अहमदाबाद में गांधी जी के शुरु किए गए नवजीवन प्रेस की इमारत

गुजरात की यात्रा पूरी तरह से चुनावी यात्रा थी। लेकिन, अहमदाबाद में कुछेक लोग ही हैं, जिनसे न मिलना अनर्थ हो जाता। मैं जब अहमदाबाद एयरपोर्ट पहुंचा तो, संजय बेंगानी अहमदाबाद से अपने पैतृक गांव के रास्ते में थे। उन्होंने कहा- न मिलना महापाप हो जाएगा। उसके बाद उन्होंने जो सन्देश भेजा, फिर तय था कि मिलना ही मिलना है। संजय जी ने अपने दफ्तर का पता भेजा और साथ के साथ सन्देश आया- मैं नहीं तो भाई है, घर है, दफ्तर है। छोटे भाई पंकज बेंगानी का नम्बर आया। लिखा- इस पर फोन करके पधारें। इस तरह स्नेह और अधिकारपूर्वक हिन्दी ब्लॉगिंग के दिनों में बने रिश्तों में ही सम्भव है। हमारी और संजय बेंगानी की पहचान मोटा-मोटा एक दशक पहले की है। वजह वही हिन्दी ब्लॉगिंग। हम उस समय मुम्बई में सीएनबीसी आवाज में हुआ करते थे और, जमकर ब्लॉगिंग करते थे। बात का बतंगड़ बनाते पहले आभासी, बाद में असली मित्रता हो गई। असली मित्रता होने में कितना समय लगा, यह मुझे ठीक से याद नहीं है। क्योंकि, 2007 में हम परिचित हो गए थे लेकिन, 2007 में सीएनबीसी आवाज में लगभग पूरा गुजरात रिपोर्ट करते और अहमदाबाद धमाका कवर करते भी संजय बेंगानी से मिलने का संयोग नहीं बना, इसका सीधा सा मतलब हुआ कि तब तक हमारी आभासी मित्रता ही थी। हालांकि, उसके बाद कई मुलाकात और बिना मुलाकात के भी गजब की मित्रता हो गई।

पंकज बेंगानी के साथ

उसी मित्रता का स्नेहपूर्वक दबाव रहा कि पंकज से फोन पर बात हुई। और, दूसरे दिन हमारा मिलना हुआ। रविवार के दिन पंकज ने दफ्तर खुलवाया क्योंकि, मैं दफ्तर के ही आसपास पहुंच चुका था। पंकज से ढेर सारी चर्चा हुई। और यह तय हुआ कि, 6 की सुबह संजय जी को वापस आना है और 6 की दोपहर बाद मेरी दिल्ली के लिए वापसी है तो, उसी दिन भेंट होगी। और, मुझे लगता है कि भेंट न हुई होती तो, बहुत कुछ छूट सा गया होता। संजय बेंगानी ने कहाकि, हम गांधी जी के नवजीवन प्रेस बिल्डिंग में बने कर्म कैफे में बैठकर चर्चा करते हैं और वहीं से मैं आपको एयरपोर्ट छोड़ दूंगा। मुझे लगा, चलो ठीक है, इसी बहाने गांधी जी के बनाए प्रेस की जगह भी देख लूंगा। लेकिन, अब कर्म कैफे में बैठकर बतियाने के बाद मेरी सबको सलाह है कि अहमदाबाद जाइए तो, बिना कर्म कैफे गए मत लौटिए।

अहमदाबाद के कर्म कैफे में संजय बेंगानी के साथ

नवजीवन प्रेस की इस शानदार इमारत में ही अद्भुत माहौल वाला कर्म कैफे चलता है। कर्म कैफे साधारण कॉफी या नाश्ते वाला कैफे नहीं है। इस कैफे की दीवारों के साथ गांधी जी से जुड़ी ढेरों किताबें आपको ललचाती रहेंगी। हालांकि, यहां मुझे थोड़ी सी निराशा हुई। निराशा इसलिए क्योंकि, गांधी चित्रकथा की एक अच्छी किताब बच्चों के लिए लेने की इच्छा अधूरी रह गई। 250 रुपए की गांधी चित्रकथा कॉमिक्स के अन्दाज में गांधी जी के जीवन की पूरी कहानी है। लेकिन, गड़बड़ यह हुई कि किताब सिर्फ गुजराती और अंग्रेजी में थी। बच्चों के लिए मुझे यह किताब लेना था और बच्चे अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ रहे हैं। लेकिन, गांधी जी की जीवनी बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाना मेरे लिए असम्भव जैसा है। अब संजय जी ने भरोसा दिया है कि जब भी हिन्दी में गांधी चित्रकथा आएगी, वे मुझे भेजेंगे। इस एक निराशा के अलावा कर्म कैफे का माहौल बहुत खूबसूरत, सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर है। गुजरात विद्यापीठ के ठीक पीछे होने से यहां लड़के-लड़कियां खूब दिखते हैं और, विश्वविद्यालय केंद्र मुझे वैसे भी गजब लुभाते हैं। किसी विश्वविद्यालय परिसर में न जा पाने की भरपाई भी कर्म कैफे में हो गई।

कर्म कैफे में भाखरी पिज्जा

कर्म कैफे में हमने मसाला चाय पी और भाखरी पिज्जा खाया। भाखरी मतलब गुजराती रोटी जो, लम्बे समय तक खराब नहीं होती है, उसी को पिज्जा की तरह से बनाया गया था। स्वादिष्ट आहार है। नवजीवन प्रेस की इमारत काफी बड़ी है और कर्म कैफे के पास भी बड़ी जगह है। कैफे के बगल में 2 आर्ट गैलरी है। जिसमें हर वक्त किसी न किसी कलाकार की प्रदर्शनी लगी ही रहती है। और, कैफे के पीछे खादी के कपड़े मिलते हैं। हालांकि, कीमत थोड़ा ज्यादा है। अब यह बात थोड़ा समझ से बाहर हो जाती है कि गांधी जी का खादी प्रेम ही इसीलिए था कि कमजोर भी अच्छे कपड़े पहन सके। लेकिन, आज के सन्दर्भ में तो, खादी के कपड़े ही ज्यादा महंगे हो चले हैं।

क्रम कैफे में रखा बक्सा, यही कैश काउन्टर है

खैर, कर्म कैफे की गांधीगीरी की चर्चा के बगैर यहां की चर्चा अधूर रह जाएगी। कर्म कैफे में स्वयम् सेवा है और, कोई कैश काउंटर नहीं है। यह खूबसूरत नक्काशी वाला लकड़ी का बक्सा रखा हुआ है। आपकी मर्जी मुताबिक, खाए-पिए की कीमत इसी में डाल दीजिए। न कोई रोकने वाला है और न पूछने वाला। ऐसी जगह अगर दिल्ली में होती तो, मैं बैठकर बतियाने के लिए वही जगह पसन्द करता। संजय बेंगानी ने गुजरात, खासकर अहमदाबाद के सन्दर्भ में कई ऐसी बातें बताईं जो, मेरे राजनीतिक विश्लेषण में भी मददगार बना और आगे भी बनेगा। समय कम होने की वजह से बहुत सी बातें रह गईं है और बहुत कुछ अहमदाबाद देखना, समझना भी। संजय बेंगानी का आभार कहना तो गड़बड़ हो जाएगा। लम्बे समय के बाद यह पक्की वाली ब्लॉग पोस्ट लिखी है।


2 Comments

संजय बेंगाणी · December 16, 2017 at 7:41 am

अरे बाप रे, याद आ गया गुजरा ज़माना… ब्लोगरी वाला.

चित्रकथा का हिंदी में न होना, मन को दर्द देता है.
कर्म कैफे कमाल है. ऐसा ही एक रेस्टोरेंट भी है कर्णावती यानी अहमदाबाद में. जहां आप अपनी मर्जी से पैसे डिब्बे में दाल सकते है. न दें तो भी कोई टोकेगा नहीं.

pankaj · December 16, 2017 at 8:11 am

आपसे मुलाकात अविस्मरनीय रही. अगली बार आएँगे तो कर्म कैफे में मैं भी जाऊंगा. 😀

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