बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बादशाह बीजिंग से बोलेगा।

खैर, मैं देश की बात कर रहा था तो, सोवियत संघ उधर टूट और इधर हमारे देश के नेताओं का आदर्श भी नहीं रह गया। अब हम अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं। कमाल ये कि इस पर संघी-भाजपाई से लेकर कांग्रेसी तक सब सहमत हैं। नए समाजवादियों को भी अमेरिका का ही साथ अच्छा लग रहा है। सिर्फ कम्युनिस्ट भाई चीन जैसा बनाना चाहते हैं देश को। ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट भाइयों की जिन दो राज्यों में बपौती है उसे, चीन तो क्या चीन के पिद्दी बराबर भी नहीं बना पा रहे हैं।

अमेरिका, रूस बनने के समय तो मैं इतना जाग्रत ही नहीं था कि कुछ बनाने में अपनी बहुमूल्य राय दे पाता। लेकिन, अब देश कैसा बने इसमें मेरी बहुमूल्य राय काम आ सकती है। चीन जैसा देश बनने में मुझे जाग्रत होने के साथ ही चिढ़ होनी शुरू हो गई थी। उतनी ही जितनी कोई अगर पाकिस्तान जैसा बनने की वकालत कर दे।

इसकी सीधी-सीधी कई वजहें थीं
चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा जमा रखा है।
चीन ने तिब्बत पर जबरी कब्जा जमाया हुआ है। घिघियाए दलाई लामा भारत में हैं, उनसे अनायास सहानुभूति है।
कम्युनिस्ट चीन में तानाशाही है।
हमारे देश में जो, कम्युनिस्ट बने घूम रहे हैं वो, सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करके काम चला रहे हैं।
कम्युनिस्ट राज्यों के पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो, बता सके कि चीन जैसा ही बनना चाहिए। एक पश्चिम बंगाल थोड़ा बहुत था वो, भ्रम भी शीशे की तरह टूटकर चुभ रहा है।

इतनी वजहें दिमाग में ऐसे घर किए हुए हैं कि जब मैं देहरादून, अमर उजाला में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA) में पासिंग आउट परेड कवर करने गया तो, जॉर्ज फर्नांडिस से लगभग भिड़ सा गया था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, पासिंग आउट परेड के मुख्य अतिथि थे। POP भाषण के दौरान उन्होंने चीन का जिक्र किया और उसकी जमकर तारीफ की। मंच से उतरते ही दूसरे पत्रकारों के साथ मैंने उन्हें घेर लिया। और, कड़े लहजे में सवाल दागा- क्या आप भारत में चीन मॉडल की वकालत कर रहे हैं। फर्नांडिस ने कहा- मैं सिर्फ चीन के विकास की बात कर रहा था। लेकिन, मैं तो भरा हुआ था। फिर से मैंने वही सवाल किया। फर्नांडिस इतने झल्ला गए कि उन्होंने प्रेस से बात करने मना कर दिया। कहा- आप मेरे मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश कर रहे हैं।

खैर, मैंने देहरादून छोड़ दिया। और, मुंबई आ गया-मन में कहीं न कहीं बचपन से था कि मुंबई जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। लेकिन, मायानगरी में आते ही इसकी फिल्मी छवि टूट सी गई। मरीन ड्राइव के क्वीन्स नेकलेस से मैं मुंबई को पहचानता था। जहां पुरानी-नई मॉडल की शानदार गाड़ियों में बड़े लोग घूमते हैं। यहां एयरपोर्ट (अब तो, कम से कम एयरपोर्ट शानदार हो ही गया है) से उतरते ही झुग्गियों से गुजरकर होटल तक पहुंचा। समझ में आ गया मैं अपने पैतृक प्रतापगढ़ के गांव से निकलकर देश के सबसे बड़े गांव में आ गया।

गांव में सड़कें कच्ची-पक्की हो सकती हैं लेकिन, कोई भी दूरी तय करने में साइकिल से जितना समय लगता है उससे ज्यादा समय मुंबई में ट्रैफिक के बीच फंसी कारों से लग जाता है। गांव में खेत में लोग दिशा-मैदान जाते हैं तो, यहां भी रेलवे ट्रैक के किनारे लोग लैट्रिन करते मिल जाएंगे। झुग्गियों में तो लोग गांव से भी बदतर हालात में रह रहे हैं। हां, झुग्गी में भी एयरकंडीशनर जरूर लगा है। अपने गांव देश की लंबी-चौड़ी जगह और शानदार हवा-पानी को छोड़कर लोग तरक्की तलाशते नाले के ऊपर-सड़क के किनारे-रेलवे ट्रैक के किनारे बदबूदार जगह में एक चारपाई की जगह में झुग्गी बनाकर तरक्की वाले देश में रह रहे हैं।

फिर, कभी-कभी लगता है कि दिल्ली जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। और, दिल्ली इधर जिस तेजी से बदल रही है—कि हर महीने भर पे भी दिल्ली जाओ तो, नई सी लगती है, ढेर सारे फ्लाईओवर, चमचमाती सड़कें- उससे और लगता है कि देश, दिल्ली जैसा ही हो जाए। फिर, लगा कि नहीं यार इतनी सड़कों-फ्लाई ओवरों पर दिल्ली वाले तो, मजे से चल ही नहीं पा रहे हैं। ऑफिस के टाइम में तो, मुंबई से थोड़ा ही भले रह पाते हैं। फिर भी दिल्ली देश की अकेली वर्ल्ड क्लास सिटी लगती है।

और, लीजिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में होने वाला है। उसकी तैयारी की वजह से ये दिल्ली का साज-सजावट ज्यादा तेजी से हो रही है। बड़ी मुसीबत है भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे देश के बगल में होना। पाकिस्तान रोज हम पर बिना वजह गोली बरसाता रहता है-धमाके करता रहता है। निर्दोष मारे जाते हैं। तो, चीन की तरक्की से हम ऐसे ही मरे जा रहे हैं। चीन 5 SEZ बनाता है तो, हम 500 SEZ के प्रस्ताव पास कर देते हैं। जबकि, हमें ये अच्छे से पता है कि हमारे लिए SEZ मॉडल काम का नहीं है। और, देखिए हमें भी 108 साल में ओलंपिक में रिकॉर्ड बनाने के लिए चीन की राजधानी बीजिंग ही एक जगह मिली थी।

रिकॉर्ड भारत ने भी बनाया और चीन ने भी। भारत देश की अब तक की जिंदगी का पहला और अकेला निजी स्वर्ण पदक मिला। चीन के खिलाड़ी 51 स्वर्ण पदक लटकाए घूम रहे हैं। हम कुल जमा तीन गिनती में पहुंचे तो, चीन ने पदकों की सेंचुरी मार दी। लीजिए, साहब अब चीन से कुछ तुलना बची क्या। स्वर्ण पदक के लिहाज से चीन हमसे 51 गुना आगे, अपना कांसा भी मिला लें तो, भी चीन तीस गुना आगे। अब मैं सोच रहा जॉर्ज फर्नांडिस गलती से ही सही कह रहे थे हमें चीन जैसा बनना चाहिए। वो, भी उन जवानों की पासिंग आउट परेड में जो, हो सकता है चीन की उसी सीमा पर तैनात कर दिए जाएं। जहां चीन ने लंबे भारतीय क्षेत्र पर चीनी झंडे लगाकर नई सीमा बना दी है।

अब मुझे भी लगता है कि हम चीन जैसा ही देश बनें। कांग्रेसी-कम्युनिस्ट तो, खुश होंगे ही। संघी भी खुश होंगे बस उन्हें ये नहीं बताना है कि हम कम्युनिस्ट चीन जैसा बन रहे हैं। वैसे, संघियों को भी गुजरात एक देश बनाने का मॉडल मिल गया है। लेकिन, फिर वही बात कि हम चीन तो हैं नहीं थ्येन आन मेन चौक पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले छात्रों का नरसंहार करने वाली रेड आर्मी किसी को याद तक नहीं है। चीन की तरक्की सबको याद है। अब एक चुनाव विकास के मुद्दे पर जीतने वाले नरेंद्र मोदी भी शायद तरक्की से सब ढंक दें। लेकिन, गुजरात में है तो, लोकतंत्र ही ना। तानाशाही तो है नहीं कि बस एक ही पार्टी, एक ही राज। फिर, तो हम चीन भी नहीं बन पाएंगे। वैसे, मेरे स्वर्गीय बाबा श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री मुझकों अक्सर समझाते हुए एक श्लोक सुनाते थे जो, मुझे अब याद नहीं है। लेकिन, उसका मतलब मुझे याद है कि हाथी के पैर में सबका पैर समा जाता है। यानी इतने बड़े बनो कि सारी गलतियां उसमें छिप जाएं। अब भारत की पहचान भले दुनिया में हाथी के तौर पर होती है लेकिन, हम हाथी नहीं बन पा रहे हैं।

लीजिए, मैं चीन, गुजरात जैसा बनते-बनते फिर से हाथी यानी भारत बनने लगा। दिमाग में बाप-दादाओं का दिया भरा हुआ है ना। अरे, अब तो मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा। क्या हम बिना चरित्र के ही देश रह जाएंगे। ए भाई, किसी को समझ में आ रहा हो तो, बताओ ना- हम कैसा देश बनें। और, देश के वीरों ये सलाह मत देना कि हमें किसी की नकल की जरूरत नहीं हम भारत हैं और भारत ही बनेंगे। क्योंकि, आजादी के करीब बासठ सालों बाद भी हम भारत जैसा बनते-बनते बिना किसी चरित्र के रह गए हैं। प्लीज, बताइएगा जरूर, हम ही नहीं देश मानसिक उलझन में है।


8 Comments

Udan Tashtari · August 26, 2008 at 11:31 pm

झक्क्कास!!!

अपने हाथ में क्या है जी-देश जैसा भी बन रहा है, अपने आप बने जा रहा है. 🙂

बेहतरीन लिखा है.

अभिषेक ओझा · August 26, 2008 at 11:46 pm

अरे मालिक जब पूरा देश ही उलझन में है तो हम कौन से देश से बाहर हैं ! हम भी तो साथे उल्झानियाये हुए हैं. वैसे सवाल बहुत सही है ! जवाब मिले तो हमें भी बताइयेगा.

अनूप शुक्ल · August 27, 2008 at 12:53 am

अच्छा लिखा।

संगीता पुरी · August 27, 2008 at 1:59 am

हमलोग क्या बतला सकते हैं ….. देखते जा रहे हैं …..देश क्या बनता है ?

महेंद्र मिश्रा · August 27, 2008 at 3:13 am

theek hai ji desh chal raha hai or chalata rahega .likha achcha hai.

Gyandutt Pandey · August 27, 2008 at 5:14 am

हम कर भी क्या सकते हैं? केवल समुद्र सुखाने के लिये गिलहरी यज्ञ?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · August 27, 2008 at 5:34 pm

ऐसे पूछ रहे हैं, जैसे हम बता देंगे तो वैसा बन ही जाएंगे!
यह तो भगवान भी नहीं जानता होगा कि भारत किस ओर जाने वाला है… न बता ही सकता है कि वह इसे किस ओर ले जाना चाहता है…फिर हमारी क्या मजाल?

कविता वाचक्नवी · October 2, 2008 at 7:15 pm

प्रश्न तो विचारणीय है; जबकि उत्तर स्वयम् हमारे हाथ में है।

Comments are closed.