साबरमती रिवरफ्रंट पर

टीवी चैनलों पर काफी समय तक ऐसा लगा कि मुख्यमंत्री विजय रूपानी अपनी विधानसभा में पिछड़ रहे हैं। लेकिन, जब परिणाम आए तो, राजकोट पश्चिम से बीजेपी प्रत्याशी मुख्यमंत्री विजय रूपानी को 131586 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी इंद्रनील राजगुरू को मिले 77831 मत। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने भले ही ये लगता हो कि, गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के पास दमदार नेता नहीं हैं। लेकिन, चुनाव में बीजेपी के बड़े नेताओं को मिले मतों से ये साबित हुआ कि अपने क्षेत्र में उनकी मजबूत स्थिति है। ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि, कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता अपनी सीट गंवा बैठे हैं। मुख्यमंत्री विजय रूपानी 50000 से ज्यादा मतों के अंतर से जीते। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और भावनगर पश्चिम से बीजेपी प्रत्याशी जीतू वाघाणी को 83701 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी दिलीपसिंह गोहिल को 27000 से ज्यादा मतों के अंतर से हराया। नरेंद्र मोदी की पुरानी विधानसभा मणिनगर से बीजेपी प्रत्याशी सुरेश पटेल को 116113 मत मिले और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी श्वेताबेन ब्रह्मभट्ट को 70000 से ज्यादा मतों से हराया। दरअसल शहरी विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ ज्यादा सीटें ही नहीं मिली हैं, इन सीटों पर बीजेपी का जीत का अंतर बहुत ज्यादा रहा है। औसत अंतर 30000-70000 का रहा है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, अहमदाबाद की नारनपुरा विधानसभा से चुनाव जीतते थे। वे कभी चुनाव नहीं हारे। यहां से बीजेपी प्रत्याशी कौशिक पटेल को 106458 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी नितिन पटेल को मिले 40243 मत। यहां भी जीत का अंतर 66000 मतों से ज्यादा रहा। पूर्व मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल की विधानसभा सीट घाटलोडिया से बीजेपी प्रत्याशी भूपेंद्र पटेल ने 175652 मत हासिल किए और कांग्रेस प्रत्याशी शशिकान्त पटेल को एक लाख से ज्यादा मतों से हराया। भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की अपनी सीट पर मजबूत पकड़ के ये उदाहरण हैं। लेकिन, इन्हीं उदाहरणों से
ये भी पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनाव से ज्यादा मत मिलने के बावजूद कम सीटें क्यों मिलीं।

33 विशुद्ध शहरी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का जीत का अंतर 47000 मतों का रहा। ऐसी शहरी सीटें, जहां कुछ हिस्सा गांव का था, वहां बीजेपी की जीत का औसत अंतर 26000 मतों का रहा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीजेपी के बड़े नेताओं को खूब वोट मिले। साबरमती से बीजेपी प्रत्याशी अरविंद दलाल को 113503 मत मिले जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी जीतू पटेल को 44693 मत मिले। सयाजीगंज से बीजेपी प्रत्याशी जीतेंद्र सुखाड़िया को 99957 मत मिले जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी नरेंद्र रावत को मिले 40825 मत मिले। सूरत पश्चिम बीजेपी प्रत्याशी पूर्णेश मोदी को 111615 मत मिले जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी इकबाल दाउद के हिस्से आए सिर्फ 33733 मत। वड़ोदरा शहर से बीजेपी प्रत्याशी मनीषा वकील को मिले 116367 मत लेकिन, कांग्रेस प्रत्याशी अनिल परमार 63984 मत ही हासिल कर सके। भारी अंतर से जीत का फायदा बीजेपी को बढ़े वोट प्रतिशत में मिला लेकिन, नुकसान सीटों में हो गया। जबकि, कांग्रेस इस मामले में भाग्यशाली रही। उसे विधानसभा में एक समान वोट मिले।

इसका नतीजा ये रहा कि ऐसी जगहों पर जहां बीजेपी को ज्यादा मत मिले, वहां भी कांग्रेस ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही। सौराष्ट्र में बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। वहां पर 45.9% मत मिलने के बावजूद बीजेपी को सीटें मिलीं 23 जबकि, कांग्रेस को 45.5% मत से ही 30 सीटें मिल गईं। उत्तरी गुजरात में भी ज्यादा मत मिलने के बावजूद बीजेपी को कम सीटें मिलीं। उत्तर गुजरात में बीजेपी को 45.1% मत के साथ 14 सीटें मिलीं। वहीं, कांग्रेस 44.9% मत के साथ 17 सीटें जीतने में कामयाब रही। यही वजह रही कि, 2017 में 49.1% मत मिलने के बाद भी बीजेपी को उस अनुपात में कम सीटें मिलीं। जबकि, कांग्रेस 41.4% मत के साथ अनुपातिक तौर पर ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही। लेकिन, राजनीति की यही खूबी है कि यहां कोई गणित काम नहीं करता। काम करता है तो, सिर्फ जनता का गणित। और, यही गणित है जो, नेताओं, विश्लेषकों को चौंकाए रखता है।