इस
लोकसभा चुनाव के परिणामों ने बहुत कुछ साबित किया है। और साबित ये भी हो गया है कि
नरेंद्र मोदी की राजनीति ने देश में धर्म और जाति की राजनीति का शीर्षासन करा दिया
है। एक पिछड़े व्यक्ति को संघ ने प्रचारक बनाया और संघ के प्रचारक के तौर पर
नरेंद्र मोदी का कार्यकाल रहा हो या भारतीय जनता पार्टी में नेता के तौर पर। अगर
ध्यान से देखें तो संघ में सारे ब्राह्णण से लेकर अगड़ी जातियों के प्रचारक रहे
हों या फिर भारतीय जनता पार्टी। सभी जगह नरेंद्र मोदी ने पहले संघ और भारतीय जनता
पार्टी की राजनीति में काम करते हुए अपने वरिष्ठों के सहयोग से और फिर अपनी खुद की
रणनीतिक ताकत से जिस तरह तरक्की की है, वो भी समझनी जरूरी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ लंबे अरसे से जिस तरह जाति की राजनीति की तोड़ने की कोशिश कर रहा था। उसमें
गोविंदाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग के बाद ये मास्टर स्ट्रोक था। जिस तरह से अपने
उद्भव के बाद पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजनीतिक तौर पर इतनी सक्रिययता
दिखाई। उतनी सक्रियता न तो संघ ने जनसंघ के समय में सार्वजनिक तौर पर दिखाई थी और
न ही पहले स्वयंसेवक जाति से ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाने के
लिए। और अद्भुत है कि जो व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच चुका हो और उससे
पहले जो व्यक्ति देश के सबसे विकसित राज्य का मुख्यमंत्री करीब चौदह साल रहा हो
वो, इस तरह का था कि उसका परिवार अभी देश के किसी सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की
ही तरह दिखता है। जिस दौर में किसी नेता से रिश्ते बना लेने से करोड़ो-अरबों की
संपत्ति लोग बना लेते हैं। उस दौर में देश के सबसे बड़े नेता के अपने निजी रिश्ते
वाले लोग वैसे के वैसे रहे। ये त्याग भारतीय जनमानस के मन में घर कर गया।
मैं
निजी तौर पर मानता हूं कि संघ की तरफ से 2014 की लोकसभा चुनाव की रणनीति 2004 की
लोकसभा चुनाव के बाद की सोनिया गांधी की रणनीति का तगड़ा जवाब है। आप कल्पना
कीजिए। एक विदेशी महिला ने भारतवर्ष में खुद को भारत, भारतीय संस्कृति के सबसे
बड़े लंबरदार मानने वाले संगठन को भारतीय संस्कृति के सबसे ऊंचे मानदंड यानी त्याग
पर ही चित कर दिया था। 2004 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विदेशी-विदेशी
चिल्लाता हुआ सोनिया गांधी पर हमला करके कांग्रेस को ही चित करने की रणनीति बना
रहा था तो, यही संसद का सेंट्रल हॉल था। जहां सोनिया गांधी आईं। देश देख रहा था।
देश देख रहा था सोनिया के लिए पागल कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भी। लोगों को वो
पागलपन भूल गया होगा कि किस तरह एक पागल हो रहे कांग्रेसी कार्यकर्ता ने अपनी
कनपटी पर पिस्तौल लगा ली थी। किस तरह संसद के सेंट्रल हॉल में सभी कांग्रेसी रुदन
अवस्था में आ गए थे। जब सोनिया ने ये एलान किया कि वो प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी।
सोनिया के सामने दरअसल कोई बाधा नहीं थी। भले ही ये प्रचारित किया गया कि विदेशी
महिला होने की वजह से सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं। लेकिन,
सच्चाई यही है कि दरअसल ऐसी कोई बाधा नहीं थी। उस समय गोविंदाचार्य वीपी हाउस के
अपने कमरे से सोनिया गांधी के विदेशी मूल के खिलाफ भारत का स्वाभिमान जगाने का
आंदोलन चला रहे थे। दक्षिण भारत के बड़े पत्रकार चो रामास्वामी भी इस मुहिम में
साथ थे। जंतर-मंतर तक रैली निकाली गई थी। और चो रामास्वामी के घर पर ही एक प्रेस
कांफ्रेंस हुई थी। जिसमें सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर सवाल खड़ा किया गया था।
लेकिन, इस सारी कसरत का सोनिया गांधी ने अपने एक कृत्य से शीर्षासन करा दिया था।
वो था सोनिया गांधी का त्याग। एक विदेशी महिला ने भारतीय परंपरा में
ऋषियों-मुनियों की तरह व्यवहार किया था। सोनिया गांधी ने साफ कर दिया कि वो
प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी। पूरी ताकत से सीताराम केसरी को कांग्रेस से अपमानित
करके बाहर करने का आरोप जिन सोनिया गांधी पर लगा वही सोनिया गांधी अपने इस एक
त्याग से महान हो चली थीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सारी रणनीति धरी की धरी रह
गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का चाणक्य की छवि रखने वाला प्रचारक गोविंदाचार्य
फ्लॉप हो चला था। सोनिया गांधी ने सिर्फ इतना ही नहीं किया। एक काम और किया। पहले
खुद को त्यागी दिखाकर महान बनाया। फिर अपने परिवार और कांग्रेस पर लगे सबसे बड़े
दाग को धोने का भी इंतजाम कर लिया। एक अर्थशास्त्री शानदार वित्त मंत्री रहे और
सिख मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। सिख प्रधानमंत्री बनाकर उन्होंने
उन्नीस सौ चौरासी में अपने पति पर सिखों के नरसंहार के दाग को धुलने की भी एक
नाकाम कोशिश की। लेकिन, एक काम जो हो गया वो ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने
एक बेहद त्यागी, महान महिला की चुनौती पेश कर दी। संघ हतप्रभ था। क्योंकि, किसी को
सपने में भी कल्पना नहीं थी कि पश्चिमी सभ्यता वाली सोनिया माइनो, गांधी बन जाने
के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र की सर्वाधिक शक्तिशाली कुर्सी पर बैठने
से इनकार कर देंगी। ये रणनीति सोनिया गांधी ने या जिस भी रणनीतिकार ने बनाई।
अद्भुत थी।
2004
में प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने वाली महिला इस देश के प्रधानमंत्री से भी अधिक
शक्तिशाली हो गई। दस सालों में सोनिया गांधी दुनिया की सबसे ताकतवर महिला में
शुमार की जाने लगीं थीं। ये त्याग की ताकत थी। ये त्याग की ऐसी रणनीतिक ताकत थी कि
सोनिया को सब मिल गया। एक ऐसा देश जो उन्हें एकदम से अपना मानने लगा था। एक ऐसा
प्रधानमंत्री जो अपने से पहले उनकी सुनने लगा था। हर बुराई का हिसाब-किताब मनमोहन
सिंह से प्रधानमंत्री के तौर पर मांगा जाता था। और हर अच्छाई के नंबर सोनिया गांधी
के खाते में बिना कहे जुड़ जाते थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के समय में
अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों की बलि दे दी गई। और कहा गया कि सोनिया गांधी और
उनकी नेशनल एडवाइजरी कमेटी न होती तो देश किस तरह से विदेशी नीतियों का गुलाम हो
जाता। वो तो सोनिया गांधी थीं जिन्होंने देश के कमजोर लोगों, आखिरी आदमी की चिंता
की। उस पर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए मुश्किल ये थी कि राम मंदिर अब नए
भारत के लिए भले ही आस्था का विषय हो लेकिन, वोटबैंक में तब्दील नहीं हो रहा था।
फिर देश भर में जिस तरह से धर्मनिरपेक्ष राजनीति के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ के विचार वाली भारतीय जनता पार्टी को अछूत बनाया गया वो भी एक बड़ी मुश्किल
पैदा कर रहा था।
ऐसे
में नरेंद्र मोदी जैसा संघ का स्वयंसेवक उभरता है लेकिन, जिसके ऊपर 2002 का इतना
बड़ा आरोप लगा हुआ था जो, धर्मनिरपेक्षता की अछूत वाली राजनीति के पैमाने पर
भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की मुश्किल और बढ़ा रहा था। लेकिन, नरेंद्र
मोदी एक खांटी प्रचारक निकले। भले ही उनके ऊपर हिंदू हृदय सम्राट का ठप्पा लगा रहा
हो। नरेंद्र मोदी ने सलीके से उसे विकास पुरुष में तब्दील कर दिया। और एक काम और
नरेंद्र मोदी ने धीरे से किया। वो का था अगड़ो की पार्टी और विचारधारा कही जाने
वाली पार्टी और संघ को पिछड़ों के न्याय वाली असल जगह बताने का काम मजबूती से
किया। नरेंद्र मोदी ने शुरू में बिल्कुल ये बताने की कोशिश नहीं की कि गुजरात का
मुख्यमंत्री पिछड़ी जाति से है। क्योंकि, गुजरात के मुख्यमंत्री के पिछड़ा नहीं
तरक्की पर आगे ले जाने वाली छवि भर हो। लेकिन, राष्ट्रीय परिदृष्य में ये जरूरी था
कि जाति की राजनीति को ध्वस्त किया जाए और धर्म के आधार पर वोटों का सीधा बंटवारा
न हो। ये दोनों काम नरेंद्र मोदी ने धीरे-धीरे किया। लेकिन, भारतीय राजनीति में
धर्म-जाति की राजनीति इतने गहरे जड़ें जमाए बैठी थी कि किसी धर्मनिरपेक्ष नेता को
ये यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ नरेंद्र मोदी गुजरात से निकलकर देश में कर
पाएंगे। जब 16 मई 2014 को बक्से खुले तो सबके मुंह भी खुले के खुले रह गए। ये
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक खांटी प्रचारक का सोनिया गांधी की त्याग की राजनीति
और देश के धर्मनिरपेक्ष आवरण वाले नेताओं की अछूत बनाने वाली राजनीति का तगड़ा
जवाब था। कांग्रेस के अलावा देश की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार एक स्वयंसेवक की
अगुवाई में बन रही थी। ये स्वयंसेवक पिछ़ड़ी जाति से भले था। लेकिन, इसने ये साबित
कर दिया कि उसकी सोच बहुत आगे की है। नरेंद्र मोदी ने देश में धर्मनिरपेक्षता की
राजनीति की सबसे बड़ी प्रतीक कांग्रेस को पटका। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों-दलितों
की राजनीति करने वाले मुलायम-मायावती को पटका। बिहार में पिछड़ों के सबसे बड़े
नेता नीतीश कुमार की राजनीति ध्वस्त कर दी। देश में क्रांति के अग्रदूत बनकर आए
अरविंद केजरीवाल की राजनीति ध्वस्त कर दी। लगा कि धर्म और जाति की राजनीति का शीर्षासन
हो गया। लेकिन, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। कुछ इसी अंदाज में तिलमिलाए नीतीश
का इस्तीफा आया। देश का पहला ‘महादलित
जीतन राम मांझी’ बिहार का मुख्यमंत्री बन गया। जाति की
राजनीति के पैर जमाने की कोशिश बिहार से फिर शुरू हो गई है। इस बार ये काम लालू
प्रसाद यादव ने नहीं। उन्हीं के पुराने साथी नीतीश कुमार ने किया है। लालू प्रसाद
यादव इस बार नीतीश की सरकार को समर्थन देंगे। लेकिन, सवाल यही है कि जाति का
राजनीति छोड़कर नीतीश ने विकास की राजनीति की तो बिहार आगे बढ़ता दिखा। अब वो फिर
से त्यागी बनकर जाति की राजनीति पर लौट रहे हैं। देखिए इस त्याग की कीमत बिहार किस
तरह चुकाता है या इसकी कीमत देश को भी चुकानी पड़ती है।