उत्तर प्रदेश के फैजाबाद की जिला अदालत ने एक बहुत बड़ा काम कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुना दिया है कि अमिताभ किसान नहीं, अभिनेता हैं। अब तक ये बात किसी को पता नहीं थी, सभी इस पर बहस कर रहे थे कि अमिताभ किसान हैं या नहीं। ये बहस कुछ ऐसी थी कि सात साल बाद अब इसी बिना पर महाराष्ट्र सरकार अमिताभ से पुणे की 24 एकड़ जमीन वापस ले सकती है। ये वो जमीन है जिसे खरीदने के लिए अमिताभ को किसान होने का सुबूत देना जरूरी था।

अमिताभ ने ये जमीन तो, ली 2000 मे लेकिन, चूंकि बड़े आदमी हैं इसलिए 6 साल बाद 2006 में ये दस्तावेज पेश किए कि वो किसान हैं। अमिताभ रहने वाले उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के हैं। लेकिन, उनकी किसानी वाली जमीन है बाराबंकी में। और, वो भी 1980 से। लेकिन, 2000 में पुणे में जमीन खरीदने के बाद वो इस पर अपना हक साबित कर पाए 2006 में। वजह साफ है कि 2000 में अमिताभ के बड़े भाई मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में नहीं थी। 2006 में मुलायम ने अमिताभ के नाम बाराबंकी की जमीन के एक छोटे से टुकड़े का मालिकाना हक अमिताभ के नाम कर दिया। लेकिन, 1970 में ये जमीन खरीदने वाले पंजाब से आए एक सरदारजी को अमिताभ की निजी हैसियत का अंदाजा नहीं रहा और सरदारजी ने साफ कह दिया कि वो जमीन नहीं छोड़ेंगे चाहे जान देनी पड़ी।

खैर, सरदारजी को जान नहीं देनी पड़ी, फैजाबाद की जिला अदालत ने कह बाराबंकी के तत्कालीन डीएम की रिपोर्ट को ही सही ठहराया है जिसमें कहा गया है कि सहस्राब्दि के महानायक अमिताभ बच्चन को गलत तरीके से बाराबंकी में जमीन दी गई। अब इसी आधार पर महाराष्ट्र सरकार अमिताभ से पुणे की जमीन भी छीन सकती है कि वो किसान नहीं हैं। लेकिन, सवाल ये है कि महाराष्ट्र सरकार को क्या इसके लिए किसी कोर्ट के आदेश की जरूरत थी कि अमिताभ किसान नहीं हैं। सबसे ज्यादा टैक्स देने वाला अभिनेता किसानी कैसे कर सकता है ये जानने के लिए किस कोर्ट के आदेश की जरूरत थी।

अमिताभ के पिता हरिवंशराय बच्चन, जिनकी मधुशाला इतनी चर्चित हुई कि हर कोई जानता है कि वो कवि थे किसान नहीं यानी, पैतृक तरीके से भी अमिताभ के किसान होने का कोई सवाल ही नहीं। पिछले तीन दशकों से अमिताभ मुंबई की मायानगरी में राज कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश वो सिर्फ 1984 में एक साथ ज्यादा समय के लिए गए थे, जब उन्हें इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ना था। फिर ये भ्रम कहां से आ गया कि अमिताभ किसान हैं। इस पर बहस की जरूरत क्यों आई।

इस बात को बहस बनाने के लिए ही अमिताभ के खिलाफ मामला दर्ज होना चाहिए कि वो अपने को किसान साबित करना चाह रहे हैं। अमिताभ के किसान न होने का कोर्ट का फैसला जो, सबसे बड़ी बात साबित करता है कि आजादी के साठ साल से ज्यादा बीतने पर भी इस देश में सत्ता में रहने वाले लोकतंत्र का इस्तेमाल किसी भी तरह से अपने हक में कर सकते हैं। किसी की भी जमीन कोई भी अपने नाम करवा सकता है। फिर चाहे वो एक जाने-माने अभिनेता को किसान बनाने की ही बात क्यों न हो।

सच्चाई तो, ये है कि अगर कोर्ट कह भी देता कि अमिताभ किसान हैं तो, भी वो कभी बाराबंकी की जमीन पर अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए नहीं जाते। लेकिन, पुणे की जमीन का मालिकाना हक छोड़ने का उन्हें मलाल ज्यादा हो सकता है। सत्ता के इस्तेमाल से दुनिया के जाने-माने अभिनेता को किसान बनाने की ये घटना देश में अवैध तरीके से जमीन हड़पने की पूरी तस्वीर साफ कर देती है। अक्सर ये खबर आती है कि बिल्डर-डेवलपर नई बसती जगह पर लोगों से उल्टे-सीधे तरीके से जमीन हथिया लेता है और वहां आलीशान इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। फिर, उस इमारत की बुलंदी के सामने जमीन के छोटे से टुकड़े के असली मालिक की आवाज दबकर रह जाती है।

बात यहां भी वही हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि बाराबंकी में जमीन के असली मालिक के हक की बजाए यहां सरकार को ही चूना लगाया गया। किसान अमिताभ को कम रेट पर जमीन दे दी गई क्योंकि, अभिनेता नहीं किसान हैं। लोकतंत्र में लोकसत्ता लोगों के ही हक मार रही है।

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