ये
जैक रोजर हैं। अमेरिकी हैं। लेकिन, अब ये
खुद को गढ़वाली कहलाना ही पसंद करते हैं। जैक के साथ काम करने वाले ज्यादातर
गढ़वाली ही हैं। वो कहते हैं जैक साहब उनसे ज्यादा गढ़वाली हैं। जैक पहाड़ बचाना
चाहते हैं और उनके मन में ये पक्का है कि बिना पहाड़ के लोगों की जेब में कुछ रकम
हुए पहाड़ बचने से रहा। गढ़वाल के 5 जिलों
में इनका संगठन महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रहा है। आधे साल से ज्यादा जैक
गुप्तकाशी में ही रहते हैं। जैक के हाथ का रक्षा (कलावा) बता रहा है कि जैक हिंदू
मान्यता से कितना बंध चुके हैं। ये अनायास है। कोई हिंदू संगठन इन्हें ये करने को
नहीं कह गया। जैक के घर में केदारनाथ मंदिर भी है। जैक अमेरिका से 1966 में पहली बार आए थे।

जैक
के हिंदुस्तान के प्यार में पड़ने की कहानी भी थोड़ा हटके है। जैक रोजर अपनी जवानी
के दिनों में अमेरिका से भारत एक सरकारी कार्यक्रम के तहत आए थे। वो 1966 में अपना
पहली बार भारत आना बताते हैं। हालांकि, उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति Lyndon B Johnson थे
लेकिन, जैक अमेरिकी राष्ट्रपति John F. Kennedy का जिक्र करते हैं। अमेरिकी सरकार ने
भारत-अमेरिका के लोगों के बीच संबंध बेहतर करने के लिए एक कार्यक्रम चलाया था। उसी
में ढेर सारे अमेरिकी नौजवान भारत की अलग-अलग जगहों पर आए थे। जैक उत्तर प्रदेश के
बदायूं आए थे। जैक हंसते हुए कहते हैं कि आप समझ सकते हैं कि भारत बदायूं से कैसा
दिखता है। जैक आए और चले गए। बीच-बीच में कई बार वो भारत आए। जैक बताते हैं कि
उन्होंने बीस साल तक कुछ नहीं किया। सिवाय विशुद्ध मस्ती के। फिर वो पौड़ी आए और
वहां जैक ने लंबा समय बिताया। धीरे-धीरे गढ़वाल से उनका मोह बढ़ा। इतना कि वो साल
के आधे से ज्यादा महीने गढ़वाल में ही बिताने लगे। फिर उन्होंने संस्था बनाई और
उसके जरिए काम शुरू किया। जैक कहते हैं कि महिलाएं हमेशा बेहतर प्रबंधक होती हैं।
साथ ही महिलाएं ढर्रे से हटकर काम जल्दी से सीखती हैं। और पहाड़ की अर्थव्यवस्था
महिलाओं के ही हाथ में हैं। पुरुष तो रोजगार की तलाश में यहां से निकल लेता है।
इसीलिए पहाड़ को बचाने और पहाड़ के लोगों के हाथ में कुछ कमाई का जरिया देने की
नीयत से जैक ने ये काम शुरू किया। आज करीब दस हजार परिवारों में जैक की संस्था काम
कर रही है। ऐसे छोटे-छोटे प्रयास से ही हिंदुस्तान चल रहा है। और कई बार जैक जैसे
अमेरिकियों का प्रयास भी हिंदुस्तान को बचा रहा है, बना रहा है। कमाल ये कि जैक के
इस प्रयास की बुनियाद एक सरकारी कार्यक्रम से हुई। जैक ने ये सबकुछ अच्छी हिंदी में ही बताया। 

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