(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। दरअसल यही गांव और शहर का फर्क भारत और इंडिया का फर्क है। बोधिसत्व अपनी एक पोस्ट में मुंबई में इलाहाबाद खोज रहे थे। गांव खोज रहे लिखा था कि उनके गांव में कोई 300 साल से आकर बसा नहीं है। लेकिन, क्या यूपी के गांव ऐसे बचे हैं कि वहां कोई बसने जाए। मैंने उस पोस्ट पर टिप्पणी भी की थी कि दो-चार कदम चल चुके हर आदमी को ऐसे ही गांव याद आता है। और, ये भी कि मैं इस बार गांव जरूर होकर आऊंगा। लेकिन, गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। जो, वहां के हैं भी पहला मौका मिलते ही कहीं और किसी शहर में बस जाना चाहते हैं। मैं पहले इसे एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

करीब 5 साल बाद मैं अपने गांव गया। प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील मे बिहार ब्लॉक (विधानसभा भी) में मेरा गांव पड़ता है। अपने ब्लॉक में विकास की रुकी गाड़ी देखकर लगता है कि क्या यहीं सोचकर ब्लॉक को हिंदी में विकासखंड कहा जाता है। जबकि, अंग्रेजी में ये block है। सच्चाई में यूपी के ज्यादा विकास खंड अंग्रेजी में blocked ही हैं। इससे पहले बाबा के देहांत के साल भर बाद उनकी बरसी में आखिरी बार गांव गया था। देहरादून में तब अमर उजाला में था। मारामारी में आया और सुबह आया। समजा-जंवार में सबके खाने के बाद मैं भी इलाहाबाद वापस लौट आया था। अगले दिन मेरी वापसी की ट्रेन थी। उसके बाद नौकरी करने मुंबई आ गया। मुंबई से चार सालों में कई बार में इलाहाबाद गया लेकिन, हर बार व्यस्तता की वजह से प्रतापगढ़ अपने गांव जाना नहीं ही हो पाता था। इस बार मैं तय करके गया था कि गांव जाऊंगा ही जाऊंगा।

तय करके गया था इसलिए सायास गांव पहुंचा भी। चिलचिलाती धूप में हमलोग करीब 12 बजे गांव के लिए इलाहाबाद में अपने मोहल्ले दारागंज से निकले। 1.30 बजे मैं अपने गांव चंदई का पुरवा में था। सिया ग्रामसभा के कई पुरवा में से एक हमारा गांव चंदई का पुरवा भी है। हमारे गांव के एक तरफ कोयरानी है जिसमें ज्यादातर यादव जाति के हैं। दूसरी तरफ लाल का पुरवा है जिसमें पिछड़े और दलित जातियों के लोग हैं। बीच में हमारा बाभनों का गांव हैं। इसमें करीब 20-25 घर हम लोगों यानी सोहगौरा त्रिपाठी (ब्राह्मणों में भी खुद को उच्च मानने वाले त्रिपाठी) का है। इसके अलावा एक घर शुक्ला का है। वैसे, पिताजी बताते हैं कि शुक्ला और त्रिपाठी एक-एक घर ही थे लेकिन, त्रिपाठी लोगों का परिवार बढ़ता गया और, शुक्ला थमे रह गए क्योंकि कई पीढ़ियों से उनके यहां एक-एक बेटे ही होते आए। पहली बार मेरी जेनरेशन में दो बेटे हैं। और, थोड़ा सा कटके पड़ान है जिसमें करीब 10 घर पांडे ब्राह्मण हैं।

शुक्लाजी के यहां कभी किसी ने नौकरी नहीं की। या यूं कहें कि अकेले हिस्सेदार होने की वजह से नौकरी वाहियात लगती थी। और, ये भी कि इतनी जमीन है उसे कौन देखेगा। लेकिन, खेती से एक जमाने में होने वाली जबरदस्त कमाई (क्योंकि, तब नौकरी में इतने पैसे नहीं मिलते थे) और उससे भी ज्यादा जमींदारी वाली इज्जत अब बोझ लग रही है। जमीन के ही गरुर में उनके घर में कोई बहुत पढ़ भी नहीं पाया। दूसरी तरफ त्रिपाठी लोगों में पढ़ाई और नौकरी के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मेरे पिताजी की जेनरेशन में ज्यादातर लोग नौकरी में हैं। और, बड़ी संख्या में एमए किए हुए हैं। उसी नौकरी की कमाई से सबके इलाहाबाद में घर बन गए हैं। गांव में भी अब कच्चा घर तो मुझे किसी का दिखता नहीं। ये अलग बात है कि कई घरों में ईंट जोड़कर छत तो डाल दी गई लेकिन, प्लास्टर और पुताई की बाट घर अब भी जोह रहे हैं। पांडे लोगों का भी हाल शुक्लाजी जैसा ही है। बस एक पांडेजी की थोड़ा ज्यादा इज्जत है भले ही वो गांव 4-6 साल बाद दिखें। वजह ये कि वो, पीडब्ल्यूडी में एकाउंटेंट थे और उनका बेटा रुड़की से इंजीनियरिंग करके बड़ी कंपनी काम कर रहा है।

खैर, जब हम लोग उस दिन गांव पहुंचे तो, दादा (पिताजी के बड़े भाई) नए वाले घर में तखत पर बैठे थे। भैया दही का शरबत बनाकर बाल्टी में ले आए और आग्रह ये कि हम पांच लोग हैं तो, पूरा खत्म ही हो जाना चाहिए। खैर, शरबत खत्म होते-होते दादा ने धीरे से कहानी सुनानी शुरू की। बचि ग नाही तो अन्नू तो गोली चलवाइ देहे होतेन। पिताजी ने पूछा- काहे का भ। अरे कुछ नाही लाल का पुरवा के अहिरन से अन्नू क सियारामगंज बाजार (कई गावों की सामूहिक बाजार) में झगड़ा भ। लपटा-झपटी के बाद अन्नू भागि आइए लेकिन, कई लड़िकन मिलके फिर अन्नू क बांसे क कोठी के लगे लपट लेहेन। ऊ तो, कहा- जेई क मेहरारू देख लीहिन औ गोहार लगाइन तो सब दौड़ेन। औहमू से 100-150 अहिर सब गांव छाप लेहेन। हम पूछत रहि गए का भ बतावा लेकिन, लड़िकन मानै क तैयारै नाहीं। फिर जौ हम कहे निकार बंदूक तौ भगेन सब। अन्नू हमारे ही पट्टीदार का नाती है जो, गांव में सबसे सीधे गिने जाते है। और, जिनके दरवाजे पर सबसे ज्यादा यादव दिन भर आकर बैठे रहते हैं।

खैर, जो पता लगा वो यही था कि झगड़ा बेवजह हुआ था। और, शायद पहले की कोई प्रतिक्रिया थी। प्रधान यादव है उसने हमारे दादाजी से आकर कहा- पंडितजी कोई बात नहीं। दरोगा का फोन आया था रात में 11 बजे। मैंने बता दिया, सब ठीक है। कुछ खास नहीं हुआ था। ये एक बड़ा बदलाव था पहले शायद दरोगा के आसपास भी सिर्फ ब्राह्मण-ठाकुर ही पाए जाते थे। और, दरोगा से फोन पर हुई बातचीत या मुलाकात के जरिए विरोधियों को डराने का काम भी वही करते थे। अब यादवजी, पंडितजी को भरोसा दिला रहे हैं कि दरोगा कुछ नहीं करेगा।

बदलाव बस ऐसा ही है। चिलचिलाती धूप में गांव में वैसे भी कोई न दिखता लेकिन, सच्चाई ये भी है कि गांव में बचे भी वहीं हैं। जिनको कहीं काम नहीं मिला या जिनको वहीं प्राइमरी स्कूल से इंटर कॉलेज तक में अध्यापक की नौकरी मिल गई। नौकरी करने से रिटायर होने तक वही गांव में हैं। गांव में सबसे आगे हमारा ही घर है। बाबा ने बनवाया था। दो मंजिल का शानदार पक्का घर। तब आसपास के इलाके में ऐसा घर नहीं था। करीब 15 साल पहले दादा और पिताजी के बीच बंटवारा हो गया। आधा-आधा बंटा घर रेलगाड़ी के डिब्बे जैसा हो गया। हम लोगों का हिस्सा अकसर बंद ही रहता। क्योंकि, हम लोग गांव जाते भी तो, दादा के ही यहां बैठते। अब तो, हाल ये है कि घर की चाभी खो गई है और दो साल से ताला ही नहीं खुला है।


12 Comments

रवीन्द्र प्रभात · April 28, 2008 at 10:24 am

आपने सही कहा है कि” यूपी के ज्यादा विकास खंड अंग्रेजी में blocked ही हैं। “

mamta · April 28, 2008 at 10:44 am

बहुत सही चित्रण किया है आपने यू-पी के गाँव का।

Sanjay Sharma · April 28, 2008 at 12:40 pm

पसंदीदा विषयवस्तु परोसने के लिए आभार ! निवेदन भी कि गाँव की उन सभी अच्छाइयों को लाये ताकि पब्लिक साल मे दो बार जरूर गाँव जाए . जारी रखिये ! जाओ रे इंडिया ,भारत क्यों नही है तू !

अनिल रघुराज · April 28, 2008 at 2:14 pm

हर्ष, वाकई पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी गांवों का यही हाल है। गांवों के एमए-पीएचडी लड़के इस समय क्या कर रहे हैं, इसका भी हाल हो सके तो लिखिएगा। उनकी बहुओं का क्या है, थाह लगे तो यह भी बताइगा। कल के लंबरदारों का क्या हश्र हुआ है, यह भी लिखिएगा।
एक बार सोचा था कि गांव में जाकर अपने हिस्से की जमीन पर अलग से होलीडे होम बनवाऊंगा। लेकिन अब वहां का हाल-चाल सुन-सुनकर हिम्मत ही नहीं पड़ती।

Gyandutt Pandey · April 28, 2008 at 3:26 pm

पूर्वांचल के गांव और संस्कृति में सड़ांध महसूस की जा सकती है।

नैनो · April 28, 2008 at 3:57 pm

मुझे तो सड़कों पर बिछी खाटें
चारपाईयां याद आती हैं
जिन पर सरेसड़क हम
सोते थे रोज.

आज कारें सोती हैं
मोटरसाईकिलें सोती हैं
स्‍कूटर सोते हैं
पर नहीं मिलते
तलाशते रहते
सब पानी के सोते हैं.

अविनाश वाचस्‍पति

Lavanyam - Antarman · April 28, 2008 at 6:17 pm

शायद इसी को कहते हैँ ” दूर के ढोल सुहावने ” हर जगह की अपनी अपनी समस्याएँ रहतीँ हैँ –
फिर भी, भारत के ग्राम्य जीवन की सही स्थिती आप के आलेख से जान सकते हैँ
आगे भी पढना चाहेँगेँ आप लिखियेगा.
– लावण्या

Udan Tashtari · April 29, 2008 at 11:03 am

बिल्कुल सजीव एवं बेबाक-अगली कड़ी का इन्तजार है.

Pramod Singh · April 30, 2008 at 5:34 pm

यह अच्‍छी लिखायी लिख डाले, जवान, आगे की कड़ि‍यां भी पढ़ता हूं.. कहीं से पइसा लहवाओ, इस दुनिया के मिट जाने के पहले इस पर, ससुर, फिलिम बनाते हैं.

Chakrapani · September 7, 2009 at 3:46 pm

Khoj to raha tha apane poorvajon ka gaon.Agrajon se soonta aya tha ki hamare poorvaj Gorakhpur ke Sahgaura ganv se vartman ganv me aaye the;sambhavatah 300 saal pahale. Lekin oonkaa naam pataa kisi ko yaad nahi.Internet se Gorakhpur ke pas ek Sahgaura naam ke ek jagah kaa pataa chalaa. puratatv vidon ne vahan koochh khudai bhi ki hai.Vahan praachin avashesh bhi mile hain. Ek tamra patra bhi milaa hai jis par Brahmi lipi me koochh likhaa hua hai.Yah bhi bataya gayaa hai ki Brahmi lipi me likhaa hua yah tamrapatra praachinatam hai.Vahaan ek bandh bhi hai. Yah ganv Bansganv tahasil ke Kauriram jagah ke paashai.Lekin koi sampark koi sampark sootra nahi mila.

Isi chhan been ke dauraan moojhe aapakaa blog milaa.Moojhe yah jaankar sookhad aascharya hua ki aaplog apane vartmaan ganv me Sohgaura ke Tripathi kahe jaate hain. Hamlogon ke bhi ek pooraane poorvaj kaa naam'Nirbhaya Tewary' thaa. Lekin baad me hamlogon ke naam me yah Singh aur Rai me badal gaya. Kab or kyon hame nahin maaloom.
Mahodaya meri jigyasha yah hai ki kya aapake poorvaj bhi isi Gorakhpur vale Sahgaura ganv se aapake vartmaan ganv 'Chandaee ka poorava me aaye the?

Yadyapi mere patra kaa bhav aapake blog ke bhaav se koochh alag hai,phir bhi meraa anoorodh hai ki is vishaya par apani or se koochh bataa saken to badi kripaa hogi
Dhanyavaad
Mera mail ID-singh_chakrapani@yahoo.co.in
Chakrapani

gangesh tiwari · November 9, 2012 at 3:11 pm

wow vary good ( mera gaav hai sohgura }

gangesh tiwari · November 9, 2012 at 3:12 pm

wow vary good ( mera gaav hai sohgura }

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