सरकार का मानना है कि देश में तलाक न मिलने से लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है इसलिए वो, हिंदू विवाह कानून में बदलाव करके विवाह विच्छेद यानी पति-पत्नी के बंधन को तोड़ने के 9 आधारों में दसवां आधार शामिल करने जा रही है जिससे लोगों को आसानी से तलाक मिल सके।
भारत में अभी 1.9 प्रतिशत लोग ही हैं जो, शादी करने के बाद उसे तोड़ने का साहस जुटा पाते हैं। अब हमारी सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों में ये साहस भरना चाहती है और इसीलिए शादी तोड़ने के कानून में पश्चिमी देशों की नकल करके बदलाव करना चाहती है। अब अगर वहां की बात करें तो, हम तलाक के मामले में काफी पिछड़े दिखते हैं। जैसे शादी करने वाले 100 अमेरिकियों में से 55 तलाक लेते हैं और शायद फिर शादी करते हैं या बिना शादी किए ही कई शादियों का मजा लेते हैं। शादी तोड़ने का जो दसवां आधार प्रस्तावित है वो, है इनएविटेबल ब्रेकअप- यानी पति-पत्नी अब एक साथ नहीं रह सकते इस आधार पर उन्हें तलाक मिल जाएगा। इसमें ये साबित करने की जरूरत शायद थोड़ी कम रह जाएगी कि आखिर क्यों साथ नहीं रह सकते।

ये जो नया प्रस्ताव है इसे महिलाओं के पक्ष का बताने की कोशिश हो रही है ये कहकर कि ज्यादातर तला न मिलने से महिलाओं का जीवन नर्क हो जाता है। जबकि, सच्चाई इसके ठीक उलट है भारतीय समाज में तलाक के लिए गए मामलों में से सिर्फ दस प्रतिशत ही ऐसे होते होंगे जिसमें महिला जल्दी तलाक चाह रही होगी। क्योंकि, इस समाज में तलाक के बाद पुरुषों के लिए तो दूसरी पत्नी खोज लेना फिर भी आसान होता है लेकिन, किसी तलाकशुदा महिला को एक तलाकशुदा पुरुष भी बमुश्किल ही पत्नी बनाना चाहता है। महिलाओं के पक्ष का ही बताकर इसे प्रगतिशील बताने की कोशिश हो रही है। समाज में जो दबे-छिपे चल रहा है उसे कानूनी मान्यता देकर प्रगतिशील बनने-बताने की परंपरा तेजी से चल रही है। अब परिवार तोड़ने में तेजी दिखाकर प्रगतिशील बनने की कोशिश हो रही है।

ये प्रगतिशील बनने-बनाने का जो, सिलसिला चल रहा है। वो, एकदम से भारत को अमेरिका बनाने पर तुला है। पहले ये कहा गया कि नए बन रहे समाज में लड़के-लड़की जब घर से दूर रह रहे हैं तो, स्वाभाविक हैं कि उनमें निकट के रिश्ते बनेंगे और इसलिए एक प्रगतिशील फैसला आया कि लिव इन रिलेशनशिप में कोई बुराई नहीं है। यहां तक कि अदालत ने भी तथाकथित प्रगतिशील लोगों के फैसले पर मुहर लगा दी।

एक और प्रगतिशील फैसले को कानूनी मान्यता मिलने के बाद देश के मीडिया में ऐसे दिखा जैसे पूरा भारत समलैंगिक (गे-लेस्बियन) संबंधों के लिए मरा जा रहा था और उसे समलैंगिक संबंधों के कानूनी आधार मिल जाने से आस्थावान लोगों के गंगा नहाने जैसा सुख प्राप्त हो गया है। लगा जैसे सब दबे-छिपे सिर्फ समलैंगिक रिश्ते ही बना रहे थे। वो, तो कानून के डर से विवाह जैसे संस्थान चल रहे थे। शायद भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश होगा जहां विवाह जैसी संस्था इतनी मजबूत है। तथाकथित प्रगतिशील, तर्कवान लोग विवाह संस्था की ढेर सारी खामियां तो लगातार खोजते रहते हैं लेकिन, इस बात को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं कि जिस भारतीय समाज में सिर्फ एक पत्नी की वैधता है उसमें इतने पति-पत्नी के रिश्तों में से सिर्फ 1.9 प्रतिशत ही क्यों कानून के दरवाजे अपने रिश्ते को तोड़ने के लिए पहुंच रहे हैं।

पश्चिमी समाज में तो, पुरुष-स्त्री बस देह के रिश्ते से ही जाने जाते हैं। मुसलमानों तक में एक साथ निकाह वैध होने से एक पुरुष चार स्त्रियों के साथ संबंध बनाने की खुली छूट पा जाता है। लेकिन, भारतीय समाज में सिर्फ एक स्त्री के संबंध कैसे चल रहे हैं इसकी चर्चा दबा दी जाती है। पश्चिमी समाज इनएविटेबल ब्रेक अप के सिद्धांत पर चल रहे हैं तो, मुस्लिम समाज तलाक-तलाक-तलाक कहकर एक नए संबंध की बुनियाद रख लेते हैं। पश्चिमी समाज में पुरुष-स्त्री दोनों के एक साथ कई शारीरिक रिश्ते बनाने और मुस्लिम समाज में एक पुरुष के एक साथ कई स्त्रियों से शारीरिक रिश्ते बनाने की छूट के बावजूद इन समाजों में स्त्रियों के हक की कितनी बात हो पाती है ये छिपी नहीं है।

अब सरकार ऐसा खुलापन और यौन स्वच्छंदता हिंदू समाज को क्यों परोसना चाहती है। क्यों चाहती है कि तलाक-तलाक-तलाक के अंदाज में हिंदू समाज में भी पुरुष-स्त्री सिर्फ देह के रिश्ते से ही बंधे रहें। हिंदू समाज में किसी पुरुष-स्त्री के संबंध में परिवार की जो भूमिका है उसे नजरअंदाज करने की कोशिश क्यों हो रही है। वैसे ही पश्चिमी विकास के मॉडल पर चलते हुए हिंदू परिवार भी एकांगी, न्यूक्लियर होते जा रहे हैं। यानी परिवार तोड़ने का काम तो पहले से ही विकास की नई परिभाषा आसानी से कर रही है। अब लिव इन हो, वयस्क स्त्री-पुरुषों के बीच मनमर्जी से शारीरिक संबंध बनाना हो या फिर दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच मर्जी से शारीरिक संबंध बनाने को कानूनी मान्यता हो सब परिवार, विवाह की संस्था पर ही तो चोट कर रहे हैं। अब जल्दी से जल्दी तलाक कराकर क्या परिवार, विवाह की संस्था को पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश में है सरकार।

लिव इन, वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच मनमर्जी से बनाए गए प्रगतिशील संबंधों में हर रोज विवेका बालाजी जैसों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। 2 महीने के बने ब्वॉयफ्रेंड से लेकर पुराने ब्वॉयफ्रेंड की पूरी कतार की तलाश की जा रही है कि किसने इतना तनाव दे दिया कि विवेका को आत्महत्या करनी पड़ी। जरा सोचकर बताइए ना विवाह संस्था में घर में पति से रोज झगड़ने के बावजूद कितनी पत्नियां होंगी जिन्हें तनाव की वजह से आत्महत्या करनी पड़ती है। प्रगतिशील लोगों को आंकड़े कम पड़ने लगेंगे तो, वो घरेलू हिंसा के आंकड़े जुटाकर ले आएंगे और चाहेंगे हर छोटी-मोटी घरेलू हिंसा की शिकार महिला को तलाक मिल जाए। लेकिन, इस बात पर शायद ही बहस करना चाहेंगे कि मनमर्जी से देह के आधार पर बने संबंधों में कितनी हिंसा हो रही है।

सवाल यही है कि हम जब विवाह, परिवार नाम की संस्था का कोई विकल्प नहीं खोज सके हैं तो, फिर इस मजबूत संस्था को पहले ढहा देने की कोशिश क्यों कर रहे हैं। पश्चिमी समाज से नकलकर लाई गई इनएविटेबल ब्रेक अप थियरी ही है कि वहां की सरकारों को ओल्डएज होम पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है।

एक चुटकुला जो, मेरे मोबाइल पर कुछ दिन पहले ही आया कि भारतीय लड़की ने अमेरिकन लड़की से पूछा मेरे 4 भाई और 6 बहनें हैं। आपके कितने हैं। अमेरिकन लड़की ने जवाब दिया—मेरे भाई-बहन नहीं हैं। मैं अकेली हूं लेकिन, मेरी पहली मॉम से 3 पापा और पहले पापा से 4 मॉम हैं। तथाकथित प्रगतिशील फैसलों से परिवार, विवाह संस्था पर चोट से शायद इस चुटकुले की भारतीय लड़की भी अमेरिकन बन जाएगी।


7 Comments

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi · June 29, 2010 at 8:23 am

इस आलेख के अनेक बिन्दुओं से असहमति है।

रंजन · June 29, 2010 at 8:59 am

कानून होने से लोग तलाक लेना चाहेगें.. तलाक की सेल लगने वाली है…. क्या तर्क है….

प्रवीण पाण्डेय · June 29, 2010 at 10:33 am

लेख में उठाये बिन्दु महत्वपूर्ण हैं । संस्कृतियों के अन्तर पर तथाकथित प्रगतिशीलता का जोड़ नहीं लगाया जा सकता है । मननीय लेख ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · June 30, 2010 at 3:26 am

आदरणीय दिनेश जी, आप अपनी असहमतियों को विस्तार से बताएं तो अच्छा हो। इस कानून की विशेषता को ठीक से समजने में भी मदद करें तो और अच्छा हो।

मुझे मोटे तौर पर हिन्दू समाज में विवाह नामक संस्था में बहुत सी अच्छाइयाँ दिखती हैं। जिन बातों के लिए इसकी आलोचना होती है उनका समाधान शायद इसके बाहर भी नहीं है। स्वच्छन्द जीवन शैली के जो तनाव हैं उनका कोई समाधान नहीं दिखता।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो इस उपागम का सबसे बड़ा आधार इस परिवार और विवाह जैसी संस्था का स्थायी होना ही है। मुझे नहीं लगता कि इनके कमजोर होने के बाद हमारे समाज का स्वरूप ऐसा रह पाएगा।

hem pandey · June 30, 2010 at 6:15 am

'सवाल यही है कि हम जब विवाह, परिवार नाम की संस्था का कोई विकल्प नहीं खोज सके हैं तो, फिर इस मजबूत संस्था को पहले ढहा देने की कोशिश क्यों कर रहे हैं। पश्चिमी समाज से नकलकर लाई गई इनएविटेबल ब्रेक अप थियरी ही है कि वहां की सरकारों को ओल्डएज होम पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। '

– बिलकुल सही निष्कर्ष. आज भारतीय समाज में 'परिवार और रिश्तों' को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है, न कि उसे तोड़ने की.

अनामिका की सदाये...... · July 1, 2010 at 5:16 pm

आप की इस रचना को शुक्रवार, 2/7/2010 के चर्चा मंच के लिए लिया जा रहा है.

http://charchamanch.blogspot.com

आभार

अनामिका

संगीता स्वरुप ( गीत ) · July 2, 2010 at 7:00 am

विचारणीय आलेख

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