भारतीय जनता पार्टी
के संदर्भ में पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा ही सबसे मजबूत पहचान हुआ करती थी।
लेकिन, अब तो खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता भी मुश्किल से ही इस नारे को इस्तेमाल
करते देखे जा रहे हैं। क्या सचमुच भारतीय जनता पार्टी अब भारतीय राजनीति की पार्टी
विद द डिफ्रेंस नहीं रह गई है। क्या भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस का ही थोड़ा
भिन्न रूप हो गई है। मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले
की पूर्वाग्रही सोच अब और ज्यादा पूर्वाग्रही हो गई है। इसीलिए ऐसा लगने लगा है। इसीलिए
नरेंद्र मोदी की सरकार के ढेर सारे सबसे अलग, बेहतर फैसलों के बावजूद बीजेपी को
पार्टी विद द डिफ्रेंस मानने को तैयार नहीं है। और इसमें बड़ी बात ये भी है कि खुद
बीजेपी के नेता, कार्यकर्ता इस नारे के साथ उतनी मजबूती से खड़े नहीं हो रहे हैं।
और ये सब इसके बावजूद है कि ये सब मान रहे हैं कि काफी कुछ बदला है लेकिन, सिर्फ 9
महीने की हुई इस सरकार से लोग जाने क्या उम्मीद लगाए बैठे हैं जो पूरी होती नहीं
दिख रही। किसी से भी बात करिए तो वो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के एक भी गलत
फैसले के बारे में मुश्किल से ही बता पाता है। और अगर बता भी पाता है तो वो आलोचना
निजी व्यवहार या फिर ज्यादा मजबूत नेता के तौर पर तानाशाही होते व्यवहार की ही
होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे सूट की आलोचना हो रही है। नीतिगत
फैसले के तौर पर या फिर नीतिगत व्यवहार के तौर पर आलोचना करने के लिए तथ्य खोजना लोगों
को मुश्किल हो रहा है। आलोचना सिर्फ पूर्वाग्रह के आधार पर हो रही है। सिर्फ 9
महीने की अभी मोदी सरकार हुई है। ये समय बीते यूपीए 1-2 के दस साल के शासन के
दसवें हिस्से से भी कम है। फिर भी कड़ी समीक्षा हो रही है। होनी भी चाहिए।
लोकतंत्र में ये बड़ा जरूरी है। मुझे लगता है कि चूंकि भारतीय नजता पार्टी अब
सरकार में है इसलिए उसे पार्टी विद द डिफ्रेंस से गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस के
पैमाने पर कसा जाना चाहिए।

अभी देश का बजट मोदी
सरकार पेश करने वाली है। और वो शायद बीजेपी की इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गवर्नमेंट
विद द डिफ्रेंस के नारे को मजबूती देगा। लेकिन, इस नौ महीने में नरेंद्र मोदी ने
प्रधानमंत्री के तौर पर जो फैसले लिए जो, बीजेपी की इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार में
पार्टी विद द डिफ्रेंस को आगे बढ़ाते हुए, गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस के नारे को
मजबूत करेगा। सबसे बड़ी बात तो यही है कि सरकार प्रधानमंत्री चला रहा है और पूरी
सरकार उसके पीछे है। अब ये तर्क आसानी से आ सकता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है।
लेकिन, फर्क पड़ता है। पिछली दस साल की सरकार में प्रधानमंत्री के सरकार न चलाने
का नुकसान देश को किस कदर हुआ है। इसका हिसाब एक बार में ठीक ठीक लगा पाना मुश्किल
है। नरेंद्र मोदी की सरकार पूर्ण बहुमत में है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री के तौर
पर नरेंद्र मोदी ने अभी तक कोई ऐसा फैसला नहीं लिया है, जिससे ये कहा जाए कि वो
राज्यों के अधिकारों में दखल दे रहे हैं या फिर राज्यों के अधिकारों में कटौती की
कोशिश कर रहे हैं। बल्कि, नरेंद्र मोदी की सरकार ने गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस का
शानदार उदाहरण पेश करते हुए चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट के आधार पर राज्यों को
केंद्रीय करों में ज्यादा हिस्सेदारी देने का फैसला किया है। ये कोई छोटा फैसला
नहीं है। क्योंकि, केंद्रीय फंड में हिस्सेदारी के आधार पर ही लंबे समय से ढेर
सारे राजनीतिक समीकरण सधते या बनते-बिगड़ते रहे हैं। इसलिए अगर नरेंद्र मोदी की
सरकार ने राज्यों को केंद्रीय खाते से मिलने वाली रकम बत्तीस प्रतिशत से बढ़ाकर
सीधे बयालीस प्रतिशत करने का फैसला कर लिया है। तो वो गवर्नमेंट विद दद डिफ्रेंस
की बड़ी बुनियाद साबित हो सकती है।

गवर्नमेंट विद द
डिफ्रेंस का एक और शानदार उदाहरण है कच्चे तेल की कीमतों का फैसला। नरेंद्र मोदी
की सरकार को पूरी तरह से देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की जेब की सरकार
के तौर पर प्रचारित किया जा रहा था। जो नरेंद्र मोदी के प्रति पूर्वाग्रही सोच का ही
परिणाम था। ये अब सरकार के एक के बाद एक फैसलों से साबित भी होता जा रहा है। यूपीए
के शासनकाल में ही कच्चे तेल की कीमतें 4.22 एमएमबीटीयू (मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश
थर्मल यूनिट) से बढ़ाकर 8.44 एमएमबीटीयू करने का फैसला ले लिया गया था। जिसे
लोकसभा चुनावों की वजह से लागू करने से रोक दिया गया था। इसके बाद नरेंद्र मोदी की
सरकार से ये पूर्वाग्रही अपेक्षा थी कि नरेंद्र मोदी सबसे पहले कच्चे तेल की
कीमतें ही बढ़ाएंगे, जिससे रिलायंस को सीधा फायदा होगा। लेकिन, मोदी ने ऐसा कुछ
नहीं किया। बल्कि, समीक्षा करके अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के आधार पर एक नई कीमत तय
कर दी। जो यूपीए 2 में तय की गई कीमत से कम थी। साथ ही केजी बेसिन में रिलायंस के
पक्ष में फैसले की उम्मीद भी नरेंद्र मोदी से लोग लगाए बैठे थे। वो भी उम्मीद पूरी
नहीं हुई। और सरकार ने रिलायंस को किसी भी तरह का लाभ देने वाला फैसला नहीं
लिया। 

 गवर्नमेंट विद द
डिफ्रेंस का एक और बड़ा उदाहरण है पेट्रोलियम मंत्रालय से गोपनीय दस्तावेजों की
चोरी में पकड़े गए लोग। ये बहुत बड़ा फैसला था। ये गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस की
नरेंद्र मोदी की मंशा का ही नतीजा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय का जिम्मा अपेक्षाकृत
कनिष्ठ धर्मेंद्र प्रधान को दिया गया। और जिस तरह से पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र
प्रधान ने इस जासूसी कांड के बाद टीवी चैनलों पर बयान दिया। उससे साफ है कि
नरेंद्र मोदी निजी तौर पर इस पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे। और इसीलिए इतने बड़े
मामले को दिल्ली पुलिस बिना किसी राजनीतिक दबाव के आसानी से सुलझाने में लगी हुई है।
वरना तो ये माना जा रहा था कि रिलायंस का कोई भी कर्मचारी सीधे पीएमओ अधिकारी की
तरह काम करेगा। ये गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस का ही उदाहरण है। अभी एक और ताजा
फैसला लिया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने ओएनजीसी के टेक्नोलॉजी और फील्ड सर्विस
डायरेक्टर शशि शंकर को निलंबित कर दिया है। शशि शंकर पर ठेके देने में अनियमितता
का आरोप है। जांच पूरी होने तक शशि शंकर निलंबित रहेंगे, जिससे वो निष्पक्ष जांच
में बाधा न बन सकें। यानी नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से संदेश साफ है कि निजी हो
या सरकारी किसी भी तरह की कंपनी और किसी भी स्तर के अधिकारी की गड़बड़ी बर्दाश्त
नहीं होगी। कम से कम अब नरेंद्र मोदी के न खाऊंगा न खाने दूंगा पर पहले से ज्यादा
भरोसा किया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक ये भी मानते हैं कि दिल्ली में जिस तरह
से अरविंद केजरीवाल की सरकार आई है उसके पीछे एक बड़ी वजह मोदी का सरकार
कर्मचारियों, अधिकारियों को ताकत देने के साथ उनको जवाबदेह बनाने की कोशिश भी है।
विश्लेषक मानते हैं कि समय पर दफ्तर पहुंचने के दबाव ने दिल्ली के सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों को बीजेपी के पक्ष में मत देने से रोका। अब इसमें कितनी
सच्चाई है ये तो पक्का पता कर पाना मुश्किल है। लेकिन, इतना तो तय ही है कि देश
में पहली बार ऐसा प्रधानमंत्री आया है जो समय पर सरकारी बाबुओं के दफ्तर पहुंचने
को अपनी प्राथमिकता में रखता है। सफाई को लेकर प्रधानमंत्री का आग्रह भी गवर्नमेंट
विद द डिफ्रेंस की अवधारणा को ही मजबूत करता है।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने
गणतंत्र दिवस की परेड में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को मुख्य अतिथि के तौर पर
बुला लिया। ये बहुत बड़ी बात थी। लेकिन, मैं जब गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस की बात
कर रहा हूं तो साझा प्रेंस कांफ्रेंस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक
जवाब को मैं उसमें शामिल करूंगा। एक पत्रकार ने पर्यावरण पर भारत के अमेरिका के
दबाव में आने को लेकर सवाल पूछा था। जिसका जवाब नरेंद्र मोदी ने पूरी कड़ाई के साथ
ये कहते हुए दिया था कि भारत किसी भी व्यक्ति या देश के दबाव में कोई फैसला नहीं
लेगा। बराक ओबामा के सामने दुनिया को ये बताना कि भारत किसी के दबाव में फैसले
नहीं लेगा, गवर्ऩमेंट विद द डिफ्रेंस का बड़ा उदाहरण है। नरेंद्र मोदी ने पिछली
सभी भारत सरकारों से अलग रुख चीन के मामले में भी अपनाया है। इससे पहले चीन के साथ
भारत का रिश्ता दुश्मनी का और डरे हुए भारत का रहा है। जबकि, नरेंद्र मोदी ने इसे
अलग तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है। चीन के राष्ट्रपति को संपूर्ण सम्मान
दिया। और भारत-चीन के बेहतर कारोबारी रिश्तों की वकालत भी। लेकिन, ये भी बता दिया
कि भारत-चीन के रिश्ते अगर सीमा पर बेहतर नहीं होते हैं तो मुश्किल बनी रहेगी। इसे
और आगे बढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी अरुणाचल प्रदेश के राज्य स्थापना दिवस के मौके पर
भी गए। चीन इस पर लाल हो गया है लेकिन, भारत सरकार ने उसको वैसा ही जवाब दिया है।
ये गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस का शानदार मामला है। एक और जो बड़ी बात नरेंद्र मोदी
की सरकार सबसे अलग कर रही है, वो है सही व्यक्ति के लिए कुछ भी करना। जब नृपेंद्र
मिश्र को प्रधानमंत्री का प्रमुख सचिव बनाने का फैसला लिया गया तो उसकी जमकर
आलोचना हुई। लेकिन, आलोचना तरीके को लेकर थी। कहीं से भी कोई आलोचना नृपेंद्र
मिश्र की काबिलियत को लेकर नहीं रही। इसी को थोड़ा आगे जाकर समझें तो नरेंद्र मोदी
की गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस का एक और उदाहरण सामने दिखता है। वो है सुरेश प्रभु
को रेल मंत्री बनाना। सुरेश प्रभु शिवसेना के नेता रहे। शिवसेना के ही कोटे से
सुरेश प्रभु वाजपेयी सरकार में मंत्री बने थे और बेहद शानदार काम के बावजूद
शिवसेना की ही जिद से सरकार से बाहर भी हुए थे। लेकिन, अब नरेंद्र मोदी ने सुरेश
प्रभु को बेहतर काम करके दिखाने का पूरा मौका दे दिया है। उनकी बड़ी चुनौती बेहतर
रेल बजट पेश करना है। और नरेंद्र मोदी का गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस का एक और
शानदार उदाहरण था विज्ञान भवन में सभी धर्मों की बराबरी की बात करना। हालांकि,
मीडिया में मोदी के उस बयान को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक
संगठनों, खासकर विश्व हिंदू परिषद को चेतावनी देने के संदर्भ में देखा गया। लेकिन,
उस बयान को ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि वो बयान किसी भी धर्म के उग्र
विचारों, कार्यों के खिलाफ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ-साफ कहा कि हमारी
सरकार बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक किसी को भी दूसरे धर्म के खिलाफ घृणा का माहौल
बनाने की इजाजत नहीं देगी। और हमारे लिए सभी धर्म समान हैं। यहां भी गवर्नमेंट विद
द डिफ्रेंस साफ दिखता है। ज्यादा समय नहीं बीता है जब हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री
डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक देश के अल्पसंख्यकों
का है। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि सरकार गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस है। सरकार को भी
ये समझना होगा कि गवर्नमेंट विद द डिफ्रेंस की छवि को बनाए रखना और उसके मुताबिक
फैसले लेते रहना कठिन काम है।