कहते हैं बदलाव हमेशा अच्छे के लिए होता है। शायद यही सोचकर यूपीए सरकार के अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कैबिनेट में कई बड़े बदलाव कर डाले। लेकिन, इस बदलाव के बाद अच्छे की कौन कहे। सरकार के खिलाफ माहौल और खराब हो गया है और इस माहौल को खराब करने में सबसे बड़ी वजह बन रहा है पेट्रोलियम मंत्रालय से जयपाल रेड्डी से बाहर जाना। पेट्रोलियम मंत्रालय छिनने से रेड्डी खुद खफा हैं ये उन्होंने साबित भी कर दिया। रेड्डी वीरप्पा मोइली को मंत्रालय सौंपने नहीं आए। अरविंद केजरीवाल के ट्वीट और मीडिया में रेड्डी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को रियायत के रास्ते में रुकावट की खबर ने सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही सरकार के लिए ये एक और बड़ी मुश्किल हो गई है कि आरोप साफ लग रहे हैं कि रेड्डी की विदाई सिर्फ इस वजह से हुई है क्योंकि, रेड्डी रिलायंस को उसकी मनचाही शर्तें सरकार पर लादने की छूट नहीं दे रहे थे।

पेट्रोलियम मंत्रालय से जब मुरली देवड़ा की विदाई हुई और जयपाल रेड्डी ने पेट्रोलियम मंत्रालय का जिम्मा संभाला तो, एक संदेश साफ गया कि अब रिलायंस इंडस्ट्रीज को शर्तों के मुताबिक ही काम करना होगा। दरअसल तेल महकमे के गलियारों में ये चर्चा आम रही है कि जनवरी 2006 से जनवरी 2011 के दौरान जब मुरली देवड़ा ये महकमा संभाल रहे थे तो,रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए मनचाही नीतियां तैयार करवाने जैसा माहौल था। हालांकि,मुरली देवड़ा इस बात को सिरे से नकारने की कोशिश करते रहे। जब सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट मीडिया में लीक हो गई थी जिसमें रिलायंस को दिए गए तेल-गैस खोज के केजी डी 6 ठेके में अनियमितता की खबरें आईं थी। तो, देवड़ा ने ये कोशिश की थी कि मीडिया में ये खबरें रेड्डी के मुंह से आएं कि मुरली देवड़ा ने ही पेट्रोलियम मंत्री रहते 2007में सीएजी को रिलायंस केजी डी 6 बेसिन की ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने को कहा था। रेड्डी ने ये बात नहीं मानी और रेड्डी ने कुछ ऐसे फैसले लिए जिसे रिलायंस के करोबारी हितों के सख्त खिलाफ देखा जा रहा है।

जयपाल रेड्डी ने रिलायंस के ऊपर शर्तों को पूरा नहीं करने और उत्पादन घटने के एवज में सात हजार करोड़ रुपए की जुर्माना लगा दिया। इतना ही नहीं जब रिलायंस ने दुनिया की बड़ी तेल कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ 7.2बिलियन डॉलर का सौदा किया तो, जयपाल रेड्डी ने पेट्रोलियम मंत्रालय से इसे मंजूरी देने के बजाए इसे सौदे को कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेज दिया। जबकि, रिलायंस बीपी को केजी डी 6 में हिस्सा बेचकर अपने विस्तार के लिए रकम की जरूरत को पूरा करना चाह रहा था। रेड्डी इतने पर ही नहीं माने उन्होंने रिलायंस केजी डी 6 बेसिन के दूसरे ऑडिट के लिए सीएजी को इजाजत दे दी। जबकि, रिलायंस नहीं चाहता था कि उसके बजट को पहले मंजूरी दे दी जाए। लेकिन, पेट्रोलियम मंत्रालय ने निवेश को मंजूरी नहीं दी। रेड्डी ने 2014 के पहले रिलायंस की गैस कीमत बढ़ाने की मांग को भी नामंजूर कर दिया।

जयपाल रेड्डी के ये फैसले सीधे तौर पर रिलायंस के खिलाफ गए लेकिन, आमतौर पर ये धारणा बनी कि काफी समय के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय में कॉर्पोरेट लॉबी कमजोर हुई है और नियमों से काम हो रहा है। क्योंकि, रेड्डी ने देवड़ा के समय के कई अधिकारियों को,खासकर रिलायंस के नजदीकी माने जाने वाले अधिकारियों को कम महत्वपूर्ण जगहों या दूसरा जगहों पर भेज दिया था। माना ये भी जाता है कि जयपाल रेड्डी पेट्रोलियम मंत्री के तौर पर सरकारी आर्थिक सुधार- जिसका सीधा मतलब इस सरकार में सब तय करने की इजाजत निजी हाथों में देना है- की रफ्तार भी तेज होने में रुकावट थे। बहुत समय से तेल कंपनियों के दबाव के बावजूद जयपाल रेड्डी डीजल के दाम पांच रुपए बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। जबकि, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आर्थिक सुधारों की रफ्तार में किसी तरह की रुकावट नहीं चाह रहे थे। अब जयपाल रेड्डी की विदाई सरकारी फैसले से इतर राजनीतिक मसला भी बन गई है।

भारतीय जनता पार्टी ने रिलायंस के दबाव की जांच की मांग कर दी है। अरविंद केजरीवाल साफ कह रहे है कि जयपाल रेड्डी को रिलायंस के हितों में बाधा बनने की सजा मिली है। और, ये सब ऐसे समय हो रहा है जब सरकार पहले से ही ढेर सारे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी हुई है। देश की अर्थव्यवस्था मे करीब दो प्रतिशत की हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज की है। और, रिलायंस येन केन प्रकारेण अपने इस साम्राज्य को और बढ़ाना चाहेगा ये स्वाभाविक है। ये भी सच है कि कारोबार करने में मुनाफा बढ़ाने-बनाने की चाह में कंपनियां गलत तरीके भी अपना सकती हैं। अपने मनमुताबिक काम कराने के लिए लॉबी भी बनाती हैं। अपने मनचाहे अधिकारियों को उन जगहों पर तैनात कराती हैं। ये कारोबारियों के लिए कभी-कभी शायद बेहद जरूरी भी होता होगा। लेकिन, सत्ता-सरकार किसी भी कीमत पर आम जनता के हितों की रक्षा के लिए होती है। नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे कारोबारी सरकारी खजाने को चोट न पहुंचा सके।

आम लोगों के, समाज के हक को न खा जाए। लेकिन, यूपीए-2 में आर्थिक सुधारों के नायक मनमोहन सिंह के इस बदलाव में जो, सबसे दुखद बात है वो, यही कि जिस तरह से ईमानदार छवि वाले जयपाल रेड्डी को हटाया गया वो, गले नहीं उतर रहा। भले ही वीरप्पा मोइली पूरी ईमानदारी से पेट्रोलियम मंत्रालय संभाले लेकिन, एक संदेश ये गलत चला गया कि सरकार रिलायंस के दबाव में है। और, ये सरकार कॉर्पोरेट दबाव के आगे टिक नहीं पाती। या यूं कहें कि सरकार समय आर्थिक सुधारों में रुकावट बनने वाले किसी को भी पसंद नहीं कर पाएगी। फिर चाहे वो कोई भी हो। और, सरकार की सुधारों की परिभाषा सब कुछ निजी हाथों में या कहें कि बाजार के हाथों में तय करने की ताकत देना है। इसलिए यूपीए-2 का ये बदलाव अच्छे के बजाय बुरे के संकेत ज्यादा देता दिख रहा है।

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