पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।

मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।

ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।

ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।

हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।

गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।

और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।

नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती … तुझे हमने दलितों का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई …

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो

और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है –

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए


10 Comments

डॉ. मनोज मिश्र · June 30, 2009 at 7:06 am

आपने बहुत सटीक लिखा है परन्तु जमीनी हकीकत यही है की फिलहाल अभी तक मायावती जी दलित स्वाभिमान की प्रतीक ही बनी हुई हैं .दलितों को इससे कोई मतलब नहीं अफ़सोस जनक पहलू यह है की वे इस बात को गर्व के साथ बताते हैं .

Nirmla Kapila · June 30, 2009 at 7:39 am

मुझे लगता है कि मायावति के करिश्मे से आपका करिश्मा जरूर चलेगा देर सवेर दलितोम को समझ आ जायेगी बहिन जी की करतूत अपना ये अभियान जारी रखें शुभकामनायें हाथी से बडी ताकत कलम मे होती है

अभिनव आदित्य · June 30, 2009 at 8:18 am

तुकबंदी बहुत शानदार है… बधाई. दरअसल, दलितों की नुमाइंदगी करने वाली मायावती का मूर्ति प्रेम सचमुच उन्हे एक दिन "पत्थर के सनम" बना देगा और वो आम जनता ही नहीं दलितों के लिए भी महज "बुत" बन जाएँगी.

बकबकिया · June 30, 2009 at 10:10 am

संजय कुमार मिश्र
मरने वाले की अंतिम इच्छा इस देश में पूछने की परम्परा सदियों पुरानी है। यहां मामला वैसा भले ही न हो लेकिन कोई राजनीतिज्ञ अगर इतना दूर दृष्टा हो कि उसे अपने पतन का आभास हो जाए तो फिर आखिरी इच्छा तो पूरी कर ही सकता है। अब सवाल यह है कि यह पूरी माया गरीबों की माया से खेली जा रही है। जो लोगों को और न्यायपालिका को नागवार गुजर रही है। इसलिए इसका तो हिसाब देना ही पडेगा। बहरहाल आपका यह समसामयिक आलेख बहुतों को पसंद आएगा और कुछ को चुभेगा भी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह आलेख अपने लेखन उददेश्य को जरूर प्राप्त करेगा।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · June 30, 2009 at 2:41 pm

अब हम क्या कहें…। यूपी से हैं और वह भी…

Harinath · June 30, 2009 at 3:04 pm

सर, बहुत सटीक लि‌‌खा है.

पागल पत्रकार · June 30, 2009 at 6:56 pm

सुना है मुर्तिकार ने ग़लती से मायावती और हाथी दोनो की मुर्तियों को मिला डाला है!!
ये न्यूज़ पढ़िए –

http://www.fakingnews.com/2009/06/hunt-on-for-sculptor-who-merged.html

K M Mishra · July 1, 2009 at 1:28 pm

पत्थर की मायावती … तुझे हमने दलितों का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई …

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो

pahle ye gaana Mulayam Singh Ga rahe The ab Pradesh ki Janta bhi ise gunguna rahi hai.

sharad · August 19, 2012 at 12:56 pm

jyada din nahi chalega ek. Bahut jaldi hi ek parivartan dikhai dega

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