हमारी भारतीय राजनीति अद्भुत है कि यहां नेताओं के बड़ा या छोटा होने की कल्पना कभी भी उसके काम के आधार पर नहीं की जाती। यहां सिर्फ भावनाओं के आधार पर नेता छोटा या बड़ा हो जाता है। उसने क्या किया, कितना किया। इसकी चर्चा बड़ी कम होती है। अकसर पार्टी बड़ा बना देती है। जाति बड़ा बना देती है। धर्म बड़ा बना देता है। लेकिन, कितने नेता हैं इस देश में जो अपने काम के बूते बड़े बने हों। ये परंपरा कितनी गड़बड़ रही है इसे मैं कुछ बड़े उदाहरणों से जो मैं खुद जानता हूं या मेरे अनुभव में हैं। उससे ही बताने की कोशिश करता हूं। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी सबसे मजबूत प्रधानमंत्री रही हैं। और सब ये मानते रहे कि इंदिरा गांधी की नेतृत्व क्षमता का जवाब नहीं है। इंदिरा गांधी का चुनाव क्षेत्र रायबरेली रहा। रायबरेली विकास के मामले में देश के विकसित शहरों के सामने कहां ठहरता है इसके लिए किसी आंकड़े की जरूरत शायद ही हो। उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अभी की देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी कर रही है। सोनिया गांधी को कुछ भी करने के लिए किसी सहारे की जरूरत है। ये बात तो कोई भी मानने को तैयार नहीं होगा। बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बजट में भले यहां आती सुनाई देती हैं। लेकिन, उससे यहां के लोगों की जिंदगी कितनी सुधरती है ये रायबरेली में जाते ही समझ में आने लगता है। टूटी सड़कें, खराब बुनियादी सुविधाएं राज्य में सरकार लंबे समय से न होने का हवाला देकर सही ठहरा दी जाती हैं। फिर भी चुनावी चर्चाओं के जरिए वहां के लोगों की जो आवाज सुनाई दे रही है। वो यही है कि कुछ भी हो सोनिया गांधी का यहां से सांसद होना ही उन्हें वीआईपी दर्जा दे देता है। इसलिए वोट तो सोनिया गांधी के पक्ष में ही करेंगे। सोनिया गांधी के बेटे और अभी कांग्रेसी राजनीति के सबसे बड़े नेता, भविष्य के तौर पर प्रतिस्थापित किए जा रहे राहुल गांधी को दस साल हो गए हैं सांसद हुए। सीट वही है परिवार की पुरानी अमेठी सीट। अमेठी स्टेशन बढ़िया बना है। जगदीशपुर औद्योगिक क्षेत्र यहां गांधी परिवार की ही देन है। लेकिन, बेहद जरूरी बुनियादी सुविधाओं की खराबी को लेकर यहां भी राज्य सरकार में कांग्रेस के लंबे समय से न होने का ही हवाला दे दिया जाता है। ये भारतीय नेताओं की छवि का ही अद्भुत कमाल है कि आजादी के बाद से उन्होंने भावनाओं के आधार पर ही राजनीति की है। और काम बंट गया है कि सड़क, खड़ंजा, नाली राज्य सरकार बनवाए। सांसद केंद्रीय योजनाएं ही लाएगा। हांलाकि, देश के कितने बड़े नेता अपने संसदीय क्षेत्र में किस तरह की योजनाएं लाते रहे हैं ये भी शोध का विषय है।

मेरा पैतृक निवास प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र में आता है। विदेश मंत्री रहे राजा दिनेश सिंह से लेकर अब उनकी बेटी रत्ना सिंह यहां से सांसद हैं। प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र का हाल कोई भी देख ले और अंदाजा लगाने की जरूरत भी नहीं होगी कि इस क्षेत्र का कितना विकास हो पाया। बड़े-बड़े नेताओं की कर्मस्थली भले ही इलाहाबाद रही हो। लेकिन, एक हेमवती नंदन बहुगुणा के अलावा इलाहाबाद के लिए शायद ही कोई नेता बड़ा कुछ कर पाया हो। इलाहाबाद से बीजेपी के बड़े नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी भी तीन बार चुनाव
जीतकर संसद पहुंचे थे। ये रिकॉर्ड था। निस्संदेह जोशीजी ने इलाहाबाद में
कई बड़ी परियोजनाएं लाईं। अच्छा काम किया। लेकिन, वो सबके लिए सुलभ नहीं
थे। और वो अकसर बोल देते थे कि नाली, खड़ंजा के लिए सभासद से मिलिए। और यही
उन पर भारी पड़ गया। इसी तरह मुख्यमंत्री रहते वीर बहादुर सिंह ने काफी कुछ गोरखपुर के लिए किया। उनके अलावा किसने क्या किया। अपनी संसदीय क्षेत्र को अद्भुत बनाने का काम किया था कल्पनाथ राय ने। कल्पनाथ राय ने अपने मऊ संसदीय क्षेत्र को अद्भुत तरीके से संवार दिया और मऊ का तब का बना फ्लाईओवर दूसरे कई विकसित शहरों में भी नहीं बना दिखा था। लेकिन, उसी के बगल एक और बड़े नेता हुआ करते थे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर। उनकी भावनात्मक बड़े नेता की छवि ऐसी थी कि देश में कुछ भी बलिया अलग चंद्रशेखर का अपना देश जैसा होता था। और, कमाल की बात तो ये है कि जिले में कोई विकास कार्य न कराने वाले चंद्रशेखर ठसके से कहते थे कि मैं देश का नेता हूं मेरा काम एक जिले या संसदीय क्षेत्र की चिंता नहीं है। लेकिन, ऐसा कहते-कहते उनको याद ही नहीं रहा कि उनके चुनाव क्षेत्र में विकास की स्थिति चिंताजनक हो गई। उन्हीं की भावना आगे बढ़ाते हुए उनके बेटे नीरज शेखर भी चुनाव जीत गए। इस बार भावना थोड़ी टूटी है ऐसा कहा जा रहा है। लेकिन, भावना कितनी टूटी है ये चुनाव बाद ही पता चलेगा। ये दरअसल मेरे आसपास के कुछ उदाहरण हैं। हो सकता है कुछ पूरी तरह सही हों, कुछ आधे। लेकिन, आम भावना यही है। देश के और दूसरे हिस्सों के ऐसे उदाहरण बताने के लिए मुझे तथ्यात्मक खोजबीन और करनी होगी। लेकिन, महत्व इस बात का नहीं है कि देश में ऐसे और कितने उदाहरण हैं। लेकिन, ये प्रचलन रहा है कि बड़ा नेता तो सिर्फ भावना पर ही चुनाव जीतता रहा है।

आज ये बात मैं जिस संदर्भ में कर रहा हूं, उस पर आता हूं। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी वाराणसी से नामांकन कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी की बड़ी आलोचना ये है कि वो बनारस सिर्फ मतों के ध्रुवीकरण के लिए आ रहे हैं और फिर चुपचाप वड़ोदरा लौट जाएंगे। हालांकि, मेरे पास जितनी समझ और संघ, बीजेपी से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर जानकारी है, वो यही है कि मोदी वड़ोदरा छोड़ेंगे और बनारस में ही रहेंगे। खैर, ये सब तो हुई कयास की बातें। लेकिन, असल बात है नरेंद्र मोदी का नामांकन से ठीक पहले लिखा गया ब्लॉग। इस ब्लॉग में जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने नए बनारस की कल्पना की है वही मुझे नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक हिस्सा लगता है। ब्लॉग पूरा पढ़ेंगे तो आप लोग भी समझ जाएंगे। मैं सिर्फ कुछ मोटी बातों का जिक्र कर रहा हूं। बाबा विश्वनाथ के बिना तो ये शहर है ही नहीं। इस देवभूमि का हर निवासी अपने अंदर कहीं न कहीं देवत्व लिए हुए है। मोदी आगे लिखते हैं कि बनारस को विश्व की सांस्कृतिक धरोहर का शहर बनाएंगे जो धार्मिक आस्था रखने वालों और सांस्कृतिक चेतना वालों को समाहित करेगा। आगे गंगा को मां की तरह पूजने, साबरमती की तरह पर्यटन से जोड़ने की भी बात है। ब्लॉग में बुनकरों की बात है, उन्हें विश्वस्तरीय कारोबारी सुविधाएं देने की बात है, बिस्मिल्लाह की बात है। मोदी ने उम्मीद जताई है कि बनारस और पूर्वांचल के विकास की। बतकही के बूते पहचान बनाने वाला उत्तर प्रदेश का ये हिस्सा बतकही करते कब विकास में एकदम पिछ़ड़ गया। इसका अंदाजा ही यहां के लोगों को नहीं लगा। उम्मीद करते हैं कि यही मोदी सांसद और प्रधानमंत्री के तौर पर भी बने रहेंगे। 2007 में नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने ब्लॉग लिखा था कि 2014 में प्रधानमंत्री की दावेदारी में नरेंद्र मोदी सबसे आगे रहेंगे।