केरल में मंदिर के बोर्ड ने एक बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले से मंदिर में 36 गैर ब्राह्मण पुजारी बन गए हैं। इनमें से 6 दलित है। इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए, बिना किसी बहस के। त्रावणकोर देवास्वाम बोर्ड के इतिहास में यह पहली बार हुआ है। केरल में भी पहली बार हुई है, ऐसा खबरों में लिखा जा रहा है। खबरों में यह भी लिखा जा रहा है कि पहली बार किसी मंदिर में पुजारी रखने में आरक्षण के तय नियमों का पालन किया गया है। यहां तक खबर ठीक है, स्वागत योग्य है। लेकिन, इसी खबर को देश के लगभग सारे अखबार, वेबसाइट ऐसे लिख रहे हैं, जैसे पहली बार केरल के मंदिर में ही कोई दलित पुजारी बना है। यह बात सही है कि ब्राह्मणों के अलावा कोई पुजारी नहीं बनता रहा है। लेकिन, यह भी सही है कि लम्बे समय से हिन्दुओं में जाति के नाम पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ मुखर आवाज सुनाई दे रही है। आमतौर पर ज्यादातर इस तरह के मुखर स्वरों का मालिकाना हक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष, वामपन्थी विचार के लोगों, राजनीतिक दलों को दे दिया जाता है। लेकिन, ऐसा है नहीं। समाज के हर हिस्से से इस तरह का आवाजें मुखर हुई हैं। यहां तक कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बार-बार ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाया जाता है, उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से बार-बार यह कहा जाता रहा है कि जातीय आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। शायद ही इस पर गम्भीरता से चर्चा हुई हो कि अक्टूबर 2006 के अंक में पांचजन्य में इस बात की पुरजोर वकालत की गई थी कि गैर ब्राह्मणों, दलितों को मंदिर का पुजारी बनाया जाना चाहिए। इस पर 30 अक्टूबर 2006 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर भी छापी है। और, इस देश में जाति के नाम पर होने वाले ढेर सारे भेदभाव के बीच कई ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहां जातीय दुराग्रह दरकिनार किया जाता रहा है। गैर ब्राह्मण पुजारी बनाने के सर्वोच्च अदालत के फैसले पहले की यह सारी कोशिशें हैं। अदालत के फैसले के बाद कई मंदिर समितियों ने इसे लागू किया है।
केरल के मंदिर में 36 गैर ब्राह्मण और उसमें से भी 6 दलित पुजारी रखने के त्रावणकोर बोर्ड के फैसले के बाद थोड़ी देर मैंने इंटरनेट पर देश में दलित पुजारियों के बारे में पढ़ने पर लगाया। पहले मैं यह स्वीकार करता हूं कि दलित पुजारियों का इतिहास छोड़िए, मुझे ब्राह्मण पुजारियों के बारे में भी कोई ज्ञान नहीं है। लेकिन, भला हो इंटरनेट क्रांति का, काफी कुछ थोड़ी ही देर खोजने पर मिल गया। ऐसे कुछ उदाहरण मैं सिर्फ इसलिए यहां पेश कर रहा हूं, जिससे यह समझ आए कि,
1- देश में दूसरे राज्यों में केरल से पहले ही दलित, गैर ब्राह्मण और महिला पुजारी होते रहे हैं।
2- पत्रकारों को खबर लिखते समय हमेशा यह ध्यान में रहे कि खबर के बारे में अपने ही अखबार की पुरानी प्रतियां देख लें या फिर सबसे आसान इंटरनेट पर खोज लें। इससे तथ्यात्मक गलती नहीं होगी।
बिहार के पटना से मिन्ट अखबार में 13 जुलाई 2017 को एक खबर छपी है। इस खबर में पटना के महावीर मंदिर में पुजारी बने फलाहारी सूर्यवंशी दास की पूरी कहानी छपी है। महावीर मंदिर के पुजारी फलाहारी सूर्यवंशी दाय दलित हैं। पटना की महावीर मंदिर 300 साल पुराना बताया जाता है और 1993 में फलाहारी सूर्यवंशी दास यहां के पुजारी बने।
पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर को दक्षिण के काशी का दर्जा हासिल है। मई 2014 में विट्ठल रुक्मिणी मंदिर समिति में सर्वोच्च अदालत के फैसले के आधार गैर ब्राह्मणों और महिलाओं को पुजारी बनने का रास्ता खुल गया।
गैर ब्राह्मण और महिलाओं से भी आगे मैंगलोर के नारायण गुरु द्वारा स्थापित मंदिर में विधवा महिलाओं को पुजारी बनाया गया। 1995 में 65 साल की दलित विधवा लक्ष्मी और 46 साल की दलित विधवा चंद्रावती को मंदिर का पुजारी बनाया गया।
हिन्दुओं के पवित्र तीर्थस्थल बद्रीनाथ धाम के पहले ही कालेश्वर भैरव मंदिर है। कालेश्वर भैरव मंदिर के पुजारी दलित ही बनते हैं। इसी तरह झारखंड के कुम्हारसाही कस्बे में स्थित मां पाउड़ी देवी मंदिर में भी दलित पुजारी होते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर को वहीं की एक सम्पन्न महिला कारोबारी ने बनवाया था।
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के लखना कस्बे में काली माता का एक मंदिर है। इस मंदिर के पुजारी दलित ही होते हैं। यहां के लोग बताते हैं कि मंदिर की 200 साल पुरानी परम्परा में दलित पुजारी ही मंदिर में पूजा-पाठ का काम करते हैं। बताया जाता है कि 1820 में यह मंदिर बना और तभी से यहां दलित पुजारी है। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान से भी हर जाति के लोग इस मंदिर में आते हैं।
केरल के इस मंदिर में यह पहली बार हुआ है कि कोई दलित पुजारी बना है। लेकिन, देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने कितने मंदिर होंगे, जहां कोई गैर ब्राह्मण पूजा का काम कर रहा होगा। सिर्फ 10 मिनट में मैंने कुछ मंदिरों के बारे में इंटरनेट पर खोज लिया। हालांकि, यह सच है कि भारत में जाति के नाम पर भेदभाव अभी भी बहुत ज्यादा है। लेकिन, मीडिया की खबरों में कई बार खबरों को ऐसे लिखा जाता है कि उससे जातियों के बीच का विभाजन और कट्टर होता दिखता है। सिर्फ इसीलिए इस खबर को थोड़ा विस्तार मैंने दे दिया है। और, अन्त में फिर त्रावणकोर मंदिर के बोर्ड को बधाई।