पंडित, ठाकुर, गुर्जर, जाट या फिर जैसे मैं हर्षवर्धन त्रिपाठी हूं तो, गाड़ी पर त्रिपाठी। ये सब लिखने का काम हमेशा होता रहता है। जाति की श्रेष्ठता या फिर जाति की दबंगई दिखाने-बताने की शायद इच्छा रहती होगी। लेकिन, इस समय उत्तर प्रदेश में एक ही जाति है जिसके साथ सत्ता समीकरण काम करता है। जाति वही जिसके नाम पर मुलायम सिंह यादव का पूरा परिवार संसद, विधानसभा में है। जो नहीं है धीरे-धीरे पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। ये स्थिति गजब है। एक दिन मैंने ऐसे ही सोचा और हफ्ते भर में कोशिश करके कुछ कारों के पीछे सत्ताधारी लोगों की जाति की तस्वीर उतार ली। ये नोएडा में दफ्तर आते-जाते की कुछ तस्वीरें हैं। एक दिन तो कमाल ये हुआ कि एक के पीछे एक 5 कारें चल रही थीं। और सब पर यादव लिखा हुआ था। उसमें भी एक टैक्सी की सूमो भी थी। शायद टैक्सी वाले को पुलिस वाले की बेवजह वसूली से निजात मिल जाती होगी। 

 टाटा सफारी वैसे ही दबंगई की थोड़ी बहुत निशानी हो ही जाती है। कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में तो ऐसा ही है। लेकिन, इसके बाद भी इस सरकार में इन साहब को यादव लिखाना ज्यादा सुरक्षित और श्रेष्ठता का प्रतीक लगा।

ये सबसे कमाल का मिलान आज सुबह दफ्तर आते समय देखने को मिला। पुलिस-प्रशासन से ताकतवर भला कौन होता है। ढेर सारी ऐसी कारें मिल जाएंगी जिस पर प्रेस के साथ पुलिस का भी स्टीकर लगा मिल जाता है। कभी-कभी तो बार काउंसिल का भी। लेकिन, ये अद्भुत है कि पुलिस के साथ भी यादव लिखाना इन्हें ज्यादा बेहतर लगा। ये यादव जाति लिखने-लिखाने का मसला नहीं है। सोचिए कि जिस प्रदेश के लोग सिर्फ सत्ता की जाति का प्रदर्शन करके खुद को सुरक्षित और ताकतवर मानते हैं। उस प्रदेश का क्या होगा। दुर्भाग्य कि उसी उत्तर प्रदेश का मैं भी हूं।

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