इतिहास ने कभी साहित्यकारों को इस तरह से दुनिया की किसी
सरकार के खिलाफ लामबंद होते हुए शायद ही देखा होगा। सबसे ज्यादा चेतन, सृजन का
जिम्मा रखने का दावा करने वाले साहित्यकारों के साथ हिंदुस्तान में ऐसा क्या हो
गया। जो, उन्हें इस तरह से सरकार के पैसे से चलने वाली लेकिन, स्वायत्त संस्था
साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के लिए बाध्य करने लगा। क्या सचमुच हिंदुस्तान
की सरकार ने साहित्य, कला या फिर एक शब्द में कहें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
छीन ली है। क्या सचमुच इस देश में ऐसा कुछ नरेंद्र मोदी की सरकार ने गलत कर दिया
है, जो पहले किसी सरकार ने नहीं किया था। क्या सचमुच इस समय देश के हालात आपातकाल,
सिख दंगे या फिर देश के अलग-अलग हिस्से में हुए दंगों के समय के हालात से भी
ज्यादा खराब हैं। क्या सचमुच इस भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के समय
में अल्पसंख्यक- ईसाई और मुसलमान ही पढ़ें- खतरे में है। इन सवालों का जवाब खोजना
इसलिए जरूरी है कि यही सवाल उठाकर जवाब में कुछ साहित्यकारों ने अपने साहित्य
अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं।
अब ये भले ही सारे लोग कह रहे हैं कि उदय प्रकाश की शुरुआत
को धार देने वाली नयनतारा सहगल से लेकर अशोक वाजपेयी और फिर सारे साहित्यकारों ने
अलग-अलग अपनी अंतरात्मा की आवाज पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं। लेकिन,
ध्यान से देखिए। सब साफ हो जाएगा। नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश खाए-पिए-अघाए का
श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हर तरह से इतना खाए हैं कि उल्टी करने से थोड़ा स्वास्थ्य ठीक
होगा। मन हल्का रहेगा। और सबसे बड़ी बात कि आगे उससे भी अच्छा खाने का जुगाड़
होगा। ढेरों पाए तो कभी-कभी कुछ-कुछ लौटाए। जब एकदम न पाए, तो कैसे-क्या लौटाए।
अब उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी या फिर उसके बाद साहित्य अकादमी
पुरस्कार लौटाने वालों की जन्मकुंडली खंगालें। इससे बेहतर है कि पद्मश्री पुरस्कार
लौटाने वाली पंजाबी लेखिका की सुन लें। बस उनका बयान ही छद्म धर्मनिरपेक्षता और
किसी भी हद तक जाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी
के विरोध की कहानी कह देता है। पंजाबी लेखिका दलीप कुमार तवाना ने पद्मश्री लौटाने
की जो वजह बताई है। उसे सुनने-पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि क्या हो रहा है।
दलीप कौर ने कहा है कि बुद्ध और गुरु नानक की धरती पर सिखों को खिलाफ 1984 में ज्यादती हुई और
मुसलमानों के खिलाफ बार-बार ज्यादती हो रही है। इसकी वजह समाज में
बढ़ती सांप्रदायिकता है। ये तो था, जो उऩ्होंने पद्मश्री लौटाते कहा है। मतलब 1984 से लेकर 2015 तक जो सिखों, मुसलमानों पर ज्यादतियां हो रही थीं। वो शर्म का पानी अब
जाकर उनके नाक में घुसने लगा था। इसलिए पिछले कई दशकों तक बेशर्म रहने के बावजूद
अब वो शर्मसार साबित होना चाहती हैं। यही सच है पुरस्कार लौटाने का। समझ रहे हैं
न। आजादी के बाद किसी भी धर्मनिरपेक्ष सरकार में जो कुछ भी गलत हुआ है। उस सबका
हिसाब मांगने के लिए एक तय कर दी गई सांप्रदायिक सरकार मिल गई है।
मुझे याद है कि पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में ही ये समझ
में आ गया कि वामपंथी पत्रकार ठोंककर कहेगा कि मैं वामपंथी हूं। फिर भी बेहतर
पत्रकार, सरोकारी पत्रकार बना रहेगा। लेकिन, राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ की बात ठोंककर छोड़िए,
तर्क के साथ करने वाला भी पत्रकार नहीं, सिर्फ संघी या उससे भी आगे सांप्रदायिक
संघी कहलाएगा। यही इस देश के साहित्यकार और सरकार के फर्जी धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ का
सच है। ये बेहद घिनौना सच है। इन साहित्यकारों को डर अब यही है कि ये सच उघड़कर
सबके सामने आ जाएगा। काफी हद तक सामने भी आ चुका है। न आता तो पूर्ण बहुमत की
बीजेपी की सरकार की कल्पना इस देश में कोई कर सकता था क्या।
सोचिए सारी सांसारिक तिकड़मों को आजमाकर सत्ता में आए लोग
इस देश में सरोकारी, समाजवादी बने रहे। लेकिन, विशुद्ध रूप से विकास के मुद्दे पर
मई 2014 में चुनाव जीतने वाली पार्टी आज भी इन साहित्यकारों के तय खांचे में
सांप्रदायिक बनी रही। मई 2014 में जाति हार गई थी। अब ये 2015 में जाति जिंदा कर
देना चाहते हैं। वैसे ये कहते हैं कि जातिप्रथा तो संघ और दक्षिणपंथ ने पाल रखी
है। ये अभी तक ये कहते रहे कि इनको तो जनता वोट तक नहीं देती। अब जब जनता वोट देकर
सत्ता दे चुकी है। तो ये कह रहे हैं कि जनता भ्रमित हो गई है। यानी हर तरह के
प्रमाणपत्र का ठेका सिर्फ इन्हीं के पास है। अब ये ठेका छिन रहा है। डर लग रहा है
कि ये बने रहे, तो आगे किसी तरह का पुरस्कार इन जैसे छद्म धर्मनिरपेक्षता की जमीन
पर रचनाकार बने लोगों को नहीं मिलने वाला। इसलिए ये पूरा जोर लगा रहे हैं। इतना कि
ठीक बिहार चुनाव के समय ये सबकुछ हो रहा है। ठीक है पांच साल की मोदी सरकार का तो
अब कुछ कर नहीं सकते। बिहार में भाजपा हारी, तो मोदी पर ही ठीकरा फोड़ेंगे। इस समय
साहित्यकारों के दर्द और लालू प्रसाद यादव के दर्द जोड़कर देखिए। लालू जी कह रहे
हैं कि बिहार चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी को इस्तीफा देना पड़ेगा। नहीं देंगे, तो
हम आंदोलन करेंगे। बताइए समाजवाद के नाम पर, जेपी के नाम पर बिहार का क्या हाल
लालू प्रसाद यादव ने किया। इसको समझने के लिए देश के किसी राज्य की राजधानी से एक
बार पटना जाइए। समझ में आ जाएगा बिहार को कहां टिकाए रखने की इच्छा है। मैं उन
तर्कों की बात ही नहीं कर रहा कि कहां-किसकी हत्या हुई। और जवाब किस सरकार से
मांगा जा रहा है। मैं तो बात बड़े षडयंत्र की बुनियाद की तरफ कर रहा है। छद्म
सेक्युलर सिंडिकेट टूट रहा है। सरोकार के नाम पर दुकान चलाने वालों की ये ग्राहक
तैयार करने, बचाने की आखिरी कोशिश है। इन छद्म धर्मनिरपेक्ष साहित्यकारों की चिंता
ये भी है कि अभी तक सिर्फ इनके जैसे ही पुरस्कृत होते थे। ये सिर्फ अपने जैसों को
ही साहित्य की विधा में बर्दाश्त कर पाते हैं।
ये नामवर सिंह और मुनव्वर राना को भी बर्दाश्त नहीं कर सके।
ये कह रहे हैं कि मेरे जैसे बनो या तुम्हारा अस्तित्व ही मिटा देंगे। उदाहरण देखिए
14 अक्टूबर को मुनव्वर राना ने कहा जो पुरस्कार लौटा रहे हैं। उनको अपनी कलम पर
भरोसा नहीं है। वे थक चुके हैं। हालांकि, तीन दिन बीतते-बीतते राना की भी कलम पर
थकने का दबाव बन ही गया। और उन्होंने एक टीवी चैनल के लाइव शो में पुरस्कार लौटाने
का एलान कर दिया। तब मैंने मुनव्वर राना के ऊपर कुछ लिखा। हालांकि, मैं वामपंथी
नहीं हूं, तो ये कविता या साहित्य नहीं हो सकता।
ए राना तेरी तो
बड़ी शोहरत थी 
फिर ये पुरस्कार वापसी का लाइव तमाशा
क्यों किया तूने
मुनव्वर राना की
रायबरेली में नालियों में बहती थी सत्ता
सड़ती रही, बदबू करती रही
राना उस सत्ता पर फक्र करता रहा, सत्ता की सड़ांध पर
इत्र डालकर खुशबू का अहसास करता रहा 
अच्छी बात ये है कि राना शायद इतने बेगैरत और नासमझ नहीं
थे। जो उन्हें समझ में न आता कि देश में कितने खराब हालात हैं। और इस तरह भारतीय
जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ तयकर की जा रही पुरस्कार वापसी से देश कितना बचेगा।
छद्म धर्मनिरपेक्ष साहित्यकारों के पतन की कहानी जारी है। कुछ लोग पतनशील साहित्य
लिखते थे। अब कुछ लोग नामवर सिंह को पतनशील साहित्यकार कह रहे हैं। वजह। अरे वही।
संघियों से मिल गया लगता है। मेरे जैसे नहीं, तो नहीं चलोगे। बदनाम कर देंगे। गैरसरोकारी बना देंगे। इनका
यही मूल मंत्र है। वजह सिर्फ ये नामवर सिंह ने कह दिया कि सम्मान लौटाना गलत है।
क्योंकि, ये पुरस्कार सरकार नहीं साहित्यकारों की संस्था साहित्य अकादमी देती है। लेकिन,
ये कोई सोए थोड़े ना हैं। जो इनको कोई जगा सकता है। ये इस अंदाज में हैं कि तुम
हमारे पुरस्कार वापसी को मौकापरस्ती बताओगे, तो हम तुम्हें दंगाई कह देंगे। अब बोलो। बोलती बंद हो गई।