नए साल की नई सुबह दिल्लीवालों के
लिए अजीब सी मुश्किल लेकर आएगी। अरविंद केजरीवाल की सरकार ने अभी एक फैसला लिया
है। या यूं कहें कि फैसला लेते हुए दिखना चाहती है अरविंद केजरीवाल की दिल्ली
सरकार। दिल्ली की सरकार ने एक जनवरी 2016 से दिल्ली की सड़कों पर कारों की संख्या
घटाने के लए एक सबसे आसान तरीका लागू करने का फैसला किया है। वो फैसला है कि
सम-विषम संख्या पर खत्म होने वाली कारों को अलग-अलग दिन चलने की इजाजत होगी। दिन
भी तय हो गए हैं। शून्य, दो, चार, छे, आठ पर खत्म होने वाली कारें मंगलवार,
गुरुवार और शनिवार को चलेंगी। जबकि, एक, तीन, पांच, सात और नौ पर खत्म होने वाली
कारें सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को चल पाएंगी। रविवार को सभी को कार चलाने की
इजाजत होगी। ये फैसला अरविंद केजरीवाल की सरकार ने दिल्ली के बेहद खतरनाक हो चुके
प्रदूषण को कम करने के लिए किया है। फिर मैं क्यों कह रहा हूं कि केजरीवाल की
सरकार सिर्फ अच्छा फैसला लेते हुए दिखना चाहती है। मैं क्यों अरविंद के इस फैसले
के साथ पूरी मजबूती से खड़ा नहीं हो रहा। दरअसल, ये फैसला लागू हो ही नहीं सकता।
ये समझ में आने की ही वजह से शायद अब केजरीवाल ने ये कहा है कि अगर लोगों को
परेशानी होगी, तो वो फैसला वापस ले लेंगे। सच्चाई ये भी है कि इस पर फैसला लेने
में जितनी देरी हुई है। उसके लिए दिल्ली की राज्य सरकार के साथ केंद्र सरकार भी
जिम्मेदार है। कारों की संख्या सीधे-सीधे घटाकर शायद ही दिल्ली के खतरनाक हो चुके
प्रदूषण को सरकार इतनी तेजी से कम कर पाए। उसके लिए जिस तरह की योजना बननी थी। वो
नहीं बनाई गई। कमाल तो ये है कि अभी दिल्ली सरकार के फैसले को देर आए दुरुस्त आए
नहीं कह सकते। दिल्ली में प्रदूषण की असली वजह पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर का
बढ़ना है। 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। और
इसी की दिल्ली की हवा में अधिकता हो गई है।

अच्छी स्वस्थ हवा के लिहाज से समझें,
तो पीएम 2.5 का शून्य से पचास तक होना बहुत अच्छा होता है। पचास से सौ के बीच में
होना भी हवा के लिए अच्छा ही है। पीएम 2.5 के सौ से एक सौ पचास के बीच में होने का
मतलब है कि बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के लिए हवा मुश्किल बढ़ाएगी। एक सौ
पचास से दो सौ के बीच अगर हवा में पीएम 2.5 हैं, तो इसका सीधा सा मतलब हुआ कि इस
हवा में स्वस्थ रहने की गुंजाइश कम है। दो सौ से तीन सौ के बीच पीम 2.5 का होना स्वास्थ्य
के लिए बेहद खतरनाक है। जबकि, तीन सौ के ऊपर मतलब सिर्फ और सिर्फ बीमारियां देने
वाली हवा। और दिल्ली की हवा बेहद खराब है ये जानने-समझने वाले भी शायद ही
जानते-समझते होंगे कि दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा तीन सौ के ऊपर है। और
वो भी लगातार। फिलहाल इसके कम होने के संकेत भी कम ही हैं। सबसे चौंकाने वाली बात
ये है कि मुंबई शहर में भी हवा में पीएम 2.5 की मात्रा दो सौ से तीन सौ के बीच है।
अब फिर से बात दिल्ली में लागू होने वाले कार प्रतिबंध की। वैसे तो प्रदूषण घटाने
के लिए किसी भी अप्रिय फैसले का स्वागत होना चाहिए। लेकिन, थोड़ा समझना जरूरी है
कि कारों पर सम-विषम वाला प्रतिबंध लगाने से कितना फायदा होगा और कितनी मुश्किलें
लोगों को झेलनी होंगी। मुंबई में मार्च 2015 तक के आंकड़ों के मुताबिक 25 लाख से
ज्यादा मोटरसाइकिल और कारें हैं। यानी दो करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले मुंबई की
आदत सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने की बहुत अच्छी है। ये अलग बात है कि मुंबई
की लोकल में लटकते दिखते लोग साफ बताते हैं कि मुंबई का सार्वजनिक परिवहन लगातार
बढ़ते दबाव को झेल नहीं पा रहा है। इस पचीस लाख में कारें सिर्फ आठ लाख हैं। बाकी दोपहिया
वाहन हैं। मुंबई में जगह की कमी से इतनी मोटरसाइकिल और कारों को झेलना ही शहर के
लिए मुसीबत बन रहा है। मुंबई में हवा में प्रदूषण का स्तर दो सौ से तीन सौ के बीच
में रह रहा है। और ये भी चार पहिया या दोपहिया का मोह मुंबईकर में हाल ही में तेजी
से बढ़ा है। वो भी तब जब मेट्रो भी एक रास्ते पर मुंबई में भी पहुंच गई है। मुंबई
की लोकल में पहले से बेहतर हवादार और ज्यादा लोगों को ले जाने वाले डिब्बे लग गए
हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि लंबे समय से सार्वजनिक परिवहन के लिए मशहूर
मुंबई के लोगों को भी अब सार्वजनिक परिवहन में यात्रा कर पाना मुश्किल हो रहा है। क्योंकि,
सार्वजनिक परिवहन की जबर्दस्त मारामारी के बाद भी अब उसमें यात्रा कर पाना ही संभव
नहीं रहा। इसलिए इस बात को सफाई से समझना होगा कि कारों की संख्या या फिर दोपहिया
वाहनों की संख्या बढ़ने का सीधा सा मतलब ये तो हो सकता है कि शहर में सार्वजनिक
परिवहन की पूरी व्यवस्था नहीं है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू ये भी हो सकता है कि उस
शहर विशेष में उससे ज्यादा सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था कर पाना ही संभव नहीं है।
मुंबई शहर के उदाहरण से इसे बेहद आसानी से समझा जा सकता है।
इसी को थोड़ा और अच्छे से समझने के
लिए मुंबई से सिर्फ डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर बसे शहर की स्थिति भी समझने की
कोशिश करते हैं। पुणे शहर बड़े शहरों में वायु प्रदूषण के लिहाज से रहने के लिए
सबसे बेहतर शहरों में है। उस पुणे शहर में कार-दोपहिया वाहनों की संख्या मुंबई से
ज्यादा हो गई है। यहां करीब इकतीस लाख वाहन हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि सिर्फ
कार-मोटरसाइकिल कम कर देने से हवा में प्रदूषण इतना कम नहीं होने वाला। हां, पुणे
में मुंबई के लिहाज से रहने वालों की संख्या और जगह का फर्क बहुत ज्यादा है। पुणे
मुंबई के लिहाज से ज्यादा बड़े क्षेत्रफल में बसा हुआ है। पुणे 710 वर्ग किलोमीटर
में बसा है। जबकि, शहर की कुल आबादी एक करोड़ से भी कम है। क्षेत्रफल के लिहाज से मुंबई
सिर्फ 603 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बसी हुई है। लेकिन, यहां की आबादी सवा दो
करोड़ से ज्यादा है। इसी से समझा जा सकता है कि मुंबई के लोगों के पास इतनी कम जगह
में अपना वाहन रखने का विकल्प ही नहीं है। दिल्ली 1484 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ
है। और यहां की आबादी एक करोड़ अस्सी लाख से ज्यादा है। दिल्ली के इतने बड़े
क्षेत्रफल के कारण ही यहां लोगों को अपना वाहन रखना जरूरी लगने लगता है। हां,
दिल्ली का खराब सार्वजनिक परिवहन होना भी इसकी एक बड़ी वजह है। हालांकि, मेट्रो
आने के बाद ये सुधरा है। दरअसल यही सबसे बड़ी वजह है कि व्यवस्थित शहर की
परिकल्पना हमने की ही नहीं है। इसीलिए अभी भी ये मुश्किल खत्म करने के बजाए
सरकारें सिर्फ इस खतरे को थोड़ा और सरकाने तक ही फैसले ले रही हैं।
इसको थोड़ा और समझते हैं। अब अगर
मुंबई के मुकाबले दिल्ली की बात करें, तो दिल्ली में हवा में प्रदूषण का स्तर तीन
सौ से चार सौ के बीच है, जो बेहद खतरनाक है। और यहां कुल वाहनों की संख्या करीब
नब्बे लाख है। ये संख्या कार और दोपहिया मिलाकर है। इसमें सिर्फ कारें ही तीस लाख
हैं। इसका कतई ये मतलब नहीं है कि दिल्ली के लोग सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल
करना पसंद नहीं करते। दरअसल दिल्ली की बसों की सेवा ही इतनी खराब है। और दिल्ली के
ऑटो और मुंबई के ऑटो-टैक्सी के अंतर पर किस्से तो सब जानते ही हैं। जैसे ही दिल्ली
वालों को सार्वजनिक परिवहन का एक बेहतर विकल्प मेट्रो के तौर पर मिला। दिल्ली की
ज्यादा मेट्रो लाइनों पर यात्रियों की संख्या अपनी क्षमता से ऊपर यात्रियों को
लाने-ले जाने का जरिया बन गई। यानी दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इतनी
दुरुस्त नहीं है। अब ऐसे में अचानक प्रदूषण घटाने के लिए लिया गया कारों पर
प्रतिबंध का ये फैसला तुगलकी फैसले की ही श्रेणी में आता दिख रहा है।

कारों पर प्रतिबंध लगाकर प्रदूषण कम
करने के सरकार के फैसले को चुनौती ऑटो इंडस्ट्री के लोग देने लगे हैं। सबसे बड़ी
कार निर्माता कंपनी मारुति के चेयरमैन आर सी भार्गव का कहना है कि उनकी पेट्रोल
कारें ना के बराबर ही पीएम 2.5 निकालती हैं। अलग-अलग समय पर आए शोध भी साफ कहते
हैं कि दिल्ली के प्रदूषण में भागीदारी कारों के धुएं की बहुत कम है। मई 2014 में
ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बता दिया था।
वायु प्रदूषण बढ़ाने में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी सड़कों की धूल और एनसीआर क्षेत्र
में हो रहे धुआंधार रियल एस्टेट कंस्ट्रक्शन की है। पचास प्रतिशत वायु प्रदूषण इसी
वजह से है। एनसीआर क्षेत्र में हजारों रियल एस्टेट प्रोजेक्ट हैं। जो लगातार बढ़ते
जा रहे हैं। सबसे खतरनाक बात ये है कि नियम कानून को ताकत पर रखकर तैयार हो रहे ये
घर दरअसल मांग से बहुत ज्यादा हैं। ये इससे समझ में आ जाता है कि सिर्फ नोएडा में
ही करीब डेढ़ लाख घर हैं जिनके खरीदार नहीं हैं। लेकिन, बिल्डर नए प्रोजेक्ट की
शुरुआत करते हुए घर खरीदने वालों को फंसाता जाता है। अगर सरकार इस पर काबू पा सके,
तो बहुत बड़ी कामयाबी वायु प्रदूषण रोकने में मिल सकती है। वायु प्रदूषण में तेईस
प्रतिशत हिस्सेदारी उद्योगों की है। वायु प्रदूषण के अलावा ये उद्योग ही हैं।
जिनकी वजह से यमुना काली हो गई है। अब बात गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण की। ये
करीब सात प्रतिशत है। और ये पूरी सात प्रतिशत सिर्फ निजी कारों या दोपहिया से होने
वाला वायु प्रदूषण नहीं है। इसमें बस, ट्रक, टैक्सियां भी शामिल हैं। अब इस बात को
आसानी से समझा जा सकता है कि मैंने लेख की शुरुआत में ही ये क्यों कहाकि दिल्ली
सरकार का ये फैसला सिर्फ फैसला लिया गया है। ये दिखाने के लिए किया गया लगता है।
निश्चित तौर पर दिल्ली की हवा का हाल बेहद खराब है। इतना कि तुरंत ढेर सारे कड़े
फैसले लेने की जरूरत है। जिसमें से एक वाहनों की संख्या पर रोक लगाने का भी है।
लेकिन, वायु प्रदूषण की बड़ी वजहों पर सरकार कुछ नहीं सोच रही है। दिल्ली और
केंद्र सरकार को ये तुरंत सोचना होगा।