दिल्ली से बैठकर कुछ ऐसा ही दिखता है कि गुजरात में मुसलमान बेहद डरा-सहमा बस किसी तरह जीवन बिता रहा है। 2002 के बाद से कुछ ऐसी ही धारणा पक्की कर दी गई है। 2002 में हुआ दंगा सभ्य समाज के लिए कलंक ही है। लेकिन, सच यह भी है कि 2002 के बाद से गुजराती बहुत आगे निकल गया है। उसमें हिन्दू-मुसलमान-पारसी-जैन और दूसरे सभी गुजराती शामिल हैं। जब दिल्ली की मीडिया लगातार गुजरात के मुसलमानों की डरी-सहमी तस्वीर पेश कर रहा है। उस समय अमदाबादी मुसलमान साबरमती रिवरफ्रंट पर मजे ले रहा है। यह सारी तस्वीरें 2 दिसम्बर को, मैंने खुद खींची है।


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