अमेरिका के साथ भारत के परमाणु समझौते के विरोध की असली वजह करात ने बता ही दी। सीपीएम महासचिव प्रकाश करात इसलिए नहीं चिंतित हैं कि उन्हें भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से भारते के हितों को नुकसान होता दिख रहा है। वो, परेशान इसलिए हैं कि भारत-अमेरिका के साथ समझौता करके चीन को कमजोर कर देगा।  कोलकाता में कल सोवियत क्रांति की 90वीं वर्षगांठ पर सारे कॉमरेडों के बीच में ये करात की स्वीकारोक्ति थी (देश की आजादी के कितने कार्यक्रम वामपंथियों को उत्साह से मनाते देख जाता है)। खैर, सोवियत क्रांति की 90वीं वर्षगांठ पर करात ने कहा कि हम तब तक आराम से नहीं बैठने वाले जब तक कि अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी को पूरी तरह खत्म नहीं कर देते। करात की दलील मानें तो, अमेरिका की नजर भारत के बाजार पर है। और, वो भी इसलिए कि अमेरिका भारत के बाजार में हिस्सा लेकर चीन से बढ़त बनाए रखना चाहता है। करात कहते हैं कि इसकी वजह साफ है कि चीन अकेला देश है जो, अर्थव्यवस्था के मामले में अमेरिका से आगे निकल सकता है।

करात को भरोसा है कि 2050 तक चीन अमेरिका से आगे निकल जाएगा। बस यही चिंता करात को खाए जा रही है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी से उनके सपनों का देश चीन कहीं पीछे न रह जाए। करात के पूरे भाषण में कहीं भी ये चिंता या खुशी नहीं दिखी कि अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी से भारत को कितना नुकसान या फायदा होगा। कॉमरेड करात को ये भी लगता है कि लाल सलाम करने वाला चीन अकेला सबसे ताकतवर कम्युनिस्ट देश है जो, अमेरिका को चुनौती दे सकता है। करात को कभी ये सपने में भी नहीं आता होगा कि भारत चीन को या अमेरिका को चुनौती देने लायक कैसे बन सकता है। परमाणु समझौते पर लाल हो रहे करात ने एक और तथ्य का खुलासा किया कि अमेरिका ने पाकिस्तान को इसलिए छोड़ा क्योंकि, भारत उसे बड़ा बाजार दिख रहा है। अब साफ भारत की तकत को अमेरिका क्या दुनिया पूज रही है। लेकिन, करात को इससे एशिया में चीन को नुकसान होता दिख रहा है। इसलिए वो भारत के नुकसान पर भी समझौता करने के लिए तैयार हैं।

करात ने कॉमरेडों को भरोसा दिलाया कि पश्चिम बंगाल पूंजीवाद से मुकाबला करता रहा है (बुद्धदेव बाबू सुन रहे हैं) और आगे भी करता रहेगा। बूढ़े कॉमरेड ज्योति बसु ने महिला कैडर को यूपीए सरकार की ‘जनविरोधी’ (वो, हर बात जो कॉमरेडों को पसंद न आए) नीतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने को कहा। साथ ही बसु ने मजबूरी भी जताई कि विकल्पहीनता की वजह से वो कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। मजबूरी सिर्फ बीजेपी के विरोध की है (पता नहीं वामपंथियों को ये भ्रम क्यों है कि चीन की वकालत करने वालों को देश के लोग देश अकेले चलाने का विकल्प दे देंगे)। ये वही बसु हैं जो, सरकार गिरने की नौबत पर सरकार बचाने के लिए लाल कॉमरेडों को मनाने में जी जान से जुटे हुए थे। अब ये कांग्रेस को मजबूरी का समर्थन दे रहे हैं। कोलकाता में पोलित ब्यूरो और कॉमरेड मीटिंग के बाद दिल्ली आते-आते वामपंथियों का चरित्र इतना क्यों बदल जाता है, ये सोचने वाली बात है। अब तक मेरे जैसे देश के बहुत से लोगों को ये लगता था कि वामपंथी भारत के हितों के लिए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का विरोध कर रहे हैं। अच्छा हुआ उनका दोगला चरित्र फिर से सामने आ गया। वैसे तो, अब ये चीन की भी हैसियत नहीं है। लेकिन, अब आप समझ सकते हैं कि अगर गलती से भी ऐसी संभावना बनी और चीन ने दुबारा हमारे देश पर हमला किया तो, वामपंथी किसके पक्ष में खड़े रहेंगे।


7 Comments

Sagar Chand Nahar · November 2, 2007 at 2:58 pm

अगर यही सरकार रही और वामपंथी तब भी सरकार को इस तरह समर्थन देते रहे तो लगता है और बगवान ना करे चीन ने आक्रमण कर दिया तो ये लोग उस समय सरकार को धमकायेंगे कि आप चीन के सामने हथियार मत उठाओ वरना हम समर्थन खींच लेंगे।
सोचिये कितनी भयानक दशा होगी वह जब देश का प्रधानमंत्री देश को बचाने की बजाय सरकार बचाने की जुगत में लगे होंगे।
और अगर देश ऐसा दुर्भाग्य आ गया कि सरकार ही इन लोगों बन गई तो हो सकता है कि चीन को खुद ही आमंत्रण दे दें।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

Gyandutt Pandey · November 2, 2007 at 10:59 pm

हाँ, कल कारत जी की यह चिंता मैने भी पढ़ी और बड़ी ‘रोचक’ लगी।

Raj Yadav · November 3, 2007 at 6:47 am

मैं हर्षवर्धन त्रिपाठी… बातों-बातों में बतंगड़ बन गया हूं। पत्रकार कहलाता हूं।”” वाह भाई साहब ,कितना सरलता पूर्वक आपने ,इतनी अच्छी बात कह दी …हो न क्यों आप जो हमारे अलाहाबाद के ठहरे ….बहुत अच्छा लगा आप का ब्लोग पढ़ के ,कभी हमारे भी ब्लोग पर तशरीफ़ लाये .धन्यवाद

हर्षवर्धन · November 3, 2007 at 7:09 am

राज जी
आपके ब्लॉग का पता तो डालिए। हम जरूर देखना चाहेंगे ।

संजीव कुमार सिन्हा · November 3, 2007 at 7:44 am

राष्‍ट्र, राष्‍ट्रीयता, राष्‍ट्रप्रेम वामपंथियों के लिए विचारधारा विरोधी बातें है। इनके लिए राष्‍टहित बाद में, विचारधारा पहले आता है। चीन परमाणु विस्‍फोट करे तो ठीक भारत करे तो जनविरोधी। आपने सही बताया है कि सीपीएम महासचिव प्रकाश करात इसलिए नहीं चिंतित हैं कि उन्हें भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से भारते के हितों को नुकसान होता दिख रहा है। वो, परेशान इसलिए हैं कि भारत-अमेरिका के साथ समझौता करके चीन को कमजोर कर देगा।

sharad · November 8, 2007 at 7:26 am

DIL KHUSH KAR DIYE. LEFT KI ORGINAL PAHCHAN YAHI HAI. MASCOW ME BARISH HOTI THI TO YE CHHATARI LAGATE THE. AB INKE MOTHER-FATHER CHINA HI HO GAYA HAI. INHONE KABHI BHARAT MATA KO MA MANA HI NAHI. KABHI RUSSIA TO KABHI CHIN. WEST BENAGAL ME TO LENIN KO BACHA NAHI PAYE PURE DESH ME LAL SALAM KARANE KI KHWAHISH RAKHATE HAI.

dheeraj · November 8, 2007 at 7:50 am

No doubt, this piece must be an eye-opener for any left supporter. Aftrer going through this, I felt ashamed on having soft corner for left parties. Even today, I am inclined towards leftism and marxism but what I feel about our national left leaders that they are a confused lot. Either they don’t realise the ground reality(which I fell is incorrect)or they want to maintain their separate identity by these foolish stances. They need to learn a lesson and this is possible only through exposing their real character and thinking before our countrymen.

Comments are closed.