नसीब बदनसीब की बड़ी
चर्चा हुई दिल्ली विधानसभा के चुनाव में। वैसे तो ‘नसीबवाला’ कौन कितना है, ये समझना बड़ा मुश्किल है। लेकिन, कम से कम आज
केंद्रीय सरकार के बजट के बाद मध्यम वर्ग तो खुद को बदनसीब ही महसूस कर रहा होगा।
बदनसीबी इस बात की कि बजट महीने के अंत में क्यों आता है। फरवरी में ही क्यों आता
है। फरवरी की बजाए दूसरा महीना होता तो शायद 2 दिन और मिलते तेल कंपनियों को कच्चे
तेल की कीमतों की समीक्षा के लिए। लेकिन, 28 दिन की फरवरी, सुबह अरुण जेटली ने कम
समझ में आने वाला बजट पेश किया तो, शाम को तेल कंपनियों ने रहा सहा मध्यवर्ग को
समझा दिया। समझा दिया कि कोई छूट नहीं जेटली साहब कह रहे हैं कि मध्यवर्ग को अपने
पैसे की चिंता खुद करनी है। इसलिए अपने ऊपर जरा सा भी बोझ न बढ़ाते हुए जल्दी से
मध्यवर्ग पर तीन-तीन रुपये से ज्यादा पेट्रोल-डीजल महंगा कर दिया। अच्छा है अब
चाहे डीजल गाड़ी हो या पेट्रोल- दोनों को समान तनाव मिल रहा है। अब भले ही ये
पेट्रोल-डीजल महंगा कच्चे तेल के महंगे होने से हो रहा है। लेकिन, चूंकि दिल्ली
चुनाव के समय खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोल गए हैं कि नसीब का बड़ा महत्व
होता है तो लोग नसीब, बदनसीब की चर्चा करने लगे हैं। अब बीजेपी के लोग ये समझाने
की कोशिश करेंगे कि पेट्रोल-डीजल कच्चे तेल के महंगा होने से हुआ है तो जनता फिर,
समझ रहे हैं ना। और ये ट्रैक गड़बड़ाने की शुरुआत है जिसे उम्मीद करते हैं कि
प्रधानमंत्री जी संभाल लेंगे। क्योंकि, फिर से देश को दस प्रतिशत की तरक्की की
रफ्तार का सपना आने लगा है। या यूं कहें कि देश के नेताजी लोग फिर से वो वाला सपना
धो-मांजकर दिखाने लगे हैं। किस्मत कर्म के साथ चले तो बडा मजा देती है। कर्म कसके
किया तो किस्मत ऐसे साथ दे देती है कि लगता है कि सारी दुनिया किए को सच साबित
करने की साजिश में साथी हो गई है। सिर्फ किस्मत के भरोसे हुए तो फिर वही साजिश
करने वाले विरोधी पाले में चले जाते हैं। इसलिए कर्म-किस्मत के संतुलन को समझना
होगा ठीक वैसे ही जैसे गरीब और अमीर का संतुलन बजट बनाने में समझना जरूरी होता है।
जिस तरफ भी पलड़ा झुकेगा, न्याय का तराजू गलत तौलेगा। किस्मत उस ग्रह की तरह है कर्म के मजबूत होने पर उसे और मजबूत करता है। कर्म कमजोर हुआ तो वही किस्मत की मजबूती शीर्षासन करा देती है।