अरविन्द
केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाने की घोषणा के साथ ही वो काम करना शुरू कर दिया
था, जिसे पार्टी की बुनियाद को ही कमजोर करना कहा जा सकता है। जो भी अरविन्द के
बराबर आधार वाले या आसपास के चेहरे दिखते थे, एक-एक करके अरविन्द ने किसी न किसी
बहाने से उन्हें किनारे कर दिया। और अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पार्टी और अपनी छवि
पर सबसे तगड़ी चोट 21 अप्रैल 2015 को की थी। वो चोट आज कपिल मिश्रा के अपनी आंखों के सामने
2 करोड़ रुपये लेने के आरोप वाली चोट से भी बड़ी चोट थी। हालांकि, उस समय अरविन्द
केजरीवाल और मीडिया विश्लेषकों को इस बात का उतना अहसास नहीं हुआ था। क्योंकि, उस
समय अरविन्द का सूरज पूरब में ही था। योगेन्द्र यादव, प्रशान्त भूषण, आनन्द कुमार
और अजीत झा को पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने के आरोपों में आम आदमी पार्टी
से निकाल दिया गया था। योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण ये वो चेहरे हैं,
जिन्होंने सही मायने में आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल का आधार तैयार करने
का काम किया था। अरविन्द के अगल-बगल खड़े रहकर योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण आम
आदमी पार्टी से जुड़ रहे नए चेहरों के साथ पुराने आन्दोलनकारियों को भी भरोसा दिला
रहे थे कि वैकल्पिक राजनीति का चेहरा खोजने वाले अरविन्द केजरीवाल पर भरोसा कर
सकते हैं। भाजपा-कांग्रेस विरोधी राजनीति को फलते-फूलते देखने की इच्छा रखने वालों
के लिए अरविन्द केजरीवाल उस नायक के तौर पर दिख रहे थे, जो भारतीय राजनीति में सभी
परम्परागत परेशानियों पर विजय पाकर आगे बढ़ रहे थे। लेकिन, 21 अप्रैल 2015 को
योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण को पार्टी से बाहर निकालकर अरविन्द ने उस वैकल्पिक
राजनीति की बुनियाद पर ही बहुत तगड़ी चोट कर दी थी।
21
अप्रैल 2015 को लगी चोट इतनी तगड़ी थी कि जब 7 मई 2017 को कपिल मिश्रा ने अरविन्द
पर अपनी आंखों के सामने ही सत्येंद्र जैन से 2 करोड़ रुपये नकद लेने का आरोप
लगाया, तो अरविन्द का साहस तक नहीं बन सका कि वो मीडिया के सामने आकर इस आरोप पर
अपने तीखे अन्दाज में जवाब दे पाते। अरविन्द ने जो चोट अपनी बुनियाद पर की थी,
उसका असर आज उनके साहस पर साफ दिख रहा है। कुमार विश्वास भले ही अरविन्द पर लगाए
आरोपों के पक्ष में कपिल मिश्रा से सबूत देने को कह रहे हैं। लेकिन, ये सब जानते
हैं कि कुमार विश्वास की विश्वसनीयता कितनी है। कुमार के हर दूसरे दिन बीजेपी में चले
जाने की खबरें आती रहती हैं। योगेद्र यादव और प्रशान्त भूषण ऐसे चेहरे थे, जो किसी
भी हाल में बीजेपी की तरफ झुकते कभी नहीं दिखे। मनीष सिसोदिया की छवि अच्छी है। और
इसीलिए आज भी मीडिया के सामने अरविन्द पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए मनीष
सिसोदिया ही सामने आए। लेकिन, जिस तरह सिर नवाकर अरविन्द को महान बनाने का कोई
मौका मनीष सिसोदिया अपने हाथ से जाने नहीं देते। उसमें मनीष सिसोदिया की छवि कभी
भी एक आधार वाले नेता के तौर पर नहीं बन सकी। इसीलिए अब मनीष को लोग अरविन्द के एक
दरबारी नेता के तौर पर ही स्वीकार कर पा रहे हैं। 
जिस संजय सिंह को अरविन्द
केजरीवाल ने लगभग हर महत्वपूर्ण चुनाव का जिम्मा दे दिया। उस संजय सिंह पर 2014 के
लोकसभा चुनावों से लेकर पंजाब चुनावों तक ढेर सारी वित्तीय अनियमितता का आरोप लगा।
आशुतोष एक पत्रकार के तौर पर अपनी विशेषज्ञता के साथ अरविन्द केजरीवाल के साथ गए।
लेकिन, राजनीतिक हलकों में आशुतोष की छवि आम आदमी पार्टी के एक ऐसे प्रवक्ता के
तौर पर ज्यादा बन गई, जो तर्क-कुतर्क में फंसने पर खुद पत्रकार बन जाता है और पहला
मौका मिलते ही पूरी पत्रकारिता को ही कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकता। आम आदमी
पार्टी में अरविन्द के विश्वसनीय और दरबारी नेताओं में एक मजबूत नेता पंकज गुप्ता
हैं। लेकिन, पंकज की पार्टी की कमरे के भीतर होने वाली बैठक में भी खास अहमियत
नहीं है। कुल मिलाकर अरविन्द ने बड़े सलीके से जैसे अपने बराबर खड़े नेताओं को
काटा, उन्हें पता ही नहीं चला कि इसी कटाई में उनकी अपनी छवि और आम आदमी पार्टी का
आधार भी कटता चला गया। लेकिन, अरविन्द की पूर्ण बहुमत की सरकार है। नए दरबारी
नेताओं की फौज खड़ी हो गई। ऐसे में पता ही नहीं चला कि बुनियाद दरक चुकी है। 
पंजाब
में सरकार न बन पाने, फिर गोवा में साफ हो जाने से अरविन्द की छवि कमजोर हुई है और
पार्टी का आधार खिसक गया है, ये जोरशोर से पता चल गया। रही सही कसर दिल्ली के नगर
निकाय चुनावों में कांग्रेस का आधार मत वापस आने से पूरी हो गई। बीएसपी की तरह
ईवीएम पर ठीकरा फोड़कर अरविन्द अपनी छवि कमजोर होने और पार्टी की आधार दरकने को
भ्रम बताने की नई साजिश रचने लगे। लेकिन, कामयाब नहीं हो सके। वो नौजवान जो
अरविन्द को वैकल्पिक राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मानकर झाड़ू उठाने चला आया था। वो
दुखी हो रहा है। इसका सीधा सा असर सोशल मीडिया पर अरविन्द और आम आदमी पार्टी के
पक्ष में चलने वाले अभियानों में आई कमजोरी से साफ समझा जा सकता है। कपिल मिश्रा
ने 2 करोड़ रुपये नकद लेनदेन और 50 करोड़ रुपये के एक जमीन सौदे का आरोप लगाने के
साथ एक और तगड़ी चोट कर दी है। वो तगड़ी चोट है, अरविन्द केजरीवाल के ईवीएम की वजह
से चुनाव हारने की बात को ध्वस्त करना। 
कपिल मिश्रा ने सटीक निशाना मारते कहा है
कि अभी तक ईवीएम की वजह से पार्टी की बुरी हार हुई, अब पानी की समस्या से हुई। कुल
मिलाकर अरविन्द और आम आदमी पार्टी का आधार ही “कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती का कुनबा जोड़ा” था। लेकिन, कहीं की
ईंट और कहीं का रोड़ा वो था, जो विकल्प की राजनीति में अपनी भूमिका देख रहा था। ये
सब लम्बे समय से कांग्रेस-भाजपा विरोधी राजनीति का आधार तैयार करने में जुटे थे। 2
साल में पूर्ण बहुमत की सरकार बना लेने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनके सारे 2 साल
वाले ही दरबारी नेता इस बात को समझ नहीं सके।हर बात पर मोदी से मुकाबला करने वाले
अरविन्द को ये बात कौन समझाए कि भारतीय जनता पार्टी का बरसों का कैडर है। भले ही
ये दिखता है कि मोदी-शाह के अलावा भाजपा में किसी की कोई औकात नहीं है। लेकिन, यही
देखने वाले ये भी मानते हैं कि संघ कभी भी हस्तक्षेप कर सकता है। यूपी में योगी
आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना ऐसे ही हस्तक्षेप बड़ा उदाहरण माना जाता है। इसके
अलावा भी मोदी सरकार के सबसे बड़े मंत्रियों- गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री
अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी- का अपना
प्रभाव और काम करने का तरीका है। ये बात अरविन्द केजरीवाल समझ सकें, तो ठीक। वरना सबसे
कम समय में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचकर खत्म होने वाली राजनीतिक पार्टी के तौर पर
आम आदमी पार्टी को याद किया जाएगा।
(ये लेख QuintHindi पर छपा है।)