जर्नलिज्म में एक्सलेंस का मतलब क्या है। क्या हम एक्सलेंट जर्नलिज्म कर रहे हैं। रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड्स दिए गए और अवॉर्ड्स के बाद हुए पैनल डिस्कशन में सबने एक-दूसरे से यही सवाल पूछा या यूं कहें कि खुद को कसौटी पर कसने की कोशिश की। उस मंच पर एक साथ बड़े-बड़े पत्रकार बैठे हुए थे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को चलाने वाले लोग थे। कुछ ऐसे थे जो, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों में ही अपनी अच्छी छाप छोड़ चुके हैं।

एक्सलेंट ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट का अवॉर्ड पाने वाले राजदीप सरदेसाई के साथ बरखा दत्त बहस को चला रही थीं। इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता, द हिंदू के एन राम, टाइम्स ग्रुप के रवि धारीवाल जैसे दिग्गज मंच पर थे। तो, अखबारों-टीवी चैनलों की सुर्खियां बनने वाले बड़े-बड़े नेता बहस को सुनने वालों में थे। बहस की शुरुआत ही इसी से हुई कि क्या बाजार टीवी चैनलों या पूरे मीडिया को ही इस तरह से चला रहा है कि उसमें इस बात की कोई जगह ही नहीं बची है कि एक्सलेंट जर्नलिज्म किया जा सके। या फिर बदलते जमाने के साथ जर्नलिज्म के पैमाने भी बदल रहे हैं और इसी दौर की वजह से मीडिया भटका हुआ दिख रहा है। एक सवाल और था कि क्या सीरियस जर्नलिज्म बिकता नहीं या फिर सीरियस जर्नलिज्म के नाम पर सिर्फ ऐसा हो रहा है जिससे दूरदर्शन के जमाने से आगे निकलने की गुंजाइश ही नहीं बन पा रही है। बरखा दत्त ने तो, द हिंदू के एन राम से सवाल भी कर दिया कि आपको कैसा लगता है जब कोई ये कहता है कि हिंदू सम्मानित अखबार है लेकिन, बोरिंग है। लेकिन, बहस का रूप तब बदल गया जब राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम बीच में सवाल पूछते हुए मंच पर ही टेक लगाकर बैठ गए।

कलाम ने मीडिया के दिग्गजों से सिर्फ एक ही सवाल पूछा कि क्या वो देश के लोगों को ऊपर उठाने में कोई मदद कर पा रहे हैं। क्या वो गरीब रेखा के नीचे बसने वाले देश के बाइस करोड़ लोगों को ऊपर उठाने के लिए भी कोई खबर दिखाते हैं। कलाम ने A+B+C पर मीडिया को काम करने की सलाह दी। A यानी देश की जीडीपी, देश के विकास में मीडिया का योगदान, B यानी देश की बाइस करोड़ जनता जो, गरीबी रेखा से नीचे है, उनके लिए मीडिया क्या कर सकता है और C जो, कलाम ने सबसे जरूरी बताया वो, ये कि देश में वैल्यू सिस्टम को बनाए रखने में मीडिया की भूमिका। सवाल जायज था लेकिन, मीडिया के दिग्गजों में से किसी से भी इस बात का जवाब देते नहीं बना। हां, पंकज पचौरी ने बेतुका सवाल जरूर कर डाला कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग न तो अखबार पढ़ते हैं और न ही टीवी देखते हैं। और, शायद यही बेतुका सवाल सारी बहस का मूल था कि हम अखबार या टीवी कारोबार के लिहाज से चला रहे हैं इसलिए नहीं कि हम लोकतंत्र के चौथे खंभे हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि हम समाज को आगे बढ़ाने में मदद करें। एक्सलेंसी का मतलब भी यही है कि हम सिर्फ अपना ही नहीं अपने आसपास के जीवन स्तर को भी उठाने में कुछ मदद कर सकें। शायद यही वजह है कि मीडिया का प्रभाव तो लोगों पर खूब पड़ रहा है लेकिन, मीडिया की विश्वसनीयता और मीडिया का सम्मान खत्म हो रहा है।

बहस को चला रहे सर्वश्रेष्ठ टीवी जर्नलिस्ट राजदीप सरदेसाई भी कलाम के सवाल का जबाव नहीं दे सके। यहां तक कि जब किसी ने उनसे सवाल पूछ लिया कि ibn7 पर आखिर भूत-प्रेत या फिर इस तरह की ही टीआरपी वाली खबरें दिखाकर कौन सा एक्सलेंस इन जर्नलिज्म किया जा रहा है। तो, उन्होंने अपना बचाव ये कहकर किया कि वो दूरदर्शन के जमाने का बोरिंग जर्नलिज्म करने के लिए नहीं आए हैं। टीआरपी से कब तक चैनल चलते रहेंगे जब ये सवाल बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने किया तो, राजदीप ने उल्टे ये कहकर कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला से ही ये सवाल कर डाला कि आप चैनल लाने जा रहे हैं क्या आप खुद को टीआरपी की दौड़ से दूर रख पाएगे। राजीव शुक्ला टीआरपी की दौड़ से दूर रहने का साहस तो नहीं दिखा पाए। लेकिन, राजीव शुक्ला ने बड़ी काम की बात कही जो, घंटी बांधने की शुरुआत हो सकती है। राजीव शुक्ला ने कहा कि टीवी न्यूज को टीआरपी से बाहर होना चाहिए। टीआरपी का चक्कर एंटरटेनमेंट टीवी के लिए ही हो। शायद एक्सलेंस इन जर्नलिज्म की शुरुआत यहीं से हो सकती है। क्योंकि, टीआरपी के भय से ही कभी भी कोई भी हिंदी चैनल लगातार चार-पांच घंटे तक या शायद फिर दिन भर भूत-प्रेत-आत्मा-हवेली में घुंघरू की झनकार-हत्यारा प्रेमी/प्रेमिका-हिला देना वाला खुलासा-टीवी की अब तक की सबसे सनसनीखेज खबर-टेलीविजन इतिहास में पहली बार-14 साल के गांव के बच्चे में अमेरिकी वैज्ञानिक की आत्मा, जैसे शीर्षकों से खुद को बेचने की कोशिश करता रहता है।

इसी टीआरपी की वजह से टीवी इस्तेमाल भी हो रहा है। कोई राखी सावंत और मीका कई हफ्तों तक टीवी की सबसे बड़ी सुर्खी बने रहते हैं। और, साफ है कि दोनों ने पब्लिसिटी के लिए ये काम किया नहीं तो, एक दूसरे के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाए हर सार्वजनिक मंच पर उसी बात को उछालने की कोशिश क्यों करते। उदाहरण एक नहीं है। ताजा उदाहरण है टीवी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी और उसके पति राजा का। राजा ने पत्नी श्वेता से मारपीट की। ये पता लगते ही सारे टीवी चैनल वाले पहुच गए। राजा की प्रतिक्रिया लेने। क्योंकि, प्रतिक्रिया मिलने तक टीवी एंकर को बिना किसी अच्छी बाइट या विजुअल के ही उस खबर को कई घंटे तक खींचना पड़ता। राजा ने पत्रकारों को बेइज्जत किया। बस सबके लिए अच्छा मसाला हो गया। बाद में फ्लॉप टीवी एक्टर राजा ने कहा कि उसने मीडिया को अपनी पब्लिसिटी के लिए इस्तेमाल किया। इस पर भी टीवी वाले नहीं माने, ये भी जमकर चलाया।

टीआरपी की ही वजह से गड्ढे से निकलकर प्रिंस लोगों की आंखों का तारा बन गया। उसके बाद पता नहीं कितने प्रिंस गड्ढे में ही दफन हो गए। लेकिन, टीआरपी के भूखे टीवी चैनलों का कैमरा तभी गड्ढे पर स्थिर हो पाता है। जब कोई गड्ढे में दफन होने के लिए तैयार हो। या फिर गड्ढे से इस तरह निकले कि बस मौत के मुंह से निकला हो क्योंकि, इससे पहले टीआरपी नहीं बनती। वरना, क्या टीवी चैनलों को इस पर स्टोरी नहीं करनी चाहिए कि देश भर में इस तरह के गड्ढे कैसे मौत के कुएं बन रहे हैं। क्या किसी टीवी चैनल की हिम्मत है कि देश के एक भी ऐसे गड्ढे के, बिना किसी बच्चे के गिरे, बंद होने तक और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई तक अपना कैमरा उसी गड्ढे पर रखे रहे।

टीआरपी के चक्कर में टीवी चैनल टीवी पत्रकारों को बेकार भी बना रहे हैं। किसी भी बिकाऊ वीडियो पर न्यूजरूम में सिर्फ एक ही आवाज आती है सीधे चला दो। इसमें करना ही क्या है। चैनलों पर तो, आधे-एक घंटे तक देश के किसी भी हिस्से में लोगों को हंसा रहे राजू श्रीवास्तव या फिर कोई दूसरा कॉमेडी कलाकार लाइव कटा रहता है। उससे छूटे तो, कहीं कोई सुंदर बाला देह दर्शना नृत्य या कृत्य कर रही हो तो, उसे लाइव काट दीजिए। कुछ एक न्यूज चैनल में तो, कुछ प्रोड्यूसर इसीलिए रखे जाते हैं कि उन्होंने एंटरटेनमेंट चैनलों को ध्यान से देखा उसको रिकॉर्ड कराया। उसके बीच-बीच में तीस-चालीस सेकेंड के कुछ लच्छेदार एंकर लिंक डाले और 9 मिनट का ब्रेक मिलाकर तीस मिनट का बढ़िया टीआरपी वाला बुलेटिन तैयार कर डाला। अब इस जमात के बीच में एक्सलेंस इन जर्नलिज्म कैसे निकलकर आ सकता है।

जर्नलिज्म में एक्सलेंस की शुरुआत वही लोग कर सकते हैं। जो, रामनाथ गोयनका के नाम पर दिए जा रहे एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड के मौके पर इस बहस में शामिल थे। और, वो एक्सलेंट जर्नलिज्म कर भी रहे हैं। लेकिन, बाजार के दबाव में उनके काम करने की वजह से उनके साथ आने वाली नई पीढ़ी के जर्नलिस्ट शायद एक्सलेंस के मायने अलग समझने लगे हैं। बहस की शुरुआत में ही शेखर गुप्ता ने कहा कि अखबार या टीवी चैनल ऐसा होना चाहिए जिसमें रोटी-दाल-चावल-सब्जी-अचार-मसाला सबकुछ हो। लेकिन, क्या कभी भी किसी खाने की थाली में अचार या मसाला सबसे ज्यादा हो सकता है। तीखा से तीखा खाने वाले भी दो-तीन मिर्च या छोटी कटोरी में अचार से ज्यादा नहीं पचा पाते। लेकिन, रोटी-दाल-चावल तो सबको पेट भरके चाहिए ही। और, एक्सलेंस इन जर्नलिज्म के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया सचमुच एक बड़ा उदाहरण है जो, बाजार और पढ़ने वालों की जरूरतों के लिहाज से खुद को लगातार एक्सलेंट बनाता जा रहा है। लेकिन, अंग्रेजी और अग्रेजी बिजनेस जर्नलिज्म (द इकोनॉमिक टाइम्स) में बेहतर काम करने वाला टाइम्स ग्रुप भी हिंदी (नवभारत टाइम्स) में ये काम नहीं कर पा रहा है। देश के सबसे बड़े हिंदी अखबारों दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर को अग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया से सबक लेना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया भी ज्यादातर इसी बात के लिए चर्चा में रहता है कि उसके दिल्ली या मुंबई टाइम्स या फिर सप्लीमेंट के रंगीन पन्नों पर सुंदर फोटो होते हैं। लेकिन, इसी के बीच जैसे-जैसे अखबार मजबूत(सर्कुलेशन के लिहाज से) और कमाऊ (विज्ञापनों के लिहाज से) बनता गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबरों की गुणवत्ता बेहतर होती गई। अब तो, शनिवार-रविवार के टाइम्स के अतिरक्त पन्ने इंडियन एक्सप्रेस को भी कई बार मात देते दिखते हैं। इसी रविवार को टाइम्स ऑफ इंडिया ने चौरी चौरा पर आधा पेज दे दिया था। टाइम्स ऑफ इंडिया चौरी चौरा में तो, शायद ही किसी घर में आता होगा या पूरे गोरखपुर मंडल में भी टाइम्स ऑफ इंडिया इतना नहीं बिकता होगा कि इसे छापा जाए।
इसलिए जरूरत इस बात की है कि हिंदी में भी टीवी न्यूज चैनल और अखबार इस दबाव से बाहर निकलें कि टीआरपी के लिए अपना मन मारकर शो चलाना ही पडेगा नहीं तो, मुकाबले में नहीं रह पाएंगे। क्योंकि, अगर टीआरपी और सर्कुलेशन के दबाव में टीवी-अखबार कुछ भी भौंडा सा चलाकर ये तर्क देकर बचते रहे कि लोग यही पसंद करते हैं। तो, फिर मीडिया में काम करने वालों को लोकतंत्र का चौथा खंभा समझने की गलती कोई क्यों करे। कोई क्यों मीडिया के लोगों का सम्मान करे। अगर ये बात बहस में शामिल एक्सलेंट जर्नलिस्ट्स की समझ में आती है तो, शायद एक्सलेंट जर्नलिस्ट की पुरानी जमात से बेहतर एक्सलेंट जर्नलिस्ट की नई जमात बन पाएगी। भूत-प्रेत और टीआरपी की खबरें दिखाने वाले टीवी चैनलों को चलाने वाले और उसमें काम करने वाले भी इससे ऊब चुके हैं और इस वजह से टीवी चैनलों में आई एक बड़ी जमात इससे भागने की भी तैयारी में है। 100 करोड़ से ज्यादा का देश है। टीवी चैनल और अखबार हिम्मत तो, करें देश में भूत-प्रेत-अपराध पसंद करने वाले टीवी देखने और अखबार पढ़ने वालों से कई गुना ज्यादा लोग अभी एक्सलेंट जर्नलिज्म को गुड बिजनेस बनाने के लिए तैयार हैं।


3 Comments

Sanjeet Tripathi · July 24, 2007 at 7:33 am

बढ़िया!!

कमल शर्मा · July 24, 2007 at 8:44 am

आपके ब्‍लॉग पर लिखी अब तक की बेहतर रिपोर्ट। इस रिपोर्ट पर अवार्ड मिलना चाहिए ढ़ेरों टिप्‍पणियों के रुप में।

गिरिजेश · July 25, 2007 at 8:00 pm

ये TRP वाला गाना तो आजकल खूब बज रहा है। चारो ओर। ‘हट जा ताऊ पाछे नै’ से भी ज्यादा हिट है। भाई हिमेश रेशमिया, इससे ज्यादा हिट गाना बनाकर दिखाओ जरा!
कल रात एक महफिल में था। ढेर सारे टीवी के पत्रकार। दारू। सिगरेट। खबरें। मेंहदी हसन। फ़ैज़। खबरों की क्वालिटी। पीनट्स। एक-आध शेर। नाग-नागिन। टीआरपी। कुछ ग़ज़लें। ओ बी वैन। एनडीटीवी की मजबूरी में ओढ़ी हुई शराफत। आज तक का हार्ड न्यूज से भटक जाना। राजू श्रीवास्तव..।
बीच में एक भाई ने तान छेड़ी- हम साला पत्रकार नहीं, टीआरपी मैनेजर हो गए हैं।
दूसरे ने फेडर डाउन किया- मौज करो। सब बम-बम है। पानवाला भी हमारी बात करता है। आईटी बीपीओ वाला भी। और हम भी हमारी बात करते हैं। ग़म किस बात का। सर छोटी बनाना, ड्राइव करना है..!
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।
आपने जो-जो कहा, सब सच है।

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