ठीक किया। रेल बजट में राज्यों को ये, राज्यों को वो टाइप चलाने को नहीं दिया। लेकिन, ये बताते कि कितने समय में क्या करेंगे। और यूपीए की जो योजनाएं नहीं लागू हो पाईं उसे कैसे, कब तक लागू करेंगे तो, बेहतर होता। आखिर इतनी उम्मीद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा सकती है। क्योंकि, वो पूरे चुनावी भाषणों में और उसके बाद भी बड़ी समय सीमा की बात करते रहे हैं। खुद डी वी सदानंद गौड़ा ने पिछली सरकार की जो सबसे बड़ी नाकामी बताई वो भी यही रही कि उन्होंने दस साल में 99 योजनाएं बताईं लेकिन, सिर्फ एक लागू कर पाई। अब जब समयसीमा खुद नहीं बताया तो उस पर सवाल तो उठेगा ही। और इसीलिए रेल बजट का भरोसा दिलाने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का  संदेश प्रसारित हुआ। वरना ये जिम्मा सिर्फ और सिर्फ रेल मंत्रियों के लिए सर्वाधिकार सुरक्षित था। इसके पीछे वजह यही होगी कि @narendramodi को पता है कि भरोसा बनना या टूटना सब उन्हीं के मत्थे जाने वाला है। नरेंद्र मोदी को पता था कि राज्यों को क्या मिला, क्या नहीं इस पर बहस होगी ही। इसलिए उन्होंने कहाकि पहली बार समग्र राष्ट्र के लिए रेल बजट पेश हुआ है। 

लेकिन, राज्यों के लिहाज से सरकार के हर फैसले को देखने समझने के आदी रहे लोग कहां मानने वाले हैं। जाने माने संपादक ओम थानवी जी दुखी हैं कि @narendramodi गुजरात के प्रधानमंत्री हैं या पूरे देश के। अभी हमारे एक साथी भी दुखी थे कि मुंबई से अहमदाबाद क्यों बुलेट ट्रेन की बात की। ये दिल्ली से पटना भी तो हो सकती थी। अरे भाई इस तरह की प्रतिक्रिया देने से पहले ये सोचिए कि बुलेट ट्रेन के टिकट बिकें इसके लिए अभी मुंबई से अहमदाबाद से बेहतर कौन सी जगह हो सकती थी। और जानकारी बढ़े इसके लिए इसी रूट पर सर्वे यूपीए की सरकार के समय भी हुआ था। 

एक और चमत्कारिक काम हुआ है। नरेंद्मार मोदी की सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की हितैषी है। ये आरोप जमकर लगते रहे हैं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले रेल बजट को बाजार ने ठीक नहीं समझा। आमतौर पर माना यही जाता है कि जनकल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा रकम देने से बाजारू ताकतें दुखी होती हैं। फिर रेल बजट के बाद बाजार क्यों टूटा। दरअसल हुआ ये कि बाजार को भी कुछ नहीं मिला। जनकल्नयाणकारी एलान न होने से न नई रेल कोच फैक्ट्री मिली, न डिब्बा। पहले की घोषित योजना पूरी करने से बाजार का क्या भला होता। क्योंकि, उसकी तो वो पहले ही खा चुका है। तो ये है बाजार। इसलिए 31000 का सेंसेक्स इसी दिवाली खोजने वालों थोड़ा धैर्य रखो। वैसे सामाजिक न्य़ाय के ज्यादातर पक्षधर लोग सबसे ज्यादा नाराज बुलेट ट्रेन से ही हैं। वो खुलकर नहीं कह पाते वरना वो ट्रेनों को बेहतर करने का भी जमकर विरोध करते। ऐसे विरोधी लोगों का तर्क ये है कि भारतीय रेल गरीबों का साधन है। कमाल की बात ये है कि ऐसा कहने वाले ज्यादातर चलते एसी क्लास में ही है। भइया तो का करें भारतीय रेल को और गरीब बना दें कि वो खुद ही गरीब हो जाए और गरीबों को सफर कराने लायक भी न रह जाए। होना यही चाहिए कि भारतीय रेल इस हालत में पहुंचे कि गरीबों को भी अमीरों जैसी सुविधाएं दे सके। 

और अगर ध्यान से देखें तो मोदी सरकार बातें भले नई-नई करे। बुलेट, पीपीपी, विश्व स्तरीय स्टेशन, साफ सफाई, सुरक्षा। बस यही सब। सच्चाई ये है कि सब पुराना है। कुछ नया पेश नहीं कर पाई है @narendramodi की सरकार। नया बस ये है कि वोट बैंक वाली ट्रेनें, योजनाएं बजट में घोषित नहीं हुई हैं। जिससे वो पुरानी बातें लागू हो सकती हैं। जिससे रेलवे की सूरत बदल सकती है। बस यही नया है। इसलिए इंतजार करते हैं इस नए का।

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