अद्भुत भाव है। इसके खिलाफ दिल्ली में बैठकर सबसे बड़ा तर्क यही आता है कि गुजरात में मुसलमानों में जो असुरक्षा का भाव है, उसकी बात कोई नहीं करता। लेकिन, इस बात को ठीक से समझना है, तो गुजरात आकर ही समझ में आएगा।

2002 के दंगे दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक हैं। उस दौरान हिन्दू-मुसलमान के बीच की खाई भी बढ़ी। लेकिन, पिछले 15 सालों में हिन्दू-मुसलमान की एक से ज्यादा पीढ़ियां बड़ी हो गई हैं और उनको मीडिया सतर्क न करे, तो उनके लिए हिन्दू-मुस्लिम विभाजन रोजमर्रा में लगभग ना के बराबर है। हां, टीवी कैमरे की रोशनी में या फिर पत्रकार ने कुरेदकर सवाल पूछना शुरू किया, तो तय जवाब ही मिलेंगे। इसका अहसास मुझे साबरमती रिवरफ्रंट पर हुआ। 2 दिसम्बर की रात साढ़े दस बजे के आसपास रिवरफ्रंट के खानपुरा की तरफ मैं भी घूम रहा था। कमाल की बात यह कि रिवरफ्रंट के बड़े इलाके में बड़े मजे से मुसलमान लड़के-लड़किया और महिलाएं-पुरुष घूमते-बैठे दिखे। मैं जानबूझकर मुसलमानों के वहां मस्ती करने की जिक्र कर रहा हूं। क्योंकि, ऐसा बार-बार कहा जाता है कि गुजरात के विकास में मुसलमानों की हिस्सेदारी बहुत कम है। साबरमती रिवरफ्रंट जिस तरह से लोगों की शाम तनावमुक्त होने का जरिया बना है, इसे समझना चाहिए। और, यहां आने पर शाम हिन्दू-मुसलमान या दूसरे लोगों की भी एक बराबर तनावमुक्त हो रही है। ऐसा ही एक समूह मुझे मिला। मुस्तकीम और उसके दोस्त। स्कूटी पर सवार होकर दरियापुर से मुस्तकीम और उसके 4 दोस्त साबरमती रिवरफ्रंट पर मस्त थे। मैंने पूछा, तो मुस्तकीम ने कहाकि, लगभग हर रोज देर शाम वे यहां आते हैं। मुस्तकीम ने बताया कि वे सब कॉलेज पहुंच गए हैं। और, मुस्तकीम बीकॉम पहले वर्ष में है, साथ में अपने पिता के कपड़े की दुकान पर भी बैठता है। मैंने पूछा, धंधा कैसा चल रहा है। उसका जवाब आया- मस्त। मैंने पूछा- जीएसटी से दिक्कत, उसने कहा – हमें क्यों होगी। फिर मैंने कहा- इसे रिकॉर्ड कर लूं। उसने एक मिनट में यह बातें बताई। “पढ़ाई भी करता हूं और पापा का शोरूम है, उसको भी देखता हूं। अच्छा चल रहा है, बहुत ठीक-ठाक, शुकर है। जीएसटी का हमको कहां से गड़बड़ होगी। हम तो रिटेल वाले हैं, हमको क्यों गड़बड़ होगी। हमें तो टैक्स मिल ही रहा है, हम तो जनता से टैक्स ले लेते हैं, हमें टेन्शन ही नहीं है जीएसटी का। यह सब बहाना है, जीएसटी हटाने का। होलसेल, रिटेल सबको जीएसटी कनवर्ट हो जाता है।” मैंने अपने फोन पर इसे रिकॉर्ड किया और बताया भी कि इसे यूट्यूब पर अपलोड करूंगा। 5 मिनट बाद मुस्तकीम अपने स्कूटी पर तेजी से हमारे पीछे आया और कहा, सर इसका कुछ गड़बड़ तो नहीं होगा। दरअसल, उसे थोड़ी देर बाद अपने दोस्तों से बात करके लगा होगा कि पत्रकार को तो सीधी-सच्ची बात बताना ही नहीं है।

गुजरात के चुनावों को कवर करने गए ज्यादातर पत्रकारों से मासूम-ईमानदार मुस्तकीम नहीं सतर्क मुस्तकीम ही बात करने को मिल रहे हैं। मुस्तकीम से लेकर परेशभाई या फिर कोई बेन भी हो सकती हैं। सतर्क गुजरातियों से बात करके गुजरात का चुनाव नहीं समझ आने वाला। नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने व्यक्तित्व को जितना बड़ा कर लिया, उस लिहाज से विजय रुपाणी कमजोर नजर आते हैं। और, गुजरातियों को मजबूत नेता ही पसन्द आता है। महात्मा गांधी, सरदार पटेल से लेकर केशुभाई और अब नरेंद्र मोदी तक। इसीलिए गुजराती असमंजस में है। लेकिन, गुजरातियों को मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर दिख रहे हैं और रुपाणी, राम के राज को सम्भालने वाले भरत जैसे ही नजर आ रहे हैं। और, कांग्रेस की तरफ से एक मजबूत नेता की कमी, विजय रुपाणी की कमजोरी को ढंक ले रही है। इसलिए मोदी के बदले हुए गुजरात को गुजराती 2017 में तो बदलता नहीं दिख रहा है।
(यह लेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपा है।)


1 Comment

Dileep shukla · December 7, 2017 at 9:18 pm

Very nice sir.
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