साईं की मूर्तियां मंदिरों से हटाईं जाएं। शंकराचार्य का ये फरमान मुझे कुछ पच नहीं रहा। संयोग से तीज की पूजा के लिए पत्नी के साथ मैं भी अपने सोसाइटी के बगल के मंदिर में गया। पत्नी पूजा रही और मैं मंदिर के एक पुजारी को मथने में लगा रहा। हमारे अपार्टमेंट के ठीक बगल का जो मंदिर है उसमें कई भगवानों की मूर्तियां हैं। मंदिर के अंदर भगवान शिव और बाहर के चबूतरे पर हनुमान जी। और उस चबूतरे से आगे दाहिनी तरफ शनिदेव का भी चबूतरा है। और मंदिर के बाहर की तरफ निकलते हुए आगे सफेद संगमरमर की सीढ़ियों से चढ़ते हुए सामने साईं बाबा भी विराजमान हैं। मैं जितनी देर रहा। देखा तो बहुतायत नौजवान जोड़े साईं बाबा से आशीर्वाद जरूर ले रहे थे। मैंने पुजारी जी से पूछा। क्या साईं बाबा की मूर्ति हटा रहे हैं। शंकराचार्य का फरमान आप तक पहुंचा कि नहीं। उन्होंने कहा मुझे तो नहीं आया। आपको आया क्या। मैंने कहा साईं भगवान हैं कि नहीं। जवाब में उन्होंने ढेर सारे सवाल दाग दिए। कहां से हैं। वहां कौन से भगवान थे। वहां साईं बाबा भगवान थे क्या। फिर गोल-गोल दर्शन पर उतर आए। हम-आप सामने खड़े हैं फिर भी एक दूसरे को समझते हैं। नहीं ना। तो फिर जो सामने ही नहीं है। उसको कैसे समझेंगे। फिर सवाल जिंदगी भर पानी पीने को नहीं दिया। मारकर भगा दिया। मर गए तो भगवान बना दिया। ऐसे होता है क्या। ऐसी ही ढेर सारी दार्शनिक बातों के बाद फिर बोले अब साईं बाबा भगवान तो नहीं ही हैं। संत हैं।

फिर मैंने सवाल पूछा कि मूर्ति हटाएंगे। मैंने कहा वैसे किस मूर्ति पर ज्यादा चढ़ावा आता है। कौन सी मूर्ति किसने लगवाई। इस बार जवाब सारे सवालों का जवाब था। बोले चढ़ावा तो सब पर ही आता है। और सारे भगवान भक्तों के ही तो हैं। जो भक्त जो मूर्ति लगवा देता है। वही लग जाती है। सब किसी न किसी ने दी ही है। और भगवान भक्त से बड़े थोड़े न होते हैं। भक्त हैं तो ही भगवान हैं। अब शंकराचार्य को समझ में आए न आए। मुझे जवाब मिल गया था।

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