कई बार सीधे
निशाने पर लगे तीर से कितना फायदा हुआ है, ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।
कुछ ऐसा बीएसपी के साथ भी होता दिख रहा है। मायावती ने मुख्तार अंसारी के परिवार
की पार्टी कौमी एकता दल का विलय बसपा में करके बड़ा शानदार निशाना साधा है। पहली
नजर में तो ऐसा ही दिख रहा है। मुख्तार अंसारी, उनके भाई सिबकतुल्लाह अंसारी और
बेटे अब्बास अंसारी को अब बीएसपी ने टिकट दे दिया है। मऊ की सदर विधानसभा सीट और
गाजीपुर को मोहम्मदाबाद सीट अंसारी परिवार की पारिवारिक सीट है। और ये दोनों ही
सीट अंसारी भाई बिना किसी पार्टी के भी जीतने की क्षमता रखते हैं। मऊ विधानसभा सीट
से 1996 से मुख्तार अंसारी विधायक चुनकर आ रहे हैं। 1996 में पहली बार बीएसपी ने
ही मुख्तार को टिकट दिया था। उसके बाद बीएसपी से बाहर जाकर भी मुख्तार अंसारी ने मऊ
सीट पर कब्जा बनाए रखा। मोहम्मदाबाद सीट पर भी अंसारी परिवार का ही कब्जा है। यहीं
से कृष्णानंद राय की पत्नी बीजेपी से चुनाव लड़ रही हैं। मुख्तार अंसारी कृष्णानंद
राय की हत्या के आरोपों में ही लम्बे समय से जेल में बंद हैं। हत्या की वजह भी
2002 का विधानसभा चुनाव माना जाता है। जब कृष्णानंद राय ने मुख्तार के भाई अफजाल
अंसारी को विधानसभा चुनाव में हरा दिया था। उसके बाद ही कृष्णानंद राय की हत्या कर
दी गई थी।

मुख्तार के
भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से 1985 से लगातार चुने जाते हैं।
सिवाय 2002 और 2005 में हुए उपचुनाव के। 2002 में बीजेपी के कृष्णानंद राय और 2006
के उपचुनाव में कृष्णानंद की हत्या के बाद उनकी पत्नी अलका राय इस सीट को जीतने
में सफल रहीं। उसके बाद अफजाल लोकसभा पहुंचे और मुख्तार के दूसरे भाई सिबगतुल्लाह
अंसारी इस सीट से विधायक हैं। कुल मिलाकर दो सीटें बीएसपी के खाते में लगभग पक्की
दिख रही है। हालांकि, मऊ की घोसी विधानसभा पर अब्बास का कोई पारंपरिक आधार नहीं
है। लेकिन, कौमी एकता दल के 2012 के प्रदर्शन के आधार पर तीनों ही सीटें बीएसपी के
लिए फायदे के तौर पर देखी जा रही हैं। अंसारी परिवार की कौमी एकता दल ने 2012 में
43 विधानसभा में चुनाव लड़ा और 2 सीटें जीतीं। लेकिन, मत प्रतिशत के लिहाज से मऊ,
गाजीपुर और बलिया में करीब 15% मत हथिया लिए। इन तीनों जिलों में कुल 15 सीटें हैं।
मुसलमानों में भरोसा बनाने के लिए जूझ रही बहुजन समाज पार्टी के लिहाज से देखें,
तो ये बहुत बड़ी सफलता है। और इसीलिए मैंने शुरुआत में लिखा कि पहली नजर में
मायावती का मुख्तार अंसारी वाला तीर निशाने पर पक्का लगता दिख रहा है। क्योंकि, 2
पक्की सीटें और कम से कम इन 3 जिलों की 15 सीटों पर मुसलमानों के लिए पसंद की पहली
पार्टी बन जाना। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम के दूसरे पहलू को भी देखने को जरूरत है।
दूसरा पहलू है कि क्या मुख्तार अंसारी परिवार का बीएसपी में जाने का कोई नुकसान भी
हो सकता है।
मुख्तार के
बीएसपी में शामिल होने के नुकसान के लिए सबसे पहले तो मुख्तार की छवि क्या है,
इसकी बात करनी होगी। मुख्तार अंसारी की छवि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमान माफिया
की है। बृजेश सिंह और मुख्तार की दुश्मनी के आधार पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में
विभाजन साफ दिखता है। बृजेश के सिंह के नजदीकी रहे कृष्णानंद राय ने जब अंसारी
परिवार की पारंपरिक सीट से मुख्तार के भाई को हराया तो, कृष्णानंद राय की हत्या कर
दी गई। मुख्तार कृष्णानंद राय की हत्या और 2005 में हुए मऊ दंगों के आरोप में जेल
में बंद हैं। कृष्णानंद राय की हत्या की वजह से मऊ, गाजीपुर और बलिया के भूमिहार
मुख्तार का जमकर विरोध करते रहे हैं। भूमिहारों के बीएसपी से नाराज होने की ताजा
वजह उसमें जुड़ जाती है कि अंसारी परिवार को दी गई 2 सीटों पर पहले भूमिहार
प्रत्याशी ही बीएसपी ने उतारे थे। इसलिए मऊ, गाजीपुर और बलिया पर भूमिहारों को
बीएसपी से विरोध बढ़ गया है। इसी विरोध को कम करने के लिए मायावती ने समाजवादी
पार्टी की सरकार में मंत्री रहे नारद राय को बलिया सदर से टिकट दिया है। लेकिन,
नारद राय का भूमिहारों में खास प्रभाव नहीं माना जाता। इसलिए इससे बहुत फायदा
मिलता नहीं दिख रहा है।

इसकी वजह से
एक और जो बात मायावती के खिलाफ जा सकती है, वो है सवर्णों का बीएसपी से दूरी बना
लेना। अंसारी परिवार को टिकट देने से पहले ही मायावती ने 97 मुसलमानों को टिकट
दिया था। इससे मुसलमानों के नजदीक जाने की मायावती की कोशिश साफ दिख रही थी।
लेकिन, मायावती अपने आधार दलित मतों के साथ मुसलमानों को जोड़ने की कोशिश के साथ
सर्वजन समाज को जोड़ने की भी कोशिश कर रही हैं। इसीलिए बीएसपी ने 113 सवर्णों को
टिकट दिया है। क्योंकि, बहुतायत सवर्ण ब्राह्मणों की अगुवाई में लोकसभा चुनाव से
ही बीजेपी के साथ पक्की तरह पर दिख रहा है। बीएसपी ने 66 ब्राह्मण सहित कुल 113
सवर्णों को टिकट देकर उन्हें बीजेपी की तरफ से अपनी तरफ लाने की कोशिश की है। जो रणनीति
के तौर पर कुछ हद तक सही भी दिख रही थी। लेकिन, अब मुख्तार अंसारी और उनके परिवार
की हाथी की सवारी से कानून व्यवस्था के मसले पर बीएसपी की तरफ जाने का मन बनाने
वाला सवर्ण मतदाता फिर से पूरी तरह से बीएसपी से किनारा कर सकता है। और इसका असर
सीधे तौर पूर्वांचल के तीनों जिलों- मऊ, गाजीपुर, बलिया- में सवर्ण मतों का पूरी
तरह से बीएसपी के खिलाफ जाना हो सकता है। कुल मिलाकर मुख्तार अंसारी को परिवार
सहित हाथी पर बिठाकर फौरी तौर पर तो मायावती ने राजनीतिक बढ़त ले ली है। लेकिन, बाद
के चरणों में पूर्वांचल तक पहुंचते कितने सवर्ण हाथी से उतर जाएंगे, इसी से समझ
आएगा कि मायावती का मुख्तार वाला तीर निशाने पर लगा या खुद को ही घायल कर गया है। 

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