क्या सचमुच खाद्यान्न की कमी से महंगाई बढ़ रही है। इस सवाल का जवाब मुझे तो नही में दिख रहा है। और, ये नहीं का जवाब पक्का हुआ है आज पिताजी से इलाहाबाद बात करने के बाद। पिताजी का फोन आया तो, उन्होंने बताया कि आज गांव गए थे। लेकिन, सारी फसल बरबाद हो गई। मूंग बुआई थी और कुछ हिस्से में पिपरमेंट। लेकिन, ज्यादा बारिश होने से दोनों फसलें सड़ गईं। पिताजी ने कहा सिर्फ अपने ही खेतों में नहीं ज्यादातर लोगों के खेत में पानी लगने से फसल सड़ गई है।

प्रतापगढ़ जिले में हमारा गांव है। वहां हमारी फसल सड़ गई है, खेत में पानी भर जाने से। और, मैं मुंबई में हूं। जहां 4-5 दिन पहले ही मैंने ये खबर चलाई थी कि महाराष्ट्र सरकार राज्य के 35 जिलों में से 15 को सूखाग्रस्त घोषित कर रही है। साथ ही ये भी महाराष्ट्र में सूखे की वजह से मध्य प्रदेश की मंडियों में दाल के भाव चढ़ गए हैं। क्योंकि, सबसे ज्यादा दाल देश में महाराष्ट्र से ही जाती है।

ये देखने में सीधे-सीधे बारिश की वजह से पैदा समस्या दिख रही है। जो, आम है तो, फिर मैं इसे दुबारा क्यों लिख रहा हूं। दरअसल दुबारा मैं इसे इसलिए चिन्हित कर रहा हूं कि मॉनसून तो, फसल के सबसे जरूरी है ही। लेकिन, एक दूसरा पहलू है जो, मॉनसून से ज्यादा मैनेजमेंट सही न होने यानी मिसमैनेजमेंट की बात है। कुछ महीने पहले मूंग और पिपरमेंट जैसा ही हाल हमारी आलू का भी हुआ था। लेकिन, आलू न तो खेतों में पानी भरने से सड़ी थी। न, आलू की फसल सूखे की वजह से खराब हुई थी। हमारी आलू की फसल तो अच्छी हुई थी। लेकिन, हमारे जैसे ही सारे गांव और जिले के लोगों की आलू की फसल अच्छी हुई थी। हालात ऐसे बन गए कि आलू अठन्नी किलो बिकने लगा। सड़कों पर फेंका रहा-खेतों में सड़ाना पड़ गया। काफी आलू सड़ने के बाद हमें बड़े जुगाड़ से थोड़ा आलू कोल्ड स्टोरेज में रखने की जगह मिल गई।

इन हालातों का मैं जिक्र कर रहा हूं सिर्फ ये साबित करने के लिए देश में कितना मिसमैनेजमेंट है। महंगाई 5 जुलाई को खत्म हफ्ते में 11.91 प्रतिशत हो गई। अब कई बड़े अर्थशास्त्र के जानकार कह रहे हैं कि ये महंगाई दर 15 प्रतिशत तक भी जा सकती है। ज्यादातर लोगों को पहली नजर में महंगाई डिमांड-सप्लाई में फरक की वजह से दिखती है। जबकि, ये महंगाई डिमांड-सप्लाई में फरक की वजह से बिल्कुल नहीं है।

रिजर्व बैंक गवर्नर वाई वी रेड्डी भी दिल्ली दरबार में हाजिरी लेने के बाद जब बोले। तो, उन्होंने कहाकि, डिमांड भले ही बहुत बड़ी समस्या न हो। सप्लाई मैनेजमेंट समस्या का हल जरूर हो सकता है।

देश में कम से कम जरूरी अनाज (गेहूं-चावल-दालें) लोगों की जरूरत से काफी ज्यादा होता है। वो, भी तब जब मेरे गांव के खेत में ज्यादा पानी भर जाने से मूंग और पिपरमेंट की खेती सड़ जाती है। महाराष्ट्र में सूखे की वजह से दाल के भाव चढ़ जाते हैं। लेकिन, इसके बावजूद मुझे तो, कहीं से ऐसी रिपोर्ट नहीं दिखी कि लोग मंडी में गए और उन्हें गेहूं-चावल-दाल या फिर सब्जियां-फल नहीं मिले।

हां, महंगाई कैसे आती है वो, भी देखिए। मेरा परिवार इलाहाबाद में रहता है जो, गांव से आई या फिर दारागंज मंडी से सब्जी-दाल-चावल-गेहूं इस्तेमाल करता है। गांव से आई तो, उन्हें सस्ता मिलता है। वहां सब कुछ ज्यादा है। जो, खेती कर रहे हैं उनके पास बेचने के लिए मंडी नहीं है। उनके पास रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज नहीं है। नतीजतन वो सस्ते में बेच रहे हैं। कम पैसे पा रहे हैं।लेकिन, जब ज्यादा होने की वजह से अनाज आलू सड़ा तो, बचाकर रखने वाले जमाखोरों के लिए आगे पौ बारह हो गई।

वहीं मैं मुंबई में हूं। बिग बाजार से सब्जी और अनाज खरीदता हूं। पैकेज्ड अनाज और सब्जियां कई गुना ज्यादा भाव पर खरीद रहा हूं। मेरी जेब से पैसा गया। लेकिन, वो पैसा किसान के पास नहीं रिटेलर की जेब में पहुंचा। तो, हुआ ये कि मैं मुंबई ज्यादा पैसे कमा रहा हूं तो, मुझे बहुत ज्यादा पैसे उसी आलू के लिए देने पड़ रहे हैं जो, मेरे खेत में सड़ गई। यानी जिनके पास पैसे कम हैं उन्हें अपने सामान के पैसे कम मिल रहे हैं। और, जिनके पास पैसे ज्यादा हैं वो, बचा नहीं पा रहे हैं। उनसे उन्हीं सामान के लिए ज्यादा पैसा लिए जा रहे हैं जो, सस्ते में खरीदे गए हैं।

अफलातूनजी अभी जब मुंबई आए थे। तो, उनसे मिलने के लिए मैं भी गया था। वहां महंगाई पर हुई बहस में अभय तिवारी जी कह रहे थे कि डिमांड बहुत ज्यादा है जबकि, सप्लाई कम होती जा रही है। इसलिए महंगाई बढ़ रही है। उस दिन मैंने कहा था कि जरूरी चीजों की सप्लाई की बिल्कुल कमी नहीं है। सिर्फ मिसमैनेजमेंट की वजह से कहीं चीजों की कमी है तो, कहीं वो सड़ाना पड़ रहा है। और, महंगाई की असली जड़ भी मुझे यही लगती है।


6 Comments

दिनेशराय द्विवेदी · July 20, 2008 at 6:28 pm

कुप्रबंधन ही तो इस का एक मात्र कारण है। कुप्रबंधन इतना है कि जरूरत की वस्तुएँ कम और गैर जरूरी अधिक उत्पादित हो रही हैं। वितरण पर नियंत्रण समाप्त है। वहाँ सट्टेबाजों का अधिक है।

Mired Mirage · July 20, 2008 at 8:52 pm

क्या यह संभव नहीं है कि फसलों, जैसे आलू, फल, टमाटर आदि के प्रोसेसिंग युनिट गाँवों में ही लगाए जाएँ ताकि किसान को सही कीमत भी मिले और काम भी? परन्तु उत्तर प्रदेश में बिजली मिलेगी क्या?
घुघूती बासूती

Udan Tashtari · July 21, 2008 at 12:05 am

सही कह रहे है कुप्रबंधन ही वजह है और फिर वायदा बाजार की एक बहुत बड़ी भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता, वो भी विश्व स्तर पर.

Gyandutt Pandey · July 21, 2008 at 12:59 am

मार्केट मिसमैनेजमेण्ट या ग्लोबल सिचयुयेशन एक तरफ। पर अगर आसन्न चुनाव न होते तो मंहगाई इतनी ज्यादा न बढ़ती। क्या विचार है?

अभय तिवारी · July 21, 2008 at 2:28 am

आप की बात तार्किक मालूम होती है..

Sanjay Sharma · July 21, 2008 at 9:42 am

मुंबई में रहकर आपने हमारे आलू की चिंता की .आभार . खेती और खेतिहर की बात जब कभी उठती है और उठे बात का असर गुजरात, महाराष्ट्र ,पंजाब ,और हरियाणा पर जरा सा भी पड़े तो सरकार ,मिडिया ,और नौकरशाह खुश हो जाते हैं . जबकि बांकी के राज्य भी हिन्दुस्तान को आक्सीजन देता रहा है .
एक जमात तैयार करने की जरूरत है जो किसान को राहत दे .आप अपने चैनल से शुरू करिए न ! जिस राज्य के किसान संगठित हैं ,जागरूक हैं उन्हें सभी सुविधाए उपलब्ध होती रही है .
ये बीच के लोग इतने उस्ताद है कि कारण की खोज से अच्छे -अच्छे बुद्धिजीवी को भटकाते रहते हैं. बस कारण का पूंछ पकड़ कर महगाई ,महंगाई चिल्लाने को स्वतंत्र छोड़ देती है .

आप जगे हैं तो जगे रहिये कुछ समाधान निकलने तक . शुभकामना !

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