मुश्किल होता है
मेरे लिए। हमेशा ये शिक्षक दिवस हमारे लिए अजीब सी उलझन खड़ी कर देता है। मैं बहुत
ध्यान से सोचता हूं तो भी शिशु से लेकर डिग्री लेने की आखिरी कक्षा तक मुझे ऐसा कोई
शिक्षक याद नहीं आता, जिसे यादकर मैं ये कह सकूं कि ये वो शिक्षक थे,
जिन्होंने मेरे जीवन में शिक्षक की भूमिका अदा की। सब कक्षाओं के शिक्षक की तरह
आए-गए। शुरुआती शिक्षा यानी सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षकों (आचार्य जी और दीदी
जी) को याद करता हूं तो जरूर कुछ चेहरे आंखों के सामने घूमते हैं, जो बेहद अच्छे
लोग थे। लेकिन, मेरे शिक्षक के तौर पर उन्होंने क्या किया – ये मुझे याद नहीं आता।
फिर धीरे-धीरे आगे
की कक्षाओं में बढ़ते गए। लेकिन, शिक्षक कोई मेरा रहा, मुझे मिला – इस पर मैं आज
तक भ्रम में हूं। न तो मैं बहुत तोड़ विद्यार्थी रहा और न ही बहुत कमजोर। एक अच्छा
छात्र, विद्यार्थी रहा। 5 से 8 तक जिन शिक्षकों के नाम भी याद आते हैं तो कान
उमेठने के संदर्भ में या फिर डरावने शिक्षक के रूप में। लेकिन, कोई भी शिक्षक मुझे
ऐसा नहीं याद आ रहा है, जिसने मुझे कुछ अलग से समझाने, बनाने की कोशिश की हो।
सरस्वती शिशु मंदिर शिशु से पंचम तक और छ: से आठ तक स्वामी
विवेकानंद विद्याश्रम में। हर जगह मेरी पहचान एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में ही
रही। इसके बाद इंटर कॉलेज में पहुंचा तो शहर का एक ऐसा कॉलेज जिसकी इमारत शहर की
सबसे खूबसूरत इमारत थी। शानदार खेल का मैदान था। लेकिन, छवि केपी कॉलेज की बहुत
अच्छी नहीं थी। यानी पढ़ने वाले बड़े कम थे। इतने बड़े क्लासरूम थे कि दिल्ली एनसीआर
में उतनी शानदार इमारत और कक्षाओं वाला विद्यालय बीस हजार रुपये महीने की फीस तो
उसी को दिखाकर वसूल ले। 9, 10, 11 और 12 की पढ़ाई मेरी इसी कॉलेज से हुई। पढ़ाई
क्या हुई सिर्फ यहां से पंजीकरण के आधार पर यूपी बोर्ड की परीक्षा में बैठने की
अर्हता मिल गई और पास होने का प्रमाणपत्र भी। 
शिक्षक तो यहां का
भी कोई मुझे याद नहीं आ रहा है। सिवाय एक एम एम सरन के। एम एम सरन भौतिक विज्ञान
पढ़ाते थे। शानदार पीएलटी यानी फिजिक्स लेक्चर थियेटर में सरन सर की क्लास चलती
थी। सरन सर बच्चों की पीटते भी गजब थे। हालांकि, उनकी क्लास अच्छी होती थी और वो
फिजिक्स के मास्टर टीचर थे। 12वीं में सरन सर की कक्षा में एक दिन आगे की सीट पर
मैं बैठा हुआ था। वो पढ़ा रहे थे और मैं बगल के बच्चे से बात कर रहा था कि
उन्होंने देख लिया। आदेश आया खड़े हो जाओ। बेंच पर खड़े हो जाओ। मैं सिर झुकाए
चुपचाप खड़ा रहा लेकिन, बेंच पर नहीं खड़ा हुआ। गुस्से में सरन सर ने पूछा
तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं। मैंने कहा मैनेजर हैं। इतना सुनते ही सरन सर ने
गुस्से में कहा तुम चपरासी भी नहीं बन पाओगे। मैंने भी पलटकर जवाब दिया- मैं
चपरासी तो नहीं ही बनूंगा। और वैसे तो हमेशा सेकेंड डिवीजनर ही रहा। लेकिन,
फिजिक्स में मेरे 100 में से 74 नंबर आए। और इतने नंबर आने के बाद जब मैंने सरन सर
को मार्कशीट जाकर दिखाई तो सरन सर ने मेरी पीठ ठोंकी। लेकिन, उससे पहले जब घर जाकर
मैंने अपने पिताजी को ये बात बताई कि सरन सर ने मुझे कहा कि तुम चपरासी भी नहीं बन
पाओगे, तो पिताजी ने तुरंत कहा सरन के घर चलना है। पिताजी बैंक के बाद यूनियन
दफ्तर चले जाते थे। उस दिन करीब आठ बजे यूनियनबाजी करके लौटे थे। लेकिन, तुरंत
उन्होंने फिर से अपनी यजदी मोटरसाइकिल स्टार्ट की। मुझे लिया और चल पड़े सरन सर के
यहां। काफी खोजने के बाद उनका घर मिला। पिताजी पहुंचते ही सरन सर पर फट पड़े।
उन्होंने कहा आप डांटते, मारते, समझाते – लेकिन आपने ये कैसे कह दिया कि तुम
चपरासी भी नहीं बन पाओगे। चपरासी बनने के लिए ये आपके पास पढ़ने आता है। पिताजी
इतने गुस्से में थे और बात भी उनकी सही थी। कोई शिक्षक अपने ही छात्र को चपरासी भी
न बन पाने का आशीर्वाद कैसे दे सकता है। सरन सर बैकफुट पर चले गए। इलाहाबाद
विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान मैंने जीवन सीखा। बहुत कुछ सीखा। और वहां मैं खुद
बहुत ज्यादा कक्षाओं में शामिल नहीं हो पाया। इसलिए विश्वविद्यालय के शिक्षकों के
ध्यान में न आने की बड़ी वजह मैं खुद हूं। इसके बाद भी विश्वविद्यालय में कक्षाओं,
शिक्षकों की स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती।
इन बातों का जिक्र
मैं दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि आज जो हर तरफ इस बात की चर्चा होती है कि महंगी फीस
वसूल रहे निजी स्कूलों ने कैसे पूरी भारतीय शिक्षा को चौपट कर दिया है। बाजारू बना
दिया है। दरअसल उसमें सबसे गंदी भूमिका इन्हीं शिक्षकों की रही। जिन्होंने बस ऐसे
ही शिक्षक की भूमिका निभाई। कभी नहीं तय किया कि कक्षा के बच्चों में कौन सा बच्चा
क्या कर सकता है, उसे आगे बढ़ाया जाए। विद्यालयों ने बच्चों के आने-जाने की संख्या
और हर साल पास होने वाले बच्चों के आधार पर खुद का प्रमाणपत्र पेश किया। सबसे बड़ी
मुश्किल भी यही रही। इसीलिए जब आज मैं जिंदगी के इस पड़ाव पर शिक्षक दिवस के लिए
एक शिक्षक को याद करने की कोशिश करता हूं तो मुझे कोई शिक्षक याद नहीं आता है।
डिग्री पाने की
शिक्षा के दौरान बेहतर शिक्षक हमेशा मेरे आसपास के लोग रहे। हमेशा मेरे पिताजी
रहे। हमेशा मेरे पिताजी के पिताजी रहे। मेरी मां रहीं। मेरे घर-परिवार वाले रहे। मेरे दोस्त रहे।
मेरी पत्नी रहीं। मेरे साथ काम करने वाले लोग रहे। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग
रहे। सबने बिना शिक्षक की पदवी के कुछ न कुछ शिक्षा दी। अब भी मुझे लगता है कि
मेरे शिक्षक ऐसे ही राह चलते मिलते रहते हैं। बिना पदवी वाले शिक्षक ही मेरी
जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे और निभाते रहेंगे। लेकिन, शिक्षक अगर ये
तय नहीं कर पाता कि हर शिक्षक किसी एक छात्र के लिए चाणक्य, द्रोणाचार्य, संदीपनी
जैसे याद नहीं किया जा पा रहा तो, मेरी चिंता जायज है। हो सकता है कि शिक्षक दिवस
पर हर किसी को अपना कोई शिक्षक महान लगने लगे या फिर ऐसा बताना उसकी मजबूरी हो
जाए।  लेकिन, मुश्किल ही है कि सच में कितने
छात्र अपने जीवन के एक शिक्षक को भी श्रद्धाभाव से देख पाते हैं या उसके बारे में
सचमुच बता सकते हैं कि आखिर उस शिक्षक ने उसके जीवन में क्या बदला, बेहतर किया है।
यही सबसे बड़ी समस्या है। इसी का समाधान मिल जाए तो शिक्षक दिवस सार्थक हो सके। ये
मेरी बदनसीबी रही। लेकिन, खुशनसीब छात्र कितने होंगे।