आजाद भारत में अंग्रेज इंग्लैंड से आकर विजय दिवस मना रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों के विद्रोह को दबाने में मारे गए अंग्रेज सैनिकों-अफसरों को उनके परिवार के लोग भारत में हर उस जगह जाकर महान बता रहे हैं। जहां उनके बाप-दादाओं ने हमारे स्वाधीनता सेनानियों का खून बहाया था। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत का वो मजाक उड़ा रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों को विद्रोह को बेरहमी से कुचलने वाले मेजर जनरल हैवलॉक के पड़पोते को विजय दिवस मनाने की इजाजत हमारी सरकार ने ही दी है।

कमीने हैवलॉक का पड़पोता मार्क एलेन हैवलॉक के साथ हम भारतीयों का मजाक उड़ाने के लिए पूरा अंग्रेज दस्ता साथ आया है। हमें तो पता भी नहीं चलता। वो आकर हम पर 200 साल हुकूमत करने का जश्न मनाकर चले भी जाते। लेकिन, मेरठ में विद्रोह दबाने वाले अंग्रेज अफसरों के बचे निशानों पर विजय दिवस मनाने की खबर मीडिया में आने के बाद इसका विरोध शुरू हुआ तो, लोगों के गुस्से को दबाने के लिए लखनऊ में गोरी चमड़ी वालों को भारतीयों की बगावत को कुचलने वाले अफसरों के रिश्तेदारों को विजय दिवस मनाने की इजाजत वापस ले ली गई।

लेकिन, सवाल यही है कि आखिर केंद्र की यूपीए सरकार क्या इजाजत देने से पहले ये नहीं जानती थी कि वो कैसा अनर्थ कर रही है। पश्चिमी सभ्यता हममें कुछ ऐसी रच बस रही है कि अपने स्वाधीनता सेनानियों की स्मृतियां बहुत कम ही हमारे मन-मस्तिष्क में बची हुई हैं। अब हमारी खुद की चुनी लोकतांत्रिक सरकार ही हमें गुलाम बनाने वालों को देश में बुलाकर विजय दिवस मनाने की इजाजत दे रही है। ये खबर पढ़ने के बाद मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा है कि हम अभी भी गुलाम हैं क्या।


2 Comments

महेंद्र मिश्रा · September 25, 2007 at 2:33 pm

1857 के भारतीय सैनिकों को विद्रोह को बेरहमी से कुचलने वाले मेजर जनरल हैवलॉक के पड़पोते को
विजय दिवस मनाने की इजाजत हमारी सरकार ने देकर अपनी ग़ुलामी मानसिकता का प्रमाण
दिया और जनरल के पड़पोते को विजय उत्सव मनाने क़ि अनुमति देकर राष्ट्र भक्तो
और देश के लिए अपने प्राण नि छा वर करने वाले शहीदो का अपमान किया है | सरकार द्वारा दिए गये निर्णय
क़ि जितनी भी निंदा क़ि जाए कम है |

Reyaz-ul-haque · September 25, 2007 at 7:00 pm

नहीं जनाब. कौन कहता है कि गुलाम हैं? आज़ादी तो इफ़रात से है. आज़ादी है लोगों को गुलाम बनाये रखने की, आदिवासियों को लूटने और उजाड़ने की, दंगे करने की, रामसेतु और निकाहनामे पर हंगामा करने की और क्रिकेट में जीत कर हुड़दंग करने की. गुलाम लोग यह सब थोडे़ कर पाते हैं?

काहे चिंता में दुबलाये जा रहे है? खाइए पीजिए मस्त रहिए.
जै हो आज़ादी मइया की.

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