12 सितम्बर को दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नोटों के आंकड़े ने नोटबन्दी के फैसले के खिलाफ पहले दिन से तर्कों की धार तेज कर रहे लोगों को और धारदार तर्क दे दिया है। एक पंक्ति में महीनों की नोटबन्दी की प्रक्रिया को देश और अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह बता दिया गया। उस पर अप्रैल से जून तिमाही की तरक्की की रफ्तार घटना तो नोटबन्दी विरोधियों के लिए सोने पर सुहागा जैसा हो गया है।
2 लाख से ज्यादा ऐसी कम्पनियां चिन्हित कर ली गई हैं, जो सिर्फ कर चोरी और काला धन सफेद करने के ही काम में लगी हुईं थीं। केंद्र सरकार ने बैंकों को साफ निर्देश दिया है कि ऐसी कम्पनियों के खाते तुरन्त जब्त किए जाएं। इनमें किसी भी तरह का कोई लेन देन न हो सके। फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट और वित्त मंत्रालय के दूसरे ऐसे विभागों की महीनों की कड़ी जांच के बाद इन कम्पनियों के खाते में लेन देन रोकने का आदेश जारी किया गया है। सरकारी वेबसाइट पर इन कम्पनियों की सूची डाल दी गई है।
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट का ही एक और आंकड़ा है। उस आंकड़े में साफ है कि नोटबन्दी के दौरान बैंकों में नकद जमा करीब 6 गुना बढ़ गया था। इनमें बड़ी रकम ऐसी है, जिन पर सन्देह है कि वह रकम काला धन ही है। खासकर निजी बैंकों में तो ऐसी रकम 10 गुना तक ज्यादा जमा की गई है। सालों से बन्द पड़े खातों में अच्छी खासी रकम डाली गई है। बैंकों में सन्देह के दायरे में जमा की गई रकम छोटी नहीं है। रकम है करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए। अगर फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस और इंटरमीडियरीज की रकम जोड़ ली जाए, तो करीब 5 लाख हो जाता है। 2016-17 में साढ़े तीन लाख की रकम की सन्देहास्पद रकम पर बात करना इसीलिए जरूरी है क्योंकि, पिछले साल और उससे पहले के साल सानी 2014-15 में ऐसी रकम पचास हजार करोड़ रुपए के आसपास रही।
डिजिटल ट्रांजैक्शन की को लेकर ये बात बार-बार कही जाती है कि फिर से नकदी का चलन पुराने स्तर पर आ गया है। साल 2016-17 की बात करें, तो पिछले साल के मुकाबले डिजिटल ट्रांजैक्शन में 55 प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली है। अगर विशुद्ध रूप से मनी वैल्यू के लिहाज से देखें, तो भी डिजिटल ट्रांजैक्शन 24 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। 2016-17 में 865 करोड़ 90 लाख डिजिटल ट्रांजैक्शन हुए हैं। मोबाइल बैंकिंग 122 प्रतिशत बढ़ी है। आंकड़ों से समझें, तो 2013-14 में मोबाइल बैंकिंग के जरिए कुल 224 करोड़ का लेन देन हुआ था। जबकि, 2016-17 में मोबाइल के जरिए लेन देन बढ़कर 10572 करोड़ रुपए हो गया।
दरअसल एक बात जो बार-बार कही जा रही है कि नोटबन्दी फेल हो गई। क्योंकि, सारे नोट वापस आ गए। निश्चित तौर पर सरकार वो तरीका खोजने में असफल रही, जिसमें छोटा काला धन रखने वाले या छोटी कर चोरी करने वाले हमारे-आपके जैसे मध्यवर्गीय लोगों को छोड़ देती और बड़ा काला धन रखने वाले या बड़ी कर चोरी करने वाले उद्योगपतियों, सत्ता के दलालों को पकड़ लिया जाता। लेकिन, क्या ऐसा मंत्र किसी भी सरकार के पास हो सकता है। क्योंकि, कानून तो एक ही तरह से काम करेगा। फिर चाहे 1 रुपए का काला धन हो या फिर 1 लाख करोड़ रुपए का। और सरकार की इसी मजबूरी का फायदा उठाकर काला धन रखने वालों ने अलग-अलग रास्ते से रकम बैंक में जमा कराकर उसे सफेद कर लिया।
अब इसे आगे समझते हैं। दरअसल 45 प्रतिशत बढ़े करदाता बहुतायत में ऐसे ही लोग हैं। इसके अलावा काला धन सफेद करने में चक्कर में बड़े चोरों के हाथ से काफी रकम आम लोगों के हाथ में आई है। कैसे, इसे मैं समझाता हूं। 2 लाख रुपए तक किसी खाते में जमा करने पर कोई पूछताछ नहीं। जिन लोगों ने अपने खाते में 2 लाख रुपए जमा किए हैं, वो बहुतायत ऐसे ही लोग हैं, जो नियमित तौर पर लकर जमा करते हैं। हां, एक साथ 2 लाख रुपए एक वित्तीय वर्ष में बढ़ने से सरकार को कर थोड़ा ज्यादा देना पड़ा। और इस पर यकीन करने के लिए किसी आर्थिक सर्वेक्षण या फिर रिजर्व बैंक के आंकड़ों की जरूरत नहीं है। बस अपने आसपास के लोगों से बात कर लीजिए, पूछ लीजिए।
एक तर्क और आता है कि, नोटबन्दी का बहुत नुकसान हुआ है। लेकिन, गरीब की अमीरों से चिढ़ और ये भरोसा कि अमीरों का नुकसान ज्यादा हुआ है। इसी वजह से गरीब नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा है। अब जरा इसको भी समझते हैं। कहा जा रहा है कि जबर्दस्त नौकरियां गई हैं। उद्योग-धंधे एकदम से ठप हो गए। लाखों लोग शहरों को छोड़कर अपने गांव लौट गए। इस तर्क को साबित करने के लिए उन उद्योग संगठनों के आंकड़े दिखाए जा रहे हैं, जिन पर यही तर्कशास्त्री आम दिनों में भरोसा नहीं करते हैं। सच ये है कि लाखों रुपए का काला धन गरीबों का पास था ही नहीं। उनकी रकम डूबी नहीं। डूबी तो अमीरों की ही है। अब चूंकि धन काला था। इसलिए 100 रुपए में 30 रुपए गंवाकर भी ऐसे अमीर इस सिद्धान्त को प्रतिपादित होने देना चाहते हैं कि गरीब का बड़ा नुकसान हुआ है। लेकिन, गरीब तो अपना और काले धन से बने अमीर के नुकसान को ठीक से देख रहा है, इसीलिए वो मानने को तैयार नहीं है।
नोटबन्द फिलहाल पूरी तरह से सफल है। क्योंकि, लोकतांत्रिक व्यवस्था में बिना लाखों लोगों को जेल भेजे सारा काला धन बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गया, यही सबसे बड़ी सफलता है। काला धन सिस्टम में आने से रियल एस्टेट जैसे सेक्टर में भाव सही स्तर पर आए हैं। इसके पहले काले धन के जोर से मकान-दुकान की कीमतें आसमान पर थीं। इसलिए ये नुकसान बड़े मुनाफे की बुनियाद बन सकता है। अर्थव्यवस्था में अगर 3-4 लाख करोड़ रुपए का काला धन इस्तेमाल हो रहा था, तो जाहिर है कि उस धन के लेन देन पर लगी रोक से अर्थव्यवस्था में गिरावट होगी ही। इसलिए अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार में कमी और रिजर्व बैंक के पास लौटे पूरे नोटों के आंकड़ों के आधार पर नोटबन्दी को असफल बताने वालों को थोड़ा इन्तजार कर लेना चाहिए। हां, अगर इतनी मुश्किलों के बाद दोबारा छोटा या बड़ा काला धन बनाने वाला तैयार होने लगा, तो निश्चित तौर पर मैं कहूंगा कि नोटबन्दी असफल रही है। फिलहाल नोटबन्दी पूरी तरह सफल है। काला धन रखने वाले डर रहे हैं। बस उनका ये डर खत्म न होने पाए। फिर चाहे अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार आधा-एक प्रतिशत नीचे ही क्यों न चली जाए। हम ईमानदारी से प्रतिष्ठित जीवन जीने वाले देश के निवासी बनना चाहते हैं।


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