खतरनाक है ये। कितना खतरनाक इसका अंदाजा तो अभी लगाना
मुश्किल है। आगे चलकर पता चलेगा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादियों
के साथ सहानुभूति रखने, देश की बर्बादी के नारे लगाने और देश की संसद पर हमला करने
की साजिश रखने वाले आतंकवादी अफजल गुरू को शहीद बताने वाले छात्रों के समर्थन की
राजनीति और आगे चली गई है। हालांकि, इसे राजनीति क्यों कहा जाना चाहिए। क्योंकि,
राजनीति तो सत्ता पाने के लिए, सत्ता चलाने के लिए की जाने वाली नीति है। लेकिन,
शायद कांग्रेस सत्ता पाने के लिए कहीं तक भी जाने को राजनीति का हिस्सा ही मानने
लगी है। इसी तरह की राजनीति में यूपीए के शासनकाल में भ्रष्टाचार की सारी हदें पार
हो गईं। और कांग्रेस, सत्ता बनी है, इसी से खुश रही। लेकिन, इसी राजनीति की ही वजह
से मई 2014 में कांग्रेस के साथ वो हुआ, जो किसी ने कल्पना नहीं की थी। कांग्रेस
के उस खराब दशा में पहुंचने के बाद कांग्रेस के महासचिव और कांग्रेस के पर्दे के
पीछे के बड़े नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि कांग्रेस से हिंदुस्तान को समझने
में भूल हो गई है। जाहिर है कोई भूल हो, तो उसे सुधारने का काम होना चाहिए। लेकिन,
हुआ उल्टा। इस स्वीकारोक्ति के बाद कांग्रेस में जनार्दन द्विवेदी की अहमियत और घट
गई। अब पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम हिंदुस्तान को समझने में हुई गलती को और बड़ा
कर रहे हैं। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक साक्षात्कार में कह दिया कि अगर
ईमानदारी से देखा जाए, तो शायद अफजल मामले पर सही फैसला नहीं हुआ। चिदंबरम ने और
आगे जाते हुए साक्षात्कार में कहा है कि इस बात पर काफी संदेह है कि अफजल संसद पर
हमले के मामले में कितना शामिल था।
किसी भी मसले पर अपनी राय निजी तौर पर रखने के लिए कोई भी
स्वतंत्र है। लेकिन, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा तो तय करनी
होगी। अभी के माहौल में, जब मैं राष्ट्रद्रोही हूं, कहकर ढेर सारे पत्रकार,
बुद्धिजीवी जेएनयू में आतंकवादियों के समर्थन में छात्रों के उतरने को सिर्फ
असहमति साबित करने की कोशिश कर रहे हों। ऐसे माहौल में जब देश का पूर्व गृहमंत्री
अफजल गुरू को फांसी देने की न्यायिक प्रक्रिया पर ही संदेह जता दे, तो मामला सिर्फ
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं रह जाता है। वो भी एक ऐसा कांग्रेसी गृहमंत्री
जो कांग्रेस की सरकार में गृहमंत्री और वित्तमंत्री जैसे अहम ओहदों पर रह चुका हो।
पी चिदंबरम का गृहमंत्री के तौर पर नक्सलियों से कड़ाई से निपटने के मामले में
अपनी ही पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह से मतभेद खुले तौर पर सामने दिखा था। वो चिदंबरम
अगर अब नक्सली से भी आगे आतंकवादी के समर्थन में आए छात्रों के खड़े होने को न्यायोचित
ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, तो खतरनाक मिसाल बनती दिख रही है। अफजल गुरू पर संसद
पर हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप है और सबसे बड़ी बात ये कि अफजल गुरू को न्यायिक
प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के यहां से दया याचिका खारिज होने के बाद
ही फांसी दी गई। अफजल गुरू के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया 2002 में शुरू हुई थी।
लेकिन, 2004 से लेकर 2013 यानी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने तक कांग्रेस की ही
सरकार थी। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि कानूनी प्रक्रिया में अफजल गुरू के खिलाफ
आरोप साबित करने, जुटाने का काम कांग्रेस की सरकार के दौरान ही हुआ। निश्चित तौर
पर ये कतई नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस ने बिना वजह अफजल गुरू को संसद पर हमले
की साजिश में फंसाने का काम किया होगा। दिसंबर 2001 में हुए संसद हमले के लिए
आतंकवादियों को छिपने की जगह देने के साथ ही दूसरी तरह की मदद का आरोप अफजल गुरू
पर साबित हुआ है। संसद पर हुए हमले के ठीक पहले की कॉल डिटेल से ये साबित हुआ है
कि अफजल गुरू इस मामले में पूरी तरह से शामिल रहा। 2002 में पोटा कोर्ट ने अफजल
गुरू को हमले की साजिश का दोषी पाया। उसके बाद 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय और
उसके बाद 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी अफजल को दोषी ही पाया। यहां यह तथ्य भी
बेहद जरूरी है कि अफजल को फांसी से बचाने के लिए हिंदुस्तान से लेकर दुनिया भर के
सारे मानवाधिकारवादी लगे रहे। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय से भी फांसी की सजा
बरकरार रहने के बाद अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ अफजल की पत्नी ने राष्ट्रपति के
पास दया याचिका भी डाली। उस समय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी थे। प्रणब मुखर्जी ने
अफजल गुरू की दया याचिका को खारिज कर दिया। यानी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी
संसद हमले में अफजल की भूमिका लगी होगी। इसके बाद 9 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को
कांग्रेस की सरकार ने तिहाड़ जेल के भीतर ही फांसी दे दी। और सबसे गलत काम किया कि
अफजल के परिवार को सूचना देना तक जरूरी नहीं समझा। हालांकि, तत्कालीन गृहमंत्री
सुशील कुमार शिंदे कहते हैं कि सूचना भिजवाई गई थी। सुशील कुमार शिंदे ने पी
चिदंबरम के वित्तमंत्री बनने के बाद गृहमंत्री की कुर्सी संभाली थी। इस लिहाज से
2008 से 2012 तक यानी चार साल तक हर तरह से अफजल गुरू को न्याया दिलाने के लिए
हरसंभव कोशिश करने का मौका पी चिदंबरम के पास था। अगर कहीं कोई गलती हो रही थी, तो
उसको सुधारने का अवसर था। लेकिन, गृहमंत्री रहते चिदंबरम को भी अफजल गुरू की फांसी
न्यायोचित लगी होगी।

फिर आज ऐसा क्या हो गया है कि अचानक पूर्व गृहमंत्री पी
चिदंबरम को ये लगने लगा कि अफजल गुरू के साथ शायद न्याय नहीं हुआ। कहीं ऐसा तो
नहीं है कि इस मत परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ी वजह आज का माहौल है। देश में माहौल कुछ
इस तरह का है कि देशभक्त होने को भी तथाकथित बुद्धिजीवी गाली बना देने पर तुले हुए
हैं। वहीं खुद को देशद्रोही कहकर ढेर सारे बुद्धिजीवी, पत्रकार सरकार को चुनौती दे
रहे हैं। क्या इसी माहौल का फायदा उठाकर पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम सरकार को असहज
करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन, ये बेहद खतरनाक मिसाल होगी। जहां कांग्रेस
पार्टी के बड़े नेता और लंबे समय तक देश के गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम देश विरोध की
भावना का जानबूझकर समर्थन करते दिख रहे हैं। ये वही पी चिदंबरम हैं, जिन्होंने
गृहमंत्री रहते 2010 में कहा था कि वामपंथी अतिवाद आतंकवाद से भी खतरनाक है। साक्षात्कार
में नक्सली समस्या पर बात करते हुए पी चिदंबरम ने कहा – “नक्सली राज्य और सेना को दुश्मन कह रहे हैं। सच तो ये है कि
वो सेना को दुश्मन की सेना कह रहे हैं और इसे युद्ध बता रहे हैं। मैं ऐसे शब्दों
को नापसंद करता हूं।“ गृहमंत्री रहते नक्सलियों के देश विरोधी, सेना
विरोधी शब्दों को नापसंद करने वाले पी चिदंबरम आज विपक्ष के नेता के तौर पर उन्हीं
को बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले साल नवंबर महीने में पी चिदंबरम ने लिट्रेचर फेस्टिवल
में, क्या भारत एक उदार गणराज्य है, विषय पर बोलते हुए कहा था कि राजीव गांधी
सरकार का सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेस को प्रतिबंधित करना गलत था। यहां
ये भी जान लेना जरूरी है कि 1988 में जब ये पुस्तक भारत में प्रतिबंधित हुई, तो पी
चिदंबरम गृह राज्यमंत्री थे। गलत किए हुए की स्वीकारोक्ति गलत नहीं है। लेकिन,
सरकार में रहते हुए खुद के किए हुए को विपक्ष में रहते सिर्फ इसलिए गलत बताना कि
इससे अभी की सरकार को असहज किया जा सकता है। खतरनाक मिसाल बन रहा है। नुकसान देश
का हो रहा है।