ज्यादा समय नहीं हुआ। सिर्फ एक दशक पहले की ही बात है। 1999 में मोहनराव भागवत से मेरी मुलाकात इलाहाबाद के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर हुई थी। भागवतजी तब RSS के सह सरकार्यवाह थे और संघ के अनुषांगिक संगठनों में विद्यार्थी परिषद से संवाद का जिम्मा उन्हीं के पास था। आधे घंटे की बातचीत में संवाद के जरिए निजी रिश्ते बना लेने की उनकी क्षमता से हम सारे लोग ही प्रभाव में आ गए थे। उनका जोर सिर्फ एक ही बात पर था कि समय के साथ बदलाव जरूरी है और नौजवान कैसे सोचता-समझता है उसके साथ तालमेल बिठाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है इसलिए जरूरी है कि विद्यार्थी परिषद की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उपस्थिति मजबूत रहे। करीब डेढ़ दशक बाद 1998 के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में परिषद की ताकत दिखी थी।

तब तक बीजेपी सत्ता में आ चुकी थी। और, देश के सर्वोच्च पद पर एक स्वयंसेवक के पहुंच जाने के दंभ की वजह से एक धारणा सी बनने लगी थी कि हमने वो किला फतह कर लिया। जो, केशवराव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय तय किया था। लेकिन, सच्चाई वो थी नहीं। सच्चाई तो ये थी कि संघ के विचारों के अनुकूल तैयार हुआ राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंचा था। काम बस इतना ही हुआ था। लेकिन, सत्ता के जरिए समाज में बदलाव का लक्ष्य बीजेपी को याद ही नहीं रह गया। और, संघ के याद दिलाने पर सरकार चलाने वाले दो वरिष्ठ स्वयंसेवकों- प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी- और संघ के बीच शीतयुद्ध सा शुरू हो गया था।


उस वक्त संघ के विचारों की बात करने वाले संघ के हर नेता को पहली स्वयंसेवक की सरकार में रोड़ा माना गया और सत्ता में होने की वजह से आडवाणी और वाजपेयी ये बात आसानी से स्थापित भी कर लेते थे। संघ सब कुछ समझते हुए भी सरकार और संगठन के बीच मध्यस्थ की भूमिका में खुद को लाने लगा। इस मध्यस्थता में संघ कार्यालयों पर लाल बत्ती गाड़ियों की कतारें तो लगने लगीं। लेकिन, झोला लेकर संघ के विचार बांटने वाला और चुनावों में बीजेपी की मतदाता सूची बांटने वाला स्वयंसेवक चुपचाप घर बैठने लगा।

2004 के चुनाव की हार का ठीकरा इंडिया शाइनिंग कैंपेन के मत्थे मढ़कर सत्ता सुख लेने वाले बीजेपी नेताओं ने आडवाणी को उसी तरह ढाल लिया। और, एक-एक कर आडवाणी के वो दिग्गज सिपहसालार गायब होते चले गए जो, संघ-बीजेपी के रिश्ते को असल में समझते थे। उसके बाद बड़ी जमात वो, भर आई जो, स्वयंसेवकों को एक बार का भोजन कराकर बीजेपी में अपना नाम थोड़ा ऊपर की लिस्ट में शामिल कराने की होड़ में लग गया। उस पर बीजेपी में अपना आधार बढ़ाने के लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बनने की होड़ लगने लगी। लौह पुरुष आडवाणी भी बहक गए। उसके बाद तो, घर की बुनियाद में लगी सीलन का असर पूरे घर पर ही होने लगा। और, अब जसवंत का जिन्ना प्रेम उन्हें पार्टी से बाहर करा गया।

अब एक बड़ी चर्चा ये भी होने लगी है कि क्या एक बार फिर से बीजेपी टूटेगी या नई बीजेपी बनेगी। अरुण शौरी जैसे नेता खुलेआम कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बीजेपी को टेकओवर कर लेना चाहिए। वैसे बीजेपी भले दिख रही है कि खत्म हो गई है लेकिन, सच्चाई यही है कि असल बीजेपी की जगह तो अभी भी पूरी है। लेकिन, ये जो अभी कांग्रेस के द्वितीय श्रेणी संस्करण वाली बीजेपी है शायद ही ये अब लोगों की भावनाओं को पूरा करने में सक्षम हो। इसीलिए भागवतजी साफ कह रहे हैं कि हमें बीजेपी से कोई लेना-देना नहीं है। वो, सलाह मांगेंगे तो हम देंगे। क्योंकि, सच्चाई भी यही है कि अगर संघ मजबूत रहा तो, बीजेपी जब चाहे जैसी मन चाहे खड़ी कर लेंगे।

वैसे भी ये अनायास नहीं है कि मोहनराव भागवत और केशवराव बलिराम हेडगेवार एक जैसे दिखते हैं। और, शायद संघ का दूसरा अध्याय मोहनराव भागवत के ही हाथों होना लिखा है। लेकिन, अब इस बीजेपी को जनसंघ की तरह बदलकर नई बीजेपी खड़ा करना थोड़ा मुश्किल और अव्यवहारिक दिखता है। अब तो, इसी बीजेपी को झाड़पोंछकर-ठोंकपीटकर सही करना होगा। लेकिन, इसके लिए संघ को बदलना होगा। बदलना होगा या यूं कहें कि संघ को अपने अंदर पैदा हो गए सत्ता के लोभियों को नमस्ते करना होगा। 1999 में बीजेपी और उसके अनुषांगिक संगठनों को श्रेष्ठ स्थिति में खड़ा करने वाले ज्यादातर लोग अब संघ और बीजेपी में उस जगह पर हैं जहां से बदलाव की गंगोत्री निकलनी है। भागवत साहब के लिए बड़ी चुनौती नई बीजेपी खड़ी करने से ज्यादा नया संघ खड़ा करना है। क्योंकि, मोहनराव भागवत जैसे स्वयंसेवक लोगों को कम नजर आ रहे हैं जिनका प्रभाव लोगों से निजी रिश्ते बनाने की क्षमता रखता हो।

पहले स्वयंसेवक-प्रचारक के चरित्र-सादगी की तारीफ विरोधी भी खुले मन से करता था। अब थोड़ी मुश्किल वहां खड़ी हो गई है। भागवतजी नौजवानों को समझने उनको साथ लेने के लिए जरूरी है कि नौजवानों को बदलाव दिखे। संघ में तो सबसे कम उम्र के सर संघचालक के तौर पर आपसे नौजवान जुड़ सकता है। लेकिन, बीजेपी से नौजवान कैसे जुड़ेगा। राहुल गांधी NSUI और युवक कांग्रेस में लोकतांत्रिक चुनाव की बात कर रहे हैं। और, यहां बीजेपी में आपसी जूतम पैजार मची हुई है। मैं बीजेपी को ठीक करने की बात अभी कह ही नहीं रहा हूं। संघ अपने मूल काम पर ही लगे। परिषद जैसे अनुषांगिक संगठन मजबूत हों
ये जरूरी है।

20 साल बाद हिमाचल प्रदेश में चिंतन बैठक में आडवाणी का ये कहना कि तब की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बीजेपी के लिए बदलाव का अहम पड़ा साबित हुई थी। और, ये चिंतन बैठक भी अहम पड़ाव साबित होगी। थोड़ा कम समझ में आता है। तब बीजेपी ने हिमाचल के पालमपुर से अयोध्या और शिवसेना से समझौते जैसे दो प्रस्ताव पास किए थे। अब तो, कोई ठोस प्रस्ताव तक नहीं आ पाया। 116 सांसद और 8 राज्यों में सरकार कहने-सुनने में बहुत शानदार दिखता है। लेकिन, घर की बुनियाद में सीलन आ गई है, दीमक भी है, कॉक्रोच भी पैदा हो रहे हैं। जसवंत सिंह को बीजेपी से निकालने का फैसला घर में कीड़े मारने वाले स्प्रे छिड़कने जैसा काम है। इससे कुछ नहीं होगा। संघ और बीजेपी दोनों का ही एक बार पूरा पेस्ट कंट्रोल होने की जरूरत है। भारतीय समाज, राजनीति और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये बेहद जरूरी है।

(ये लेख DNA के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

15 Comments

वेद रत्न शुक्ल · August 24, 2009 at 2:52 pm

बढ़िया विश्लेषण। अभी-अभी टीवी भी देख रहा हूं तो अरुण शौरी भाजपा को कटी पतंग बता रहे हैं। खैर, घबराने की जरूरत नहीं है ये जनाधारविहीन नेता चले जाएं तो ही अच्छा है। भले ही टीवी पर बहस करने वालों की संख्या कम हो जाए।

Suresh Chiplunkar · August 24, 2009 at 3:04 pm

सहमत, नई भाजपा तो बनानी ही होगी… कुलकर्णी जैसी फ़फ़ूंद भी छंट रही है, धीरे-धीरे और सफ़ाई होगी…

रंजन · August 24, 2009 at 3:24 pm

सही कहा आपने..

Babli · August 25, 2009 at 1:20 am

वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने! बिल्कुल सही फरमाया! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई !

Sudhir (सुधीर) · August 25, 2009 at 3:16 am

संघ के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का उचित विश्लेषण…

सौरभ शर्मा · August 25, 2009 at 5:45 am

मैं आपसे सहमत हूँ. आज युवाओं को संघ और भाजपा में कुछ भविष्य दिख ही नहीं रहा .
सूक्ष्म विश्लेषण के लिए बधाई ..

SHASHI SINGH · August 25, 2009 at 8:19 am

सही कहा भाई, फिजूल की उम्मीद पालते हुए अब जनता भी थक चुकी है। या तो भाजपा वैसी बने जैसी हो सकने की उम्मीद भर से नब्बे के दशक में उसके पीछे हुजूम चल रहा था या फिर खुद का कांग्रेस में विलय कर ले। हमारे मन से भी बोझ हल्का हो कि लो भई अब कुछ नहीं सकता।

बकबकिया · August 25, 2009 at 11:06 am

संजय कुमार मिश्र
बात तो आपकी सोलह आने सच है। भाजपा रूपी घर में सीलन आ चुकी है और कुछ लोग हैं जो इसे दीमक की तरह चाट रहे हैं। हकीकत तो यह है कि भाजपा सरीखा संघ भी हो गया है। पूर्णकालिक भ्रष्ट हो गए हैं और शाखाओं में जाने वाले जिम में जाने लगे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लोग अपनी देह तो बना रहे हैं लेकिन पार्टी को स्वाइन फ्ल्यू हो गया है।

Anonymous · August 25, 2009 at 2:34 pm

बहुत बढ़िया, असल में बीजेपी में सेकंड लाइन ऑफ अटैक बनाया ही नहीं.. एक व्यक्ति पर पार्टी चलाने से यही होता है..अटल जी के करिश्माई व्यक्तित्व ने सत्ता के शिखर तक पहुंचा दिया। लेकिन अब क्या जेटली साहब या सुषमा बहनजी में इतना प्रॉमिस दिखता है। आडवाणी जी तो अब जिंदगी भर पीएम इन वेटिंग बन ही गए हैं.. पूरा पेस्टकंट्रोल कर देना चाहिए.. जैसा शौरी साहब ने कहा न हलाल से काम नहीं चलेगा. झटका चाहिए..पूरी पार्टी खत्म होकर फिर खड़ी होगी तो शायद नई सोच नए तेवर या कम से कम नए और चरित्रवान नेता तो होंगे..

Rakesh Singh - राकेश सिंह · August 25, 2009 at 2:51 pm

अच्छा और सटीक विश्लेषण |

आपसे बिलकुल सहमत हूँ की संघ और भाजपा दोनों को आत्म चिंतन की आवश्यकता है | हमें सेकुलर भाजपा नहीं चाहिए, सेकुलर भाजपा और कांग्रेस मैं कोई खास अंतर है ही नहीं |

सागर नाहर · August 25, 2009 at 3:12 pm

सहमत, एकदम सहमत। परन्तु वेदरत्‍न जी की टिप्पणी से आशिंक असहमति। शौरी भले ही जनाधार विहीन नेता हों पर ऐसे लोगों को भाजपा बाहर निकाल कर और ज्यादा अपना नुकसान करेगी। अरूण शौरी के प्रति आम कार्यकर्ता/जनता के मन में बहुत सम्मान है।
व्यक्‍तिगत रूप से मुझे लगता है कि सुधीन्द्र कुलकर्णी भाजपा को बर्बाद करने भाजपा से जुड़े थे; अपना काम कर सही मौका देख कर खिसक लिये।

kshama · August 26, 2009 at 3:20 pm

बेहतरीन विश्लेषण है ..मै राजनीती में ज़्यादा रुची नही लेती हूँ ..हाँ ! देश में क्या चल रहा है , किन , नीतीओं का क्या असर है ,इसपे ज़रूर ध्यान रहता है …बल्कि, इस लिहाज़ से NGO s कहाँ और किसतरह से कार्य रत हैं,इन बातों में अधिक रूची रहती है..मेरे विचार से NGOs ही सरकार पे एक नियंत्रण का कार्य करते हैं!
अभी कुछ रोज़ पूर्व मुझे शमाजी का एक ब्लॉग दिखा ..जहाँ उन्होंने ' आतंक वाद ' के बरमे बड़े अभ्यास पूर्ण तरीक़े से लिखा है ..

blog ID है :

http://lalitlekh.blogspot.com

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी · August 27, 2009 at 4:45 pm

सारगर्भित लेख……बहुत बहुत बधाई….

Mrs. Asha Joglekar · August 29, 2009 at 3:23 pm

संघ और बीजेपी दोनों का ही एक बार पूरा पेस्ट कंट्रोल होने की जरूरत है। भारतीय समाज, राजनीति और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये बेहद जरूरी है।

बिलकुल सही कहा । अनुशासन जो संघ का चरित्र था अब कहाँ है ।

Rajaneesh Shukla Varanasi · September 1, 2009 at 8:11 am

अच्छा विष्लेषण है। यह वही कर सकता है जिसे संघ के कार्य पद्धति की समझ है। जो भाजपा के कर्यकर्त्ताधारित चरिर से परिचित है। इस लेख के साथ बस इतना याद र्हे कि ६७ मेम् पं० दीनदयाल उपाध्याय से यह प्रश्न हुआ था कि क्या सत्ता में जने के बाद जन संघ भ्रष्ट नहीं होगा तो उन्होने कहा था यदि एसा हुआअ तो हम इस जन संघ का विसर्जन कर देगें और एक नया जन संघ बनायेगें। यही भरतीय चिन्तन प्रणाली है, ईश्वर स्वयम् अपनी सृष्टि का विनाश कर नयी सृष्टि रचता है।
ईस प्रलय को भी सृजन पर्व के ऋप में स्वीकार करना ही आस्तिकता है।

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