बाजार अब लोगों को नए जमाने के साथ रहने की तमीज सिखा रहा है। छोटे शहरों में पहुंचते बड़े बाजार ये सिखा-बता रहे हैं कि अब कैसे रहना है, कैसे खाना है, क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कितना खरीदना है और क्या किसके लिए खरीदना जरूरी है। बस एक बार बाजार तक पहुंचने की जरूरत है। छोटे शहरों के लोग बाजार पहुंचने में लेट न हो जाएं। इसके लिए छोटे शहरों तक खुद ही बड़ा बाजार पहुंच रहा है। घर की जरूरत का हर सामान करीने से वहां लगा है। इतने करीने से कि, काफी ऐसा भी सामान वहां जाने के बाद जरूरी लगने लगता है जो, अब तक घर में किसी जरूरत का नहीं था। हमारे शहर इलाहाबाद में भी बड़ा बाजार पहुंच गया है।
अब इलाहाबाद छोटा शहर तो नहीं है लेकिन, बाजार के मामले में तो, छोटा ही है। कम से कम मैं तो, ऐसा ही मानता हूं। लेकिन, बड़ा बाजार वालों को यहां के बड़ा बाजार की समझ हो गई। इससे सस्ता और कहां का नारा लेकर बड़ा बाजार ने अपनी दुकान इलाहाबाद में खोल ली। बड़ा बाजार पहुंचा तो, 40 रुपए के खादी आश्रम के तौलिए से हाथ-मुंह पोंछने वाले इलाहाबादियों को एक बड़ा तौलिया, महिलाओं के लिए एक नहाने का तौलिया, दो हाथ पोंछने के तौलिए और दो मुंह पोंछने के छोटे तौलिए का सेट बेचने के लिए। गिनती के लिहाज से ये 6 तौलिए का पूरा सेट है 599 रुपए का, जिसकी बड़ा बाजार में कीमत है सिर्फ 299, ऐसा वो लिखकर रखते हैं। इलाहाबादी खरीद रहे हैं महिलाओं के नहाने वाले तौलिये से भी पुरुष ही हाथ मुंह पोंछ रहे हैं क्योंकि, अभी भी इलाहाबाद में महिलाएं बाथ टॉवल लपेटकर बाथरूम से बाहर आने के बजाए पूरे कपड़े पहनकर ही बाहर आती हैं। लेकिन, बड़ा बाजार इलाहाबादियों के घर में बाथ टॉवल तो पहुंचा ही चुका है।

इलाहाबादी परिवार का कोई सदस्य सुबह उठकर गंगा नहाने गया तो, घाट के पास दारागंज मंडी से हरी सब्जी, आलू-मिर्च सब लादे घर आया। गंगा नहाने नहीं भी गया तो, अल्लापुर, बैरहना, फाफामऊ, तेलियरगंज, कीडगंज, मुट्ठीगंज, सलोरी, चौक जैसे नजदीक की सब्जी मंडी से दो-चार दिन की सब्जी एक साथ ही उठा लाता था। चार बार मोलभाव करता था। झोला लेकर जाता था। सब एक साथ भरता जाता था। सुबह सब्जी लेने गया तो, साथ में जलेबी-दही भी बंधवा लिया। लेकिन, अब बड़ा बाजार आया तो, सब सलीके से होने लगा। आलू भी धोई पोंछी और पॉलिथीन में पैक करके उसके ऊपर कीमत का स्टीकर लगाकर मिलने लगी है। बाजार ने नाश्ते का भी अंदाज बदल दिया है। नाश्ते में इलाहाबादी दही-जलेबी, खस्ता-दमालू की जगह सॉस के साथ सैंडविच खाने लगा है।

बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर बनी टॉफी के लिए भी इलाहाबादी बड़ा बाजार जाने लगा है। टॉफी का बिल देने के लिए लाइन में लगा है। पीछे से किसी ने मजे से बोला क्या एक टॉफी के लिए इतनी देर लाइन में लगे हो- ऐसही लेकर निकल जाओ। लाइन में ठीक पीछे खड़ा आलू की पॉलिथीन वाला जो, शायद मजबूरी में सलीके में था, खीस निपोरकर बोला– चेकिंग बिना किए नए जाए देतेन, पकड़ जाबो। और नए तो, अइसे जाइ दें तो, सब भर लइ चलें।

इलाहाबाद का बिग बाजार तीन मंजिल के कॉम्प्लेक्स में खुला है। तीसरी मंजिल से खरीदारी के लिए जाते हैं। पहली मंजिल पर बिल जमा करके जेब हल्की करके और हाथ में बिग बाजार का भारी थैला लेकर बाहर निकलते हैं। इन तीन मंजिलों के चढ़ने-उतरने में और बिग बाजार की लाइन में लगे-लगे इलाहाबादी बदल रहा है। इलाहाबादी लाइन में लगने लगा है। सलीके से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा है। 55 साल का एक इलाहाबादी बाजार के साथ सलीका सीखती-बदलती अपनी 18-19 साल की बिटिया के साथ सॉफ्टी खा रहा है, बड़ा बाजार के भीतर ही। बड़ा बाजार जिस कॉम्प्लेक्स में खुला है उसके ठीक सामने शान्ती कुल्फी की दुकान है। शांती की कुल्फी-फालूदा इलाहाबादियों के लिए कूल होने की एक पसंद की जगह थी (जब तक कूल शब्द शायद ईजाद नहीं हुआ रहा होगा)। लेकिन, कुल्फी-फालूदा अब इलाहाबादियों को कम अच्छा लग रहा है, होंठ पर लगती सॉफ्टी का स्वाद ज्यादा मजा दे रहा है।

बड़ा बाजार के ही कॉम्प्लेक्स में मैकडॉनल्ड भी है, हैपी प्राइस मेन्यू के साथ। सिर्फ 20 रुपए वाले बर्गर का विज्ञापन देखकर इलाहाबादी अंदर जा रहा है और 100-150 का फटका खाकर मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा है। इलाहाबादी पैकेट का आटा लाने लगा है, पैकेट वाले ही चावल-चीनी की भी आदत पड़ रही है। सलीके से रहने-खाने-पहनने को बाजार तैयार कर रहा है। घर का आटा-दाल-चावल खरीदकर बिल काउंटर पर आते-आते इलाहाबादी फिर ठिठक रहा है, अमूल कूल कैफे का टिन भूल गया था। लाइन लंबी थी, नंबर आते तक अमूल कूल कैफे के 2 चिल टिन भी बिल में शामिल हो चुके हैं।

बाजार सलीका सिखा रहा है! बाजार में सलीके से रहने के लिए ब्रांड का सबसे अहम रोल है। जितनी ज्यादा ब्रांडेड चीजें, उतना ही ज्यादा सलीका (अब माना तो ऐसे ही जाता है)। किसी भी बड़े से बड़े बाजार में मिल रहे ब्रांड का नाम लीजिए। इलाहाबादी उस ब्रांड से सजा हुआ है। बाजार आया तो, अपने साथ बिकने की गुंजाइश भी बनाता जा रहा है। होली-दीवाली, कपड़े-जूते और साल भर-महीने भर का राशन एक साथ खरीदने वाला इलाहाबादी भी हफ्ते के सबसे सस्ते दिन का इंतजार कर रहा है। और, सबसे सस्ता बुधवार आते ही बड़ा बाजार में लाइन में लग जाता है।

मुझे याद है 5-7 साल पहले वुडलैंड का कोई खास मॉडल का जूता सिविल लाइंस के कपूर शूज, खन्ना शूज और ऐसी ही कुछ और बड़ी दुकानों के चक्कर लगाने पर भी मिल जाए तो, मजा आ जाता था। अब वुडलैंड के हर मॉडल से बाजार सजा हुआ है। दूसरे बदलते इलाहाबादियों की ही तरह मैकडॉनल्ड, बिग बाजार और दूसरे ऐसे ही खास ब्रांड्स को समेटने वाले मॉल में गया तो, छोटे भाई ने कहा गाड़ी आगे लगाइए, यहां पार्किंग मना है। सिविल लाइंस में जहां कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देने का सुख था। कार की खिड़की से झांकते रास्ते में लोगों से नमस्कारी-नमस्कारा करते निकलने वाले इलाहाबादियों का ये सुख बाजार ने उनसे छीन लिया है। अब इलाहाबादी सिविल लाइंस में पार्किंग खोजता है। पार्किंग खाली नहीं दिख रही थी तो, छोटा भाई गाड़ी में ही बैठा, मैं इलाहाबाद को बदल रहे बाजार के दर्शनों के लिए चल पड़ा। खैर अच्छा-बुरा जैसा भी सही बाजार उन शहरों के लोगों को बदल रहा है जो, बाजार के नाम से ही बिदक जाते हैं। बाजार लोगों को चलने-दौड़ने के लिए तैयार कर रहा है।


6 Comments

Sanjeet Tripathi · August 30, 2007 at 7:43 am

सही!! सटीक वर्णन!!
यही हाल हमरे रायपुर का है भाई, यहां पहले विशाल मेगा मार्केट( हो सकता है नाम मुझे ठीक से याद ना हो) खुला फ़िर बड़ा बाज़ार खुला और अब खुला है सिटी मॉल 36, खबर यह भी आई है कि ताज़ ग्रुप ऑफ़ होटल ने यहां जमीन खरीद ली है होटल बनाने के लिए, अखबार के किसी कोने मे न्यूज़ एज़ंसी की छोटी सी खबर यह भी आज ही पढ़ने को मिली कि छत्तीसगढ़ सर्वाधिक गरीब राज्यों मे से एक है। कितने विरोधाभास एक साथ लेकर जी रहे हैं हम।

Udan Tashtari · August 30, 2007 at 2:27 pm

बढ़िया विश्लेष्ण किया, सही है.

गिरिजेश · September 2, 2007 at 8:15 am

छोटे शहरों में पहुंचते बड़े रिटेल चेन्स एक ओर छोटे कारोबारियों का धंधा चौपट कर रहे हैं, दूसरी ओर आम आदमी को सस्ते का छलावा देकर लूट रहे हैं।
जैसा कि आपने लिखा – “सिर्फ 20 रुपए वाले बर्गर का विज्ञापन देखकर इलाहाबादी अंदर जा रहा है और 100-150 का फटका खाकर मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा है। “
विडंबना ये है कि आम आदमी से कंज्यूमर में बदलते लोग इसे विकसित होने या आभिजात्य का प्रतीक मान रहे हैं। ये शायद धनाढ्य वर्ग से उनकी मनोवैज्ञानिक होड़ का नतीजा भी है। उनके इस खर्च को ये बताने या सोचने का सुख कंपन्सेट करता है कि आज हम मैकडॉनल्ड गए थे।
शॉपिंग मॉल या आर्गनाइज्ड रिटेल का तजुर्बा नया है उनके लिए, जाहिर है इसका एक आकर्षण है।
लेकिन ये आकर्षण, ये जादू, ये तंद्रा टूटनी चाहिए। नहीं तो देखते-देखते पूरा शहर ही बाजार हो जाएगा और लोग, सिर्फ ग्राहक, घोर ग्राहक …

Naresh Soni · September 2, 2007 at 2:04 pm

मजा आ गया…
इलाहाबाद से बहुत ज्यादा तो राबिता नहीं रहा… लेकिन कुछेक बार जाने का जो मौका मिला, उससे इलाहाबाद की जो तस्वीर हमेशा रही है, लग रहा है वह अब नया चेहरा तलाश रही है।
सोचने वाली बात ये है कि हम किधर जा रहे हैं, रिटेल की ये क्रांति हमें किस ओर ले जा रही है?
इन बड़े बाजारों का अपना फायदा है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन इलाहाबाद के सीधे सादे लोग क्या उसी चका-चौंध का हिस्सा बन रहे हैं, जो क्रेडिट कार्ड की उधारी जिंदगी पर ऐश करते हैं…

जहां के लोग अपना आज भले ही सादा जीवन और फाकाकशी में गुजारते रहे हों… लेकिन कल के लिए तैयारी करते थे.. आज क्रेडिट कल्चर में कदम रख रहे हैं… क्या यही है लिविंग स्टैंडर्ड बढ़ाने का एकमात्र रास्ता.. ?

लेख बहुत अच्छा लगा… शब्दों के साथ कभी खुद को चौक में तो कभी बड़ा बाजार में खड़ा पाया… कभी गंगा के तट पर तो कभी उसी बड़े बाजार की बिलिंग कतार में भी होकर आया…

लगे रहिए…. नमस्कार

Vivek Satya Mitram · November 20, 2007 at 8:26 am

हर्ष जी, सबसे पहले तो मैं आपको ये बता दूं कि हम एक दूसरे से मिल चुके हैं। स्टार ज्वाइन करने के बाद मैं अल्का से मिलने सीएनबीसी आया था तो उसने आपसे परिचय कराया था। आईआईएमसी के मेरे कुछ मित्र आजकल आपके साथी हैं। खैर, बाजार और उसके विस्तार की बात मैं फिलहाल नहीं करुंगा। एक बात जरुर कहना चाहूंगा। आपके लिखने के अंदाज ने मुझे कुछ वक्त के लिए इलाहाबाद पहुंचा दिया। शब्दों से एक माहौल तैयार करने की बाजीगरी में आप वाकई माहिर हैं। बधाई…। बाकी बातें फिर कभी।

Vivek Satya Mitram · November 20, 2007 at 8:26 am

हर्ष जी, सबसे पहले तो मैं आपको ये बता दूं कि हम एक दूसरे से मिल चुके हैं। स्टार ज्वाइन करने के बाद मैं अल्का से मिलने सीएनबीसी आया था तो उसने आपसे परिचय कराया था। आईआईएमसी के मेरे कुछ मित्र आजकल आपके साथी हैं। खैर, बाजार और उसके विस्तार की बात मैं फिलहाल नहीं करुंगा। एक बात जरुर कहना चाहूंगा। आपके लिखने के अंदाज ने मुझे कुछ वक्त के लिए इलाहाबाद पहुंचा दिया। शब्दों से एक माहौल तैयार करने की बाजीगरी में आप वाकई माहिर हैं। बधाई…। बाकी बातें फिर कभी।

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