ये जरूरी था। बताइए भारत जैसे देश से पूरी सेक्युलर कौम ही खत्म हो रही थी। क्या हिंदू, क्या मुसलमां। सब बौरा गए थे। सबने विकास की अफीम चाट ली है। सबको लगता है कि तरक्की मिले, जेब में रकम आए। अच्छा जी लें। अच्छे से रह लें। अरे इससे क्या होगा अगर भारत में हिंदू, मुसलमान की बात ही होना बंद हो जाए। बताइए हमारी यही तो ताकत है कि हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं। और इसी आधार पर हमारे देश में एक धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक तैयार हुआ। इतना मजबूत कि बरसों तो ढेर सारे सांप्रदायिक इस सेक्युलर वोटबैंक को टस से मस तक नहीं कर सके। सवा सौ साल पुरानी पार्टी का साथ भी था इन सेक्युलर वोटरों को। लेकिन, बुरा हो सांप्रदायिक ताकतों का। जिन्होंने लगके समझाना शुरू किया कि धर्मनिरपेक्ष होना ठीक नहीं है। धार्मिक बनाने लगे। बताओ भला हमें धर्म की चिंता सिवाय वोट के करने की जरूरत है क्या। ये हमारा भारत देश है। संविधान के आधार पर ही जब हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं तो क्या बद्तमीजी है कि इसे वोट बटोरने के अलावा धार्मिक बनाने की। देश की अच्छी बात ये थी कि मुसलमानों ने हमेशा सांप्रदायिक ताकतों को हराने वाले का ही साथ दिया। पहले कांग्रेस थी, फिर सपा, बसपा और फिर जाने कौन-कौन मिले लेकिन, हमारे देश की संवैधानिक बुनियाद पर हमने कभी धर्मनिरपेक्षता को जरा सा भी कमजोर नहीं होने दिया। ढेर सारे हिंदू भी हमारे साथ थे। कुछ सांप्रदायिक हिंदुओं को छोड़कर। ये सेक्युलर हिंदू, मुसलमान मिलकर ऐसे मजबूती से धर्मनिरपेक्षता बचाते बढ़ते गए कि सांप्रदायिक ताकतों को हमने अछूत बना दिया। हमारा धर्मनिरपेक्ष संविधान किसी को ऐसे सांप्रदायिक होने की इजाजत नहीं देता। फिर भला ये संघी, भाजपाई ऐसी बदतमीजी क्यों करने पर तुले हुए हैं। और उस पर भी ये नरेंद्र मोदी।

बताइए भला ऐसे भी होता है क्या। जब भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए ही अस्तित्व में है। और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमने पक्के तौर पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दिया था। तो ये कैसे संभव है कि बीजेपी किसी भी तरह से सांप्रदायिक होने से खुद को बचा पाए। बताइए ये कोई तरीका है कि एक नरेंद्र मोदी जो संघ का प्रचारक रहा, खांटी स्वयंसेवक है। वो मंदिर, मस्जिद तोड़कर सड़क चौड़ी करने की बात कर रहा है। अधर्म की बात कर रहा है। वो कह रहा है कि विकास सबके लिए जरूरी है। सांप्रदायिक लोगों के लिए विकास होगा जरूरी। धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए विकास से ज्यादा जरूरी है कि मंदिर, मस्जिद बीच सड़क बने। धर्म दिखे लोगों को। बताओ भला ये मोदी जिसी पार्टी ने इसे इतना कुछ दिया उसके मूल सिद्धांतों से ही समझौता कर ले रहा है। अरे बड़ी मुश्किल से तो हम धर्मनिरपेक्ष लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा सांप्रदायिक बनाया कि उसी के विरोध से हमारे सेक्युलर वोट मजबूत हो रहे थे। चाहे जो हो जाए। पांच साल चाहे जो बात कर लें। चुनाव के समय सांप्रदायिक ताकतों को हराना ही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य रहा। हम उस लक्ष्य में पिछले छे दशकों से कामयाब भी थे। लेकिन, ये नरेंद्र मोदी क्या आया। 2002 के बाद ये हमारी उस सेक्युलर वोटबैंक की बुनियाद को मजबूत करने की वजह ही नहीं दे रहा। ये मोदी कहता है कि विकास करो। मजबूत सरकार बनाओ। अरे भइया ये सब तुम्हीं कर लोगे तो हम क्या करेंगे। हमें विकास ही करना होता तो छे दशक कम थोड़े ही होते हैं। और ये फालतू की बात है। इसमें बड़ी मेहनत लगती है। बिना ज्यादा मेहनत के सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का फॉर्मूला जब हमने खोज लिया तो, भला हम कठिन विकास करके सांप्रदायिक ताकतों को हराने वाला फॉर्मूला क्यों आजमाने की सोचें। हम धर्मनिरपेक्ष लोगों को ज्यादा डर तबसे लगा जब हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के मसले पर अदालत के फैसले पर भी सांप्रदायिक ताकतों ने उत्पात नहीं मचाया। उससे भी ज्यादा डर हमें तब लगने लगा जब दिखा कि ये तो सांप्रदायिक होने से ही मजबूती से मना करने लगे हैं। और हमारे सेक्युलर वोट भी उन सांप्रदायिक ताकतों के पाले में जाने लगे हैं।

और सबसे जरूरी बात। भारत के मुसलमानों तुम बाबरी मस्जिद
से आगे जाने की सोचने लगे थे। वो भी सांप्रदायिक @narendramodi के भरोसे। उसका
विकास भी तुम्हें लुभाने लगा है। अब बताते हैं हम तुम्हें, तुम्हारे भर चुके घावों
को कुरेदेंगे, मिर्ची डालेंगे, हमारे सेक्युलर वोट, कम्युनल हो रहे थे। हम चुप कैसे
बैठे रह जाते। याद करो बाबरी मस्जिद को, सेक्युलर हो जाओ, सेक्युलर वोट बन जाओ।
आखिर कम्युनल, सेक्युलर की लड़ाई में सेक्युलर वोट ही न बचे तो हम किससे लड़ेंगे और
कैसे जीतेंगे। एक बार सेक्युलर, कम्युनल हो जाए तो फिर देखो ये मोदी कैसे जीतता है। किसे याद रहेगा कि देश पिछले एक दशक में सबसे कम तरक्की कर रहा है। किसे याद रहेगा पिछले एक दशक में जो घोटाले हुए उससे छोटे-मोटे देश नए बनकर तैयार हो जाए। किसे याद रहेगा कि महंगाई ने पिछले तीन साल से जेब में छेद कर रखा है।


4 Comments

chandrakant · April 4, 2014 at 9:18 am

राजनीति के हर रंग देखने को मिल रहे हैं। एक रंग कोबरापोस्ट का भी है। सब शतरंज की चाल चल रहे हैं । देखना है आखिरी बाजी किसके हाथ लगती है

    Neetu Singhal · April 4, 2014 at 9:58 am

    ऐसी कटुक टिप्पणियाँ लोकतंत्र हेतु नहीं अपितु एक भ्रष्ट तंत्र हेतु की जाती हैं…..

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · April 5, 2014 at 6:22 am

वाकई चिन्तित है सेकुलर गिरोह। 🙂

Sanjay Tripathi · April 7, 2014 at 1:44 pm

Nicely written exposing the true political colours. Congrats!

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