असहिष्णु भारत इस समय दुनिया में चर्चा का विषय है। भारत अचानक इतना
असहिष्णु हो गया है कि देश के सबसे ज्यादा पसंदीदा कलाकारों में से एक आमिर खान की
पत्नी उनसे कह देती हैं कि क्या उनको भारत छोड़ देना चाहिए। पत्रकारिता के सबसे
प्रतिष्ठित पुरस्कार रामनाथ गोयनका अवॉर्ड के मौके पर अभिनेता आमिर खान की इस बात
ने देश में उस बहस को तेज कर दिया है कि क्या सचमुच भारत असहिष्णु हो गया है।
खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ, उसमें भी खासकर मुसलमानों के खिलाफ। सांप्रदायिक
हिंसा पर गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट इस बहस को और आगे बढ़ाती है। 2014 के पहले
पांच महीने और 2015 के पहले पांच महीने की बहस साफ करती है कि मोदी सरकार में
ज्यादा सांप्ररदायिक हिंसा बढ़ी है। मतलब असहिष्णुता बढ़ी है। हालांकि, भारतीय
जनता पार्टी इस बात पर बहस करना बेहतर समझेगी जिसमें 2015 में 2014 से कम जानें
सांप्रदायिक हिंसा में गई है। इसी बहस को थोड़ा और आगे बढ़ाने के लिए गृह मंत्रालय
की ताजा रिपोर्ट से पिछले पांच साल के आंकड़े देखते हैं। मोदी सरकार के इस साल
यानी 2015 के पहले पांच महीने में सांप्रदायिक हिंसा के 287 मामले सामने आए हैं।
इसमें 43 जानें गईं। और 961 लोग घायल हुए। 2014 में यूपीए के समय में ये आकड़े
देखने से लगता है कि मोदी सरकार में सांप्रदायिक हिंसा के मामले बढ़े हैं। 2014 के
पहले पांच महीने में सांप्रदायिक हिंसा के 232 मामले सामने आए थे। इसमें 26 जानें
गईं। और 701 लोग घायल हुए। गह मंत्रालय की इसी रिपोर्ट के आंकड़े जब थोड़ा और
बढ़ाते हैं, तो तस्वीर मोदी सरकार के पक्ष में थोड़ी बेहतर होती है। 2015 के पहले
आठ महीने यानी जनवरी से अक्टूबर के दौरान 86 जानें गईं हैं। जबकि, 2014 में जनवरी
से अक्टूबर के दौरान 90 लोगों को सांप्रदायिक हिंसा में अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
हालांकि, सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में मोदी सरकार सुधार नहीं ला सकी। जनवरी से
अक्टूबर 2015 के दौरान 630 मामले हुए। जबकि, 2014 में ऐसी 561 घटनाएं ही हुई थीं।
हालांकि, आंकड़ों के लिहाज से एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश में कोई
भी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा की घटना नहीं हुई है। 2013 में यूपीए सरकार के रहने के
दौरान मुजफ्फरनगर दंगा हुआ था। सिर्फ इसी दंगे में 65 लोगों की जान चली गई थी। गृह
मंत्रालय के अधिकारिक आंकड़ों को 2014 और 2015 से पीछे ले जाएं, तो तस्वीर ज्यादा
साफ होती है। 2010 में 701, 2011 में 580, 2012 में 668 और 2013 में 823
सांप्रदायिक हिंसा के मामले हुए थे। मई 2014 में यूपीए से सत्ता हासिल करके एनडीए
का शासन शुरू हुआ था। 
आंकड़ों इसका सीधा सा मतलब ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता
में आने के बाद भारत को असहिष्णु बताने की जो जबर्दस्त कोशिश हो रही है। उसमें
पक्षपाती आंकड़ों का बबड़ा योगदान है। क्योंकि, इन आंकड़ों पर तो बात होती है कि
देश में कुल कितनी घटनाएं हुईं। और उस समय केंद्र में किसकी सरकार थी। लेकिन,
सच्चाई ये भी है कि केंद्र में चाहे यूपीए की सरकार रही हो या फिर एनडीए की। कानून
व्यवस्था राज्यों का ही मसला है। इसलिए कानून व्यवस्था के साथ सांप्रदायिक हिंसा
पर बात करते हुए भी राज्यों की सरकारों पर बात किए बिना बात अधूरी ही रह जाती है।
2012, 13 और 2014 में देश में हुए कुल सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में एक तिहाई
सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। लेकिन, कभी भी देश में असहिष्णुता या
सांप्रदायिकता के लिए उत्तर प्रदेश की सरकारों पर कहीं से भी सवाल खड़े नहीं होत। मुलायम
सिंह यादव की सरकार रही हो या फिर मायावती की और अब अखिलेश यादव की। कभी भी देश की
असहिष्णुता पर चर्चा करने वालों ने उस तरफ उंगली नहीं उठाई। इस उंगली न उठाने से
ही देश में अभी चल रही असहिष्णुता की सारी बहस का पक्षपात साफ समझ में आ जाता है।
यही पक्षपाती दृष्टिकोण कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में हुई हत्या को केंद्र में
नरेंद्र मोदी के सिर मढ़ने की कोशिश करता है। यही पक्षपाती दृष्टिकोण 2013 में हुई नरेंद्र
दाभोलकर की हत्या को भी भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेंद्र मोदी पर थोपने की
कोशिश करता है। असहिष्णुता की बहस में ज्यादातर मंचों पर गला फाड़ने वाले भूल ही
जाते हैं कि 20 अगस्त 2013 को जब दाभोलकर की हत्या की गई। तो उस समय केंद्र में
कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की सरकार थी। और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और
एनसीपी की साझा सरकार थी। लेकिन, ये तय दृष्टिकोण असहिष्णुता के मामले सिर्फ
भारतीय जनता पार्टी की सरकार में खोजता है।
असहिष्णुता और अल्पसंख्यकों के प्रति असुरक्षा की भावना की बात करने
वाले ये भूल जाते हैं कि इस तरह की एकांगी बहस ने ही देश के उन नौजवानों को भी
भारतीय जनता पार्टी के चुनाह चिन्ह पर मत डालने के लिए तैयार कर दिया। जो इससे
पहले कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं थे। असहिष्णुता इस समय देश में सबसे
ज्यादा है। इस पर बहस की कोई वजह नहीं दिखती। क्योंकि, एक ऐसे व्यक्ति के
प्रधानमंत्री बन जाने से हर मसले को उस व्यक्ति के खिलाफ वजह बताने की ऐसी
असहिष्णुता देश में शायद ही कभी देखने को मिली हो। और इसी असहिष्णुता की बहस को
मजबूत आधार देते हैं भारतीय जनता पार्टी के वो नेता। जिन्हें बहुत अच्छे से पता है
कि क्षेत्र का विकास, नौजवान की जेब की ताकत बढ़ाना ये सब कठिन तरीका है। सबसे
आसान है हिंदू राष्ट्र के लिए दो-चार बयान दे देना। और उसी बयान के आधार पर मीडिया
के जरिए भारतीय जनता पार्टी का बड़ा नेता बन जाना। इस तरीके की राजनीति करने के
लिए न पढ़ने-लिखने की जरूरत है। न कुछ ठोस काम करने की। न किसी अच्छे दृष्टिकोण
की। भारतीय जनता पार्टी के ऐसे नेताओं के छोटे फायदे भारतीय जनता पार्टी और सही
मायने में भारतीय राजनीति के बड़े फायदे पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। ये किस तरह से
भारी पड़ रहे हैं। अभी हाल के बिहार चुनावों में ये साफ हो गया है। अच्छा होगा कि
नीतीश कुमार अपनी सुशासन बाबू वाली छवि इस बार भी बनाए रख पाएं। लेकिन, राष्ट्रीय
जनता दल के सर्वोच्च नेता लालू प्रसाद यादव जब अपनी ताकत दिखाने की इच्छा पर जरा
सा भी अंकुश नहीं लगा सके। तो मुश्किल ही है कि राष्ट्रीय जनता दल के विधायक,
मंत्री अपनी ताकत दिखाने की इच्छा पर अंकुश लगा सकेंगे। राजद के नेता सत्ता की
इतनी जल्दी में हैं कि कुछ दिनों का इंतजार करने के बजाए मनपसंद बंगलों पर कब्जा
करने की कोशिश में लग गए हैं। लेकिन, असहिष्णुता की बहस में इस पर बात शायद ही हो।
हां, असहिष्णुता की बहस में मलेशिया में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के रंगीन परिधान की चर्चा जरूर होगी। भले ही इस बहस के आगे बढ़ने से लोगों को
ये साफ पता चल गया कि दरअसल वैसे रंगीन परिधान सभी मेहमान राष्ट्राध्यक्षों को
वहां की परंपरा के लिहाज से पहनने होते हैं। असहिष्णुता शायद ही इस देश में पहले
कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ इस कदर रही होगी। असहिष्णुता पर बहस करने वाले कह
रहे हैं कि मोदी राज में भारत में लोगों के खाने-पहनने-बोलने पर रोक लग गई है। यहां
तक कि एक साहब ने तो लंदन के अखबार में भारत में हिंदू तालिबान का राज बता दिया।
हालांकि, इस हिंदू तालिबान के शासन का राज तब खुल गया। जब भारतीय जनता पार्टी की
ही राजस्थान सरकार ने उसी लेखक को अपने यहां की एक प्रमुख संस्था में नियुक्त करने
का मन बन लिया था। बाद में मीडिया में खबरें आ जाने के बाद सारे नाम वापस ले लिए
गए। असहिष्णुता इस समय देश में किस कदर है। इसके ढेर सारे उदाहरण हैं। देश के सबसे
बड़े आलोचकों में शुमार नामवर सिंह जब कहते हैं कि पुरस्कार लौटाना ठीक नहीं है।
तो सोचिए सहिष्णुता के पक्षधर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। वो प्रतिक्रिया देते हैं
कि संघी हो गया है नामवर सिंह। मुनव्वर राणा का नाम ऐसे शायरों में शामिल है।
जिनको हर कोई पसंद करता है। लेकिन, जैसे ही मुनव्वर कहते हैं कि जो पुरस्कार लौटा
रहे हैं। उनके कलम की स्याही सूख गई है। वो थक गए हैं। पूरी तथाकथित सहिष्णु जमात
मुनव्वर को असहिष्णु साबित कर देती है। इस कदर कि सहिष्णु बने रहने के लिए वो एक
टीवी चैनल पर नाटकीय अंदाज में अपना सम्मान वापस करते हैं। फिर कहते हैं कि वापस
नहीं करूंगा।

इस तरह की असहिष्णुता देश ने कभी नहीं देखी है। ये असहिष्णुता कैसे
है। समझने की जरूरत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लग
रहा है कि देश में कोई भी मोदी सरकार के खिलाफ बोले, तो उसे पाकिस्तान भेजने की
धमकी दी जाती है। राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाता है। इस तरह का व्यवहार करने
वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेंद्र मोदी को
लगाम लगानी ही होगी। लेकिन, इसका दूसरा पक्ष देखें। नामवर सिंह, मुनव्वर राणा के
बाद अब तथाकथित सहिष्णु जमात के निशाने पर हैं जावेद अख्तर साहब। ये वही जावेद
अख्तर हैं जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हर जगह मजबूती से खड़े रहते हैं।
दक्षिणपंथी जमात की जबर्दस्त आलोचना झेलते हैं। लेकिन, जब वही जावेद अख्तर कहते
हैं कि निजी जीवन में उन्होंने कभी सांप्रदायिक भेदभाव नहीं देखा है। तो वो
तथाकथित सहिष्णु जमात के निशाने पर आ जाते हैं। कुछ तो ये भी कह देते हैं कि
राज्यसभा का कार्यकाल इस सरकार में भी बना रहे। इसी की कोशिश जावेद अख्तर कर रहे
हैं। जावेद साहब ने ये भी कहाकि उनका निजी अनुभव है कि अगर कोई पूरी ईमानदारी और
मेहनत से काम करता है तो कोई भी सांप्रदायिकता या नफरत व्यक्ति को सफल होने से रोक
नहीं सकती। उन्होंने ये भी कहाकि भेदभाव हैं। कई तरह के हैं। उनको मिटाना इतना
आसान नहीं है। बहस इस पर होनी चाहिए थी। लेकिन, इसकी बजाए आलोचना जावेद अख्तर की
ही होने लगी। जरूरी है कि इस असहिष्णुता को कम किया जाए। देश को सहिष्णु बनाए जाने
की बड़ी जरूरत है। 

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