कुछ
दिन परिवार साथ नहीं था, छोटा वाला परिवार। छोटा वाला परिवार मतलब पत्नी और बच्चे। परिवार
का बड़ा हिस्सा तो इलाहाबाद में रहता है। तो छोटा वाला परिवार साथ नहीं था। अकेले
रहने पर खाना बनाना बड़ा भारी काम होता है। इसका मतलब ये बिल्कुल मत समझ लीजिएगा
कि परिवार साथ में होने पर मैं ही खाना बनाता हूं। नहीं, पत्नी ही बनाती है। तब बना बनाया खाने को मिल
जाता है। तो करीब 15 दिन के अकेले रहने में कुछेक दिन दोस्तों के यहां, कुछेक दिन
दफ्तर, कुछेक दिन खुद बनाकर खाया। और कुछेक दिन नोएडा के सेक्टर 58 वाले इलाके के
कई किस्म के पराठे वाले के यहां खाया। कई तरह के पराठे की विशेषज्ञ दुकान पर ताजा
पराठे बनते हैं। और खाकर मुझे ठीक भी लगे। उन्हीं कुछेक दिनों में से एक दिन मैं
पराठे के लिए भुगतान करके पराठे के बनने, पैक होने का इंतजार कर रहा था। बगल में लगातार
बनते पराठे की तपन से पूरी तरह पक चुके साहब की तस्वीर लगा रहा हूं। उनके सामने
दिख रहा मोबाइल भी चमकता दिख रहा होगा। इसी फोन पर उन्होंने भी फेसबुक खाता खोल
रखा है। उन्होंने अपने साथियों को बड़े उत्साह से बताया कि देखो कितने लोग फेसबुक
फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजे हैं। फिर तुरंत ही सप्लीमेंट भी आ गया। उन्होंने अपनी
समझदारी दिखाते हुए कहा कि हम भला इनको दोस्त बनाएंगे। पाकिस्तान से फ्रेंड
रिक्वेस्ट आई है। इनको दोस्त बना लेंगे तो ये भला किस काम आएंगे। बम, बारूद ही
बेचेंगे हमको। धमाका करवाएंगे दिल्ली में और क्या। पराठों की तपन से पक चुके इन
साहब की बात सुनकर मुझे लगा कि क्या नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ की साड़ी, शॉल का
आदान, प्रदान- हिंदुस्तान, पाकिस्तान को एक कर पाएगा या रिश्ते सामान्य भी कर
पाएगा। ये भी लगा कि आभासी दुनिया की ये सामाजिकता कैसी भी हो भौतिक दुनिया की
कसौटी पर तो वैसे ही कसी जाएगी।