महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा दूसरी बार जाना हुआ। करीब दो साल पहले पहली बार वर्धा जाना हुआ था। नागपुर से वर्धा पिछली बार रेलमार्ग से ही गए थे। इस बार सड़क के रास्ते गए। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। लेकिन, इस पोस्ट में बात सिर्फ वर्धा की। वर्धा वैसे तो महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इसकी प्रसिद्धि में एक और वजह जुड़ गई है महात्मा गांधी गांधी के नाम पर बना अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। दुनिया में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ये केंद्रीय विश्वविद्यालय बना है। जैसा मुझे पता है कि करीब चालीस करोड़ रुपए का बजट है। जब दो साल पहले हम यहां सोशल मीडिया पर बात करने के लिए गए थे तो विषय था- हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता। जाहिर है जब ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया है तो किसी तरह की आचार संहिता की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। सिवाय स्वनियंत्रण के। लेकिन, कुछ बातें तय हुईं। उस समय हम लोगों को फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में रुकने का अवसर मिला था। क्योंकि, तब विश्वविद्यालय के पास और कोई बेहतर जगह नहीं थी। ये छात्रावास विदेशी छात्रों के लिए है जो यहां रहकर हिंदी पर परास्नातक या शोध की पढ़ाई करना चाहते हैं।

2 साल पहले की तस्वीर पीछे छात्रावास बनने के क्रम में

विश्वविद्यालय तब बनने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ रहा था। पहाड़ियों पर बसे इस विश्वविद्यालय में जिस तरह से प्रशासनिक भवन, छात्रावास, सभागार बना था। वो काफी खींचने वाला था। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास से मुख्य द्वार की तरह जाएं तो दाहिने मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बना रास्ता गांधी हिल्स की तरफ ले जाता है। गांधी हिल्स चढ़ने से पहले बाएं नजर डालेंगे तो नजीर हाट नजर आएगी। दो साल पहले  नजीर अकबराबादी के नाम पर बनी नजीर हाट नहीं थी। रही भी होगी तो, बस शुरुआत हुई थी। इस बार वो काफी व्यवस्थित बनी थी। उसमें हर जरूरत के सामान की दुकान थी। और, हिंदी में लिखे नाम आकर्षित करते हैं। एक दुकान पर कुंतल लिखा देखकर मैं भी सोच में पड़ गया कि ये किस काम की दुकान है। बाद में पूछकर समझा कि ये नाई की दुकान है। वहीं पर भरे पूरे दूध वाली कॉफी स्टील के बड़े मग जैसे कप में निपटाई गई।

मुंशी प्रेमचंद मार्ग घुमाव लेते हुए ऊपर चढ़ता है तो गांधी हिल्स पर पहुंचता है। अच्छा पार्क है। यहां गांधी जी की प्रतीक वस्तुओं से सजा पार्क बना हुआ है। ये सब दो साल पहले भी था। पार्क के द्वार पर ही लिखा है कि कृपया जूते-चप्पल उतारकर अंदर जाएं। हालांकि, सीमेंटेड खुरदुरी जमीन होने से ज्यादातर लोग (खासकर नियमित आने वाले छात्र) तो जूते चप्पल पहने ही अंदर आते हैं। हमने लिखे को पढ़ा, पढ़कर पालन किया। जूते-चप्पल उतार दिए।

हम ऐसे समय पहुंचे थे कि शाम धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। दोनों तस्वीरें गांधी हिल की खूबसूरती बयां करती हैं। गांधी जी की प्रतीक झोपड़ी, गांधी जी का चश्मा, तीनों बंदर और दूसरी प्रतीक वस्तुएं भी बड़े सलीके से सजाई गई हैं। शाम गहराने लगी तो पार्क में लगे लैंप भी जल गए। हालांकि, तब तक शाम से रात नहीं हुई थी। लेकिन, इस गहरी शाम में जो चित्र आया वो भी अच्छा दृष्य पैदा कर रहा है ।

इस बार भी वर्धा में मिले हिंदयुग्म वाले शैलेष भारतवासी ने कहा कि कोई हिमांशु हैं यहीं शोध कर रहे हैं। उनसे मिलने का प्रयास काफी देर बाद सफल हुआ। क्योंकि, शैलेष उनके लखनऊ के नंबर पर प्रयासरत थे। काफी प्रयास के बाद हम मिले तो पता चला कि वहां का एक स्थानीय मोबाइल नंबर भी है। लेकिन, लखनऊ वाला नंबर जिंदा रखे हुए हैं। हम लोग नजीर हाट में मिले। उसके बाद मुख्य द्वार के बाहर की चाय की दुकान पर चर्चा चकल्लस का क्रम बढ़ा। टीन के डिब्बे चाय की दुकान पर बेंच कुर्सी की शक्ल में मिले। बैठे तो उन्होंने ये अहसास नहीं होने दिया कि वो असल में क्या हैं। हिमांशु नवल किशोर प्रेस के राष्ट्रीय चेतना में योगदान पर शोध कर रहे हैं। उर्दू भी सीख रहे हैं जो शोध के लिए जरूरी है। हिमांशु तहलका के लिए लिखते रहे हैं। इस चाय की दुकान से और हबीब तनवीर सभागार तक एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती रही कि यहां के बच्चे जाग रहे हैं। चेतना जागृत है। और इतनी कि जो ब्लॉगर साथी गए थे उनकी चेतना भी जगा रहे थे। इसीलिए किसी भी विश्वविद्यालय केंद्र पर जाना मुझे बहुत खींचता है। पता चला कि अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अलग-अलग विषयों पर पढ़ने शोध के काम में एक हजार से ज्यादा छात्र हो गए हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय छात्रों की उपस्थिति अभी कम है। इस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुलपति विभूति नारायण राय को काम करने की जरूरत है।

वैसे विभूति नारायण राय इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि 2 साल में ही उन्होंने विश्वविद्यालय का कायाकल्प कर दिया है। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में इस बार हम लोगों को छात्रों के कमरे घेरने की जरूरत नहीं पड़ी। हमें नई बनी नागार्जुन सराय में रुकाया गया। किसी होटल के कमरे जैसे अतिथि कक्ष थे। बाहर से एक तस्वीर ली थी वही यहां लगा रहा हूं। वहां विनोद कुमार शुक्ल जी से भी मुलाकात हुई। हम लोग जब सोशल मीडिया पर बात करने पहुंचे थे उसके ठीक पहले दुनिया भर के कवियों का जमावड़ा हुआ था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही ढेर सारे मेरी पहचान में न आ पाने वाले कवियों की तस्वीरें चिपकी थीं। हालांकि, न पहचान का दोष मेरा है। क्योंकि, कविता और कवियों से मेरा वास्ता कम ही है।

तस्वीर में वो बात नहीं काफी बेहतर प्रस्तुति

हम लोगों की संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। और ये भी समझ में आया कि विश्वविद्यालय के छात्रों की रचनात्मकता जिंदा है। आकार प्रकार भी इस विश्वविद्यालय का पहाड़ियों पर बसे होने की वजह से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तरह है। और, काफी कुछ गतिविधियां भी। हालांकि, JNU दिल्ली में है। और लंबे समय से विशुद्ध वामपंथ का जमावड़ा रहा है। वैसे अच्छा ये होगा कि सिर्फ वामपंथ का जमावड़ा बनकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय न रह जाए। जवानी में जितना वामपंथ हर किसी में होता है उतना तो जरूरी है। लेकिन इसे छोड़ भी दें तो और मामलों में भी वर्धा जेएनयू बनने की पूरी संभावना रखता है। इसका बड़ा श्रेय कुलपति विभूति नारायण राय को जाता है जो गालियां खाकर भी सोशल मीडिया वालों को बुलाने से बाज नहीं आते।  दो साहसी कदम कुलपति विभूति नारायण राय को और उठाने चाहिए। पहला रात दस बजे की छात्राओं पर पाबंदी हटाने की और दूसरा विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की शुरुआत करने की। उम्मीद करें कि एक और बेहतर विश्वविद्यालय तैयार होगा। 


13 Comments

प्रवीण पाण्डेय · September 26, 2013 at 7:35 am

हिन्दी के उत्थान के प्रति आशायेंं तो हैं पर उन आशाओं के परिपूर्ण होने की आशायें भी जग जायें।

Darshan jangra · September 26, 2013 at 8:29 am

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल – शुक्रवार – 27/09/2013 को
विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय – हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः24 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर …. Darshan jangra

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) · September 26, 2013 at 9:03 am

निस्संदेह एक अविस्मरणीय अनुभव रहा यह..

संतोष त्रिवेदी · September 26, 2013 at 1:32 pm

जय हो 🙂

संतोष त्रिवेदी · September 26, 2013 at 1:33 pm

जय हो 🙂

संध्या शर्मा · September 26, 2013 at 2:42 pm

"विश्वविद्यालय के छात्रों की रचनात्मकता जिंदा है। "
विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार और उत्थान के लिए उम्मीद की नई किरण जगमगाई …. बढ़िया संस्मरण

अनूप शुक्ल · September 27, 2013 at 2:18 am

बहुत सुन्दर संस्मरण!

पंकज कुमार झा. · September 27, 2013 at 6:53 am

सुन्दर …रोचक.

arvind mishra · September 28, 2013 at 2:09 pm

गांधी हिल की रात की फोटो तो गज़ब की है! एक अच्छी रिपोर्ट -बहुत से अनछुए पहलुओं को लिया आपने

    Harsh · October 4, 2013 at 12:30 pm

    रात हुई नहीं थी। शाम गहरा रही थी तब की है।

शकुन्‍तला शर्मा · September 30, 2013 at 8:22 am

सुन्दर ,सरस । सम्यक एवम् सटीक शब्द-विन्यास ।एक-एक शब्द के भाव पर ,पैनी नज़र । बधाई ।

वन्दना अवस्थी दुबे · October 4, 2013 at 11:55 am

एकदम बढिया है 🙂 आपकी तस्वीर पोस्ट कर दी है भाई 🙂

    Harsh · October 4, 2013 at 12:29 pm

    🙂

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