आखिरकार प्रधानमंत्री पद की सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए नरेंद्र मोदी की अधिकारिक सवारी बीएमडब्लू हो ही गई। लेकिन, इससे पहले नरेंद्र मोदी जिस तरह से अपने आचरण व्यवहार में स्वदेशी का इस्तेमाल करते रहे हैं या यूं कहें कि जिस तरह से राष्ट्र की भावना को आगे रखते हैं वो काबिलेतारीफ होता है। 2008 में अहमदाबाद में
लगातार हुए कई धमाकों की कवरेज के लिए मैं अहमदाबाद में था। अहमदाबाद एयरपोर्ट से
शहर के लिए निकला ही था कि हम लोगों की कार रोक दी गई। पता चला गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला जा रहा है। आधा दर्जन से ज्यादा महिंद्रा
स्कॉर्पियो का काफिले में गुजारत के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जा रहे थे। रात के
ग्यारह बज रहे थे। मुख्यमंत्री काम पर थे। अहमदाबाद के लोग दहशत में न आ जाएं इस
बात का भरोसा दिलाने के लिए वो दृढ़प्रतिज्ञ दिखे। महिंद्रा स्कॉर्पियो क्यों
नरेंद्र मोदी की पसंद है वो बात उस समय मेरी समझ में नहीं आई थी। बाद में समझ में
आया कि थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली के सिद्धांत को नरेंद्र मोदी ने अपने निजी जीवन
में किस तरह उतारा हुआ है। शायद ही कभी नरेंद्र मोदी के किसी व्यवहार से ये लगा हो
कि वो विदेशी कंपनियों या सामान के विरोधी हैं। बल्कि, ज्यादातर उनकी छवि दुनिया
की कंपनियों को किसी तरह अपने गुजरात में लाने वाले नेता की ही रही। लेकिन, ये एक
बड़ा उदाहरण था कि किस तरह से एक व्यक्ति अपने आचरण से ये तय कर सकता है कि वो
क्या करना चाहता है और उसके चाहने वाले क्या करें। ये आचरण है नरेंद्र मोदी का
स्वदेशी विचार को अपनाने का। अब खबरें ये हैं कि क्या नरेंद्र मोदी सात रेसकोर्स
रोड में भी महिंद्रा स्कॉर्पियो के काफिले में ही प्रवेश करेंगे या फिर पहले की ही
परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जर्मन कंपनी बीएमडब्लू की कारों के काफिले का इस्तेमाल
करेंगे। अंबैसडर कारों के बाद धीरे-धीरे ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री
आधुनिक विदेशी कारों का इस्तेमाल करने लगे हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरमैन
आनंद महिंद्रा नरेंद्र मोदी के स्वदेशी आचरण की भावना को अपनी कंपनी की ब्रांडिंग
के पक्ष में इस्तेमाल करने को आतुर हैं। आनंद महिंद्रा ने इच्छा जाहिर की है कि
देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भी नरेंद्र मोदी महिंद्रा स्कॉर्पियो का ही
इस्तेमाल करें। उनका कहना है कि ये हमारे लिए और पूरे देश के लिए गर्व की बात होगी
कि हमारे प्रधानमंत्री पूरी तरह से भारतीय महिंद्रा स्कॉर्पियो का इस्तेमाल करते
हैं। उन्होंने कहा कि कंपनी प्रधानमंत्री की सुरक्षा के स्तर के लिए जरूरी हर तरह
के बदलाव स्कॉर्पियों में करेगी।

स्वदेशी ब्रांड को आगे बढ़ाने की नरेंद्र मोदी की इच्छा का ये एक
नमूना भर है। यानी बेवजह का हल्ला मचाए बिना स्वदेशी की चिंता की जा सकती है। उसे
आगे बढ़ाया जा सकता है। ये नरेंद्र मोदी सिर्फ मानते ही नही हैं करके भी दिखाया
है। बार-बार ये बात कही जाती है। और हम जैसे लोगों को भी ये चिंता होती है कि
नरेंद्र मोदी का नाम पर बाजार में जो तेजी आई है वो कहीं बुलबुला ही न साबित हो।
नरेंद्र मोदी पर बार-बार ये आरोप लगता रहा है कि वो निजी उद्योगपतियों के हितों की
चिंता करने वाले नेता है। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में इस सवाल का
जो जवाब दिया उससे बात साफ हो जाती है। उन्होंने कहाकि मेरे उद्योगपतियों से अच्छे
संबंध हैं लेकिन, वो राज्य के हित के लिए हैं। मेरा कोई निजी हित उनसे पूरा नहीं
होता। इसलिए मैं खुलेआम उनसे संबंध रखता हूं लेकिन, गलत तरीके से कारोबारियों से
फायदा लेने वाले खुलेआम ये संबंध स्वीकार करने में डरते हैं। और इसका असर देखिए कि
नरेंद्र मोदी के आने के बाद सिर्फ अदानी या रिलायंस के शेयरों में तेजी देखने को
नहीं मिली है। नरेंद्र के प्रधानमंत्री बनने की आहट से प्रधानमंत्री बन जाने तक
सरकारी कंपनियों के शेयरों में जबरदस्त मजबूती देखने को मिली है। फिर चाहे वो
केंद्र सरकार के अंतर्गत चलने वाली कंपनियां हों या फिर गुजरात राज्य के स्वामित्व
वाली कंपनियां। एक दर्जन से ज्यादा केंद्रीय सरकार की पब्लिक सेक्टर की कंपनियों
के शेयर मंगलवार को 52 हफ्ते के सबसे ऊंचे स्तर पर थे। यही हाल गुजरात राज्य के
स्वामित्व वाली कंपनियों का भी था। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर पीएसयू इंडेक्स यानी
सरकारी कंपनियों के शेयरों की कीमत बताने वाले सूचकांक एक नरेंद्र मोदी के
प्रधानमंत्री बनने की खबरों से करीब चौदह प्रतिशत बढ़ गया। ये सभी सेक्टरों के
सूचकांक की सबसे अच्छी बढ़त है। सरकारी कंपनी भेल के शेयर एक हफ्ते में सत्ताइस
प्रतिशत चढ़ गए हैं। एनटीपीसी, एनएमडीसी, पावर ग्रिड इन सभी कंपनियों के शेयर में
तेज उछाल देखने को मिली है। ये उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि नरेंद्र मोदी जैसा
प्रधानमंत्री इस देश को मिला है जो सिर्फ बोलकर नहीं अपने कामों से भी ये साबित
करता है कि तरक्की सबसे पहले हैं। और इस तरक्की में निजी या सरकारी कंपनियों का
भेद नहीं होगा। उम्मीद है इस तरक्की में लोगों का भी भेद नहीं होगा। शेयर बाजार एक
लंबी दौड़ के लिए तैयार है। अगर इस दौड़ में देसी निजी कंपनियां दुनिया की बड़ी से
बड़ी कंपनियों से मुकाबले के लिए तैयार हो जाती हैं तो इससे बेहतर क्या होगा। इससे
बेहतर क्या होगा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते देश की सरकारी कंपनियों को
बेचने की बजाए उन्हें बड़ा से बड़ा ब्रांड बनाने की बात हो। क्या बेहतर हो कि देश
की सरकारी कंपनियों में नौकरी करने वालों को ये अफसोस न हो कि वो किसी निजी कंपनी
में क्यों नहीं हैं। तरक्की के लिए प्रतिभा जरूरी पैमाना हो। सिर्फ नौकरी की उम्र
के आधार पर सरकारी कंपनियों में तरक्की न हो। नरेंद्र मोदी को कई बड़े बदलाव
सरकारी कंपनियों के कामकाज में करने होंगे। सरकारी कंपनियों को भी लक्ष्य तय करने
और उसे समय से पूरा करने की जिम्मेदारी और उसी आधार पर तारीफ या सजा मिलनी चाहिए।
ये सब अगर नरेंद्र मोदी की सरकार कर पाई तो निश्चित तौर पर भारत के लिए अगले पांच
साल बेहद अहम साबित होंगे। और अभी तक के अपने कामों से नरेंद्र मोदी ने कम से कम
ये साबित किया है कि वो जो कहते हैं वो करके दिखाते हैं।