सब अलटा-पलटी हो गया है। एक अमेरिका के साथ परमाणु करार की बात ने देश के सारे राजनैतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। दुनिया के दादा अमेरिका की खिलाफत के मुद्दे पर देश में कुछ लोगों को ये भ्रम हुआ कि इस मुद्दे से देश का दादा बना जा सकता है। उसमें बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, अमर सिंह जैसे दलाल ! (ये अमर सिंह खुद स्वीकारते हैं कि ये काम वो सबसे बेहतर करते हैं और अब तो, बाकायदा सुर्खियां इसी से बनती हैं) से पटकनी खाए गुस्से से लाल करात और दलितों की मसीहा बहन मायावती सबसे आगे चल रहे थे।

देश का संवैधानिक दादा यानी प्रधानमंत्री बनने की इस इच्छा ने और कुछ किया हो या न किया हो। अलग-अलग राज्यों में बाहुबली सांसदों (असंवैधानिक दादाओं) का बड़ा भला कर दिया। और, इसमें मदद मिली अदालतों से। आप में से कितने लोगों को याद होगा कि अदालत से दोषी करार दिए गए लोगों को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए बात चल रही थी। लेकिन, जब देश में दादागिरी का मुकाबला चल रहा हो तो, भला छोटे-मोटे दादाओं के दुष्कर्म रोकने की चिंता भला किसे होती। बस यूपी-बिहार के दादा लोगों को जेल से सम्माननीय सांसद (लोकसभा में चुने जाने के बाद तो सम्माननीय ही हुए ना) की हैसियत से लोकसभा लाया गया।

और, इस अप्रत्याशित सम्मान से सबसे ज्यादा पलटी हुई है उत्तर प्रदेश में। मायावती जिन्हें मरवाना चाहती थीं (ऐसा भगोड़े अतीक अहमद ने पहली बार टीवी आने के बाद बोला था) अब वही अतीक अहमद हाथी पर सवार होकर लोकसभा में पिर पहुंचना चाहते हैं। जिससे कम से कम लोकतंत्र को बंधुआ बनाए रखकर उसके जरिए अपने दुष्कर्मों को जनता की इच्छा कहने का माद्दा बना रहे। मायावती के खासमखास मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी इलाहाबाद की नैनी जेल में मिलकर अतीक के साथ इलाहाबाद और आसपास की लोकसभा सीटों को जीतने की योजना बना रहे हैं। यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करने के बाद अतीक के सारे करीबीयों (इलाहाबाद के छंटे बदमाशों) पर मामले हल्के किए जा रहे हैं। मायावती जब सत्ता में आई तो, चिल्ला-चिल्लाकर सपा के जंगलराज और जंगलराज चलाने वाले बदमाशों के सफाए की बात कह रही थीं।

वैसे अब माहौल जरा बदल गया है। इसका अंदाजा सिर्फ दो नारों से लग जाता है–
यूपी विधानसभा चुनाव के समय बसपा कार्यकर्ता नारा लगाते थे—
चढ़कर गुंडों की छाती पे, मोहर लगेगी हाथी पे
जो, बसपा को नहीं चाहते थे वो, भी सपा को हराने के लिेए नारा लगाते थे —
पत्थर रख लो छाती पे, मोहर लगाओ हाथी पे

और, उत्तर प्रदेश का नया नारा है —
गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे

चलिए एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाशों की एक लिस्ट देखते हैं-
अतीक अहमद (फूलपुर, इलाहाबाद), मुख्तार अंसारी (गाजीपुर अब मऊ से विधायक), रघुराज प्रताप सिंह (विधायक, कुंडा, प्रतापगढ़), धनंजय सिंह (विधायक, रारी, जौनपुर), हरिशंकर तिवारी (हारे विधायक, चिल्लूपार, गोरखपुर)। इन पांचों की हैसियत ये है कि निर्दल चुनाव जीतते हैं या जीतने का माद्दा रखते हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने से पहले ये मुलायम के खासमखास थे। मुख्तार पर भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और अतीक अहमद पर बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप है। मायावती ने सत्ता में आते ही सबसे पहले इन्हीं लोगों की नकेल कसी। लेकिन, अब ये दोनों हाथी की सवारी की तैयारी में हैं। मुख्तार को मऊ से बसपा टिकट मिल रहा है।

कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह अपने प्रताप से प्रतापगढ़ की सीट भी समाजवादी पार्टी को जिता चुके हैं। अब राजा के भी कस-बल ढीले पड़ रहे हैं। सुनते हैं कि वो, भी मायाजाल में फंसना चाहते हैं। तो, मऊ से विधायक मुख्तार अंसारी के भाई गाजीपुर से सपा सांसद हैं। मायाजाल में फंसने वालों की लिस्ट में नया नाम है जौनपुर की रारी विधानसभा से विधायक धनंजय सिंह का। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान धनंजय गुंडई में पारंगत हुए। अब संसद में पहुंचना चाहते हैं जो, अकेले के बूते का नहीं लगता। इसलिए मायावती से हाथी (चुनाव चिन्ह) मांग रहे हैं। जौनपुर, लोकसभा सीट के लिए हाथी मिलना पक्का भी हो गया है। धनंजय को बहनजी की ही सरकार ने 50 हजार रुपए का इनामी बदमाश बनाया था।

एक जमाने में उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाश हरिशंकर तिवारी भी किनारे-किनारे से हाथी की सवारी कर रहे हैं। छोटा बेटा विनय शंकर भले ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे के हाथों हार गया। बड़ा बेटा भीष्म शंकर खलीलाबाद से, बसपा सांसद बन चुका है। अब बताइए मायावती गुंडों की बिग बॉस हुई या नहीं (दुर्भाग्य ये कि वो, देश के प्रधानमंत्री बनने की जबरदस्त दावेदार हैं)। दरअसल यही वो दीमक है जो, इस देश के लोकतंत्र को अंदर से काफी हद तक खोखला कर चुका है। देश का संवैधानिक दादा (प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री) बनने के लिए बड़े नेता जिस तरह के कुकर्म (जाने-अनजाने) कर गुजरते हैं। उसी पर खुद बाद में रोते भी रहते हैं। इन बदमाशों के पुनर्जीवन के लिए आखिर मायावती, लालकृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी कितने जिम्मेदार हैं। क्या इसका जवाब कभी खोजा जाएगा। और, ये कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, पूरे देश की है।


9 Comments

दीपक भारतदीप · August 24, 2008 at 8:20 am

आपको जन्माष्टमी की बधाई
दीपक भारतदीप

सुनीता शानू · August 24, 2008 at 9:50 am

हर्ष भैया सही बात है,यह कहानी पूरे देश की है,मगर एक ही बात समझ नही आती,हत्यारों को सजा भुगते हुए कैदीयों को नेता बनने का लाईसेंस कैसे मिल जाता है,और जनता भी बेवकूफ़ों की तरह चोर-उचक्कों को अपना नेता बना लेती है…

आपको जन्माष्टमी की बहुत-बहुत बधाई…

राज भाटिय़ा · August 24, 2008 at 10:23 am

जब तक हम सब अपने अपने वोट की कीमत नही समझे गे, जब तक हम अपने वोट नही डालेगे तब तक यही सब होता रहे गा, उठो ओर अपने वोट की किमत समझो, आप की एक एक वोट बदल सकती हे भारत की तस्वीर,
जन्माष्टमी की बहुत बहुत वधाई

siddharth tripathi · August 24, 2008 at 12:56 pm

जनता असहाय सी सब कुछ देख रही है, और क्षुद्र भीरुता या लालच में इन्हीं गुण्डों के सिर पर ताज सजाती रहती है। यह लोकतांत्रिक गणराज्य की प्रभुसत्ता का पूरी तरह से फेल होना नहीं तो और क्या?

समयचक्र - महेद्र मिश्रा · August 24, 2008 at 1:01 pm

सही बात है.आपको जन्माष्टमी की बधाई

हरि जोशी · August 24, 2008 at 1:12 pm

गुंडे हाथ, हाथी, साईकिल पर ही नहीं कमल के फूल में भी दुबक कर बैठे हैं। एेसी कोई गली नहीं, भागो जहां पर खड़ी नहीं। जब तक हम वर्ग आैर जातियों में बंटे रहेंगे, तब तक कोई समाधान भी नजर नहीं आता।

अभिषेक ओझा · August 24, 2008 at 5:21 pm

‘गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे”

ये नया फ्यूजन नारा अच्छा है ! नारे ही तो बदल रहे हैं… सरकार बदलने से स्थिति तो वही है !

vaidy1960 · January 12, 2009 at 4:27 pm

na ye thik nahi jab chunaw hote hai to hamara kitni ahuti hoti hai is yagya me ye wichar kare fir koshen in sabko…….mai bhatiya ji ke jyada najdik pata hu apne aapko.

dschauhan · August 19, 2009 at 12:23 pm

गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे! यथार्थ चित्रण! बधाई!

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