अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक बेहद शानदार खबर है। खबर है कि
जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने वहां की कंपनियों को अपने बोर्ड ऑफ
डायरेक्टर्स में महिलाओं को कम से कम तीस प्रतिशत जगह देने का नियम बना दिया है।
जर्मन संसद से इसे मंजूरी मिल चुकी है। सचमुच ये बहुत अच्छी खबर है। अब इसका इस्तेमाल जर्मन कंपनियां घर-परिवार की महिलाओं को ही बोर्ड में लाकर खानापूर्ति करेंगी या सचमुच इससे बोर्डरूम की तस्वीर कुछ बदलेगी। हालांकि, निजी तौर पर मैं आरक्षण पसंद नहीं करता। फिर
वो किसी भी तरह का हो। लेकिन, सच्चाई यही है कि पुरुष हो, जाति हो, विशेष समाज हो
या फिर कोई भी हो, जो मजबूत है उसके सामने कमजोर को मजबूत करने के लिएए या कहें कि
मजबूत की बराबरी या उसके आसपास खड़ा करने के लिए उसी समाज को कुछ करना होता है। तो
उस करने में आरक्षण भी एक कारगर तरीका है। और ये स्वस्थ समाज के लिए जरूरी भी है
कि समाज में महिलाएं भी पुरुषों के आसपास हों। इससे वो बेहतर होते हैं, मानवीय
होते हैं। सिर्फ पुरुषों या शायद सिर्फ महिलाओं को प्रभुत्व का समाज बड़ा खतरनाक
होगा, है भी।
 
भारत में जातिगत आरक्षण है। महिलाओं को भी काफी
जगहो पर आरक्षण मिला हुआ है, खासकर पंचायत चुनावों में। बार-बार विधानसभा और
लोकसभा में भी महिला आरक्षण की चर्चा हो रही है। हालांकि, पार्टियां इसके साथ खड़ी
दिखना चाहती हैं। लेकिन, जब पार्टी में महिलाओं को बराबरी का हक देने की बात होती
है तो वो शायद ही कभी पूरी हो पाती है। यहां तक कि सबसे ताकतवर महिलाओं वाली
पार्टियों – कांग्रेस (सोनिया गांधी), तृणमूलकांग्रेस (ममता बनर्जी), एआईएडीएमके
(जयललिता), बहुजन समाज पार्टी (मायावती) और पीडीपी (महबूबा मुफ्ती) – में भी
महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी है। ये सब जानते हैं। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण
दिया गया है। और काफी महिलाएं इससे सशक्त भी हुई होंगी। लेकिन, बहुतायत कैसे सशक्त
हुई हैं वो रास्ता वाया पुरुष ही है। ये इलाहाबाद
के अखबार में छपा है। लालगोपालगंज के अध्यक्ष प्रतिनिधि की तस्वीर ऊपर चमक रही है।
पंचायत अध्यक्ष जुलेखा जी की शकल भी नहीं दिख रही। सिर्फ नाम नीचे लिखा है। प्रतिनिधि
महोदय अध्यक्ष जी के पति हैं। पंचायती राज में गजब महिला सशक्तिकरण है। मुझे लगता है
कि 365 दिन का महिला सशशक्तिकरण का कुछ किया जाए वरना तो ऐसे ही महिला दिवस की तरह
आरक्षण भी महिला सशक्तिकरण का एक धोखा भर बनकर रह जाएंगे।