देश के बड़े इलाके में बारिश की फुहारें लोगों को ठंडक देना शुरू कर चुकी हैं। महाराष्ट्र और दूसरे कुछ इलाकों में तो, लगातार हुई बारिश ने बाढ़ से माहौल बना दिए हैं। जून के आखिर तक आग के शोले सी गिरती गर्मी शायद ही किसी को इस समय याद करने का मन हो रहा होगा। लेकिन, यही समय है जब निश्चित तौर पर बीती गर्मी की सुध अच्छे से करनी चाहिए। भले ही गर्मी बीत गई हो लेकिन, बारिश की फुहारों के बीच भी जब सेब और लीची खरीदने जाएंगे तो, उसके दामों पर गर्मी का असर साफ-साफ दिखाई देगा। और, अगर इस बारिश और सर्दी में अगली गर्मी का पुख्ता इंतजाम हम सबने न शुरू किया तो, अगली गर्मी में ये लीची-सेब वैसे ही सिकुड़े मिलेंगे जैसे गर्मियों में आग के शोले के बीच हम-आप सिकुड़ते घूम रहे थे।
ये पर्यावरण दिवस पर मैं कोई रस्मी चिंता वाला लेख नहीं लिख रहा हूं। तापमान जिस तरह से 50 डिग्री सेल्सियम की तरफ बढ़ रहा है उसमें रस्म अदायगी भर से अब काम नहीं चलने वाला। बढ़ते उपभोक्तावाद के दौर में जिस तरह से हर कोई अपनी तरक्की और अपनी तरक्की यानी जेब में ढेर सारे पैसे के बूते सारी सहूलियतें खरीद लेने का सपना देख रहा है वो, खतरनाक है। जिस तरह से हम अपने संसाधनों को खोदकर खत्म कर रहे हैं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और ये सोचकर खुश हो रहे हैं कि जेब में पैसे रहे तो, सब ठीक हो जाएगा और खतरवाक दिशा में बढ़ रहा है। सोचिए देश के बड़े हिस्से में बिजली नहीं है। बिजली जहां है भी वहां जोरदार कटौती हो रही है। मांग-आपूर्ति की खाई चौड़ी होती जा रही है। शहरों में 2-3 घंटे की बिजली कटौती होने पर इनवर्टर के सहारे खुद को गर्मी के प्रकोप से बचाने की कोशिश अब बेकार होती दिख रही है। अब दिल्ली और उससे सटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक के शहरों में बिजली की कटौती इतनी होने लगी है कि अब पसीने से डूबे लोग अकसर ये कहते मिल रहे हैं कि इनवर्टर बोल गया है। दिल्ली-NCR के पानी में जहरीले रसायन की बात अब वैज्ञानिक तथ्यों के साथ सामने आ रहे हैं। हर दूसरे दिन काले-पीले पानी की सप्लाई पर दिल्ली-NCR में बवाल की खबरें सारी गर्मियां सुर्खियों में रहीं। अब बारिश का पानी आने के साथ शायद काली पड़ चुकी यमुना कुछ उज्ज्वल हुई होगी। दूसरी नदियों में थोड़ा पानी बढ़ा होगा। कई जगह बाढ़ भी दिखने लगेगी और शायद लोगों को गर्मी में नदी की चिटकी तलहटें याद भी नहीं रह जाएंगी।

लेकिन, पर्यावरण के साथ खिलवाड़ की भयावहता के ये खतरनाक लक्षण अभी दिखने शुरू हुए हैं। बढ़ती गर्मी से पानी घट रहा है। गंगोत्री के ग्लेशियर पिघलने और देश की बड़ी नदियों में पानी घटने की अकसर चर्चा होने लगी है। गर्मी के मौसम में मैदान से भागकर पहाड़ घूमने जाने वालों को शायद अभी आसानी से बात समझ में नहीं आ रही होगी क्योंकि, मसूरी की पहाड़ी पर शाम अभी भी सुहानी हो जाती है। मसूरी से 18 किलोमीटर नीचे पहाड़ों के बीच से निकलते झरने की वजह से मशहूर कैम्पटी फॉल के झरने की पतली धार की चिंता भी शायद अभी कम ही लोगों को होती होगी। इस बार गर्मियों में जब मैं कैम्पटी फॉल गया तो, झरने में नहाया नहीं। मेरे घुटनों से भी कम पानी था। एक धारा पूरी तरह से सूख गई थी। गिर रही दो धाराओं का भी पानी कम हो गया था।

मसूरी में कुछ साल तक कमरे की छत में पंखे टांगने के लिए चुल्ले लगाए ही नहीं जाते थे। लेकिन, तेजी से बन रही इमारतों में अब चुल्ले लगने लगे हैं। हद तो ये है कि देहरादून से मसूरी की चढ़ाई शुरू होते ही डीलक्स एयरकंडीशनर कमरों के बड़े-बड़े होर्डिंग भी खूब दिखने लगे हैं। देहरादून में गर्मी में शायद की किसी कार का शीशा खुला दिखाई दे। दिल्ली, नोएडा की ही तरह कारों में एसी चलाना पहाड़ों में भी शुरू हो गया है। इस गर्मी का ही असर था कि जिम कार्बेट नेशनल पार्क के अंदर की नदी का पानी कई-कई जगह सूख गया था। गाइड जानवरों के दिखने की पुरानी घटनाओं को बताकर ही अपना काम चला रहे हैं। अब ऐसी गर्मी में सूखते जिम कार्बेट के जंगलों में कितने समय तक जंगली जानवर बचे रहेंगे ये सोचने की बात है।

इस गर्मी में शिमला का तापमान 34 डिग्री तक पहुंच गया। शिमला का तापमान 34 डिग्री पहुंचने से इस बार गर्मियों में मैदान से वहां पहुंचे सैलानी तो निराश हुए ही। लेकिन, मामला इतना हल्का नहीं है। शिमला का तापमान 34 डिग्री पहुंचना कितना खतरनाक है इसका अंदाजा दो खबरों से लगाया जा सकता है। दोनों खबरें दो फलों के उत्पादन से जुड़ी हुई हैं। लीची और सेब का उत्पादन। लीची का उत्पादन इस साल आधा रहने की आशंका जताई जा रही है। पिछले साल 4.48 लाख टन लीची हुई थी। इस साल ये सिर्फ 2.24 लाख टन रह सकती है। कुछ ऐसी ही खबर सेब उत्पादन के मोर्चे पर भी आ रही है। ये गेहूं, चावल के उत्पादन जैसी खबर नहीं है कि इस साल बारिश कम ज्यादा हुई अगले साल संतुलित हुई तो, उत्पादन बढ़ जाएगा।

दरअसल सेब और लीची दोनों का उत्पादन घटने की सबसे बड़ी वजह बढ़ती गर्मी है। ये दोनों फल पहाड़ों पर होते हैं। इनके होने के लिए ठंडे मौसम का होना बेहद जरूरी है। पहाड़ों में हुई कम बारिश और ना के बराबर हुई बर्फबारी ने इन फलों के लिए अनुकूल परिस्थितियां ही नहीं बनाईं। इस वजह से धीरे-धीरे इन फलों के उत्पादन का क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। सेब का उत्पादन क्षेत्र हर एक डिग्री तापमान बढ़ने पर 300 मीटर ऊपर की ओर खिसक जा रहा है।

सेब और लीची के उत्पादन के आंकड़े सीधे-सीधे सुनने में भले ही डरावने न लगें लेकिन, इन आंकड़ों से डरने की जरूरत है। धरती का पानी सूख रहा है। पेड़ इमारत सड़क बनाने के लिए कटते जा रहे हैं। बचे पेड़ों को बचाने भर का भी पानी धरती के गर्भ में बमुश्किल से ही है। खराब से खराब परिस्थिति में खुद को संभालने का आशावादी जुमला है कि बीती ताहि बिसारिये आगे की सुध लेय। लेकिन, शायद पर्यावरण के साथ जितना खिलवाड़ हम कर चुके हैं उसमें ये जुमला आशा नहीं निराश के गर्त में ले जाएगा। इसलिए इस बारिश की फुहारों के बीच गर्मी की तपिश याद कीजिए। पानी बचाइए, पेड़ बचाइए। वरना अगली गर्मी के बाद ये फुहारें कितनी कम मिलेंगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।


5 Comments

Udan Tashtari · June 24, 2010 at 3:06 pm

पानी बचाइए, पेड़ बचाइए-यही नारा है!!

प्रवीण पाण्डेय · June 24, 2010 at 3:10 pm

आपकी द्वारा व्यक्त स्थिति एक भयावह सत्य है । उपाय कठोर ही होगा ।

भुवन भास्कर · June 25, 2010 at 8:28 am

बहुत सही बात है। लेकिन मुझे लगता है कि यह भी प्रकृति की ही गति है। डब्ल्यूटीओ और यूएनएफसीसीसी की बैठकों में चलने वाली राजनीति का हाल देखिए, तो समझ में आ जाएगा कि हमारी पृथ्वी किस निश्चित सत्य से मुलाकात करने जा रही है। इसके बावजूद मैं इस बात से बिलकुल सहमत हूं कि एक व्यक्ति (इकाई) के तौर प्रकृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में हमें कोई कोताही नहीं करनी चाहिए।

Rakesh Singh - राकेश सिंह · June 25, 2010 at 4:10 pm

बिलकुल सही नारा है – पानी बचाइए, पेड़ बचाइए. पर वाशिंग मशीन, डिस वाशर, टब और अपने अपार्टमेन्ट काम्प्लेक्स के स्विमिंग पुल के रहते पानी बचाएं कैसे? फ्लैट में रहते पेड़ कैसे बचाएं, फ्लैट सैकड़ों पेड़ कट कर ही तो बने हैं. टिसू पेपर/टॉवेल धीरे धीरे रुमाल को अप्रसांगिक बना रहा है. अब तो चाय-कोफ़ी भी पेपर कप में ही दिया जाने लगा है ….

आवहिं काल विनाशाय बुद्धि.

काजल कुमार Kajal Kumar · June 25, 2010 at 10:33 pm

हिमाचल के उना में कभी पहले हमने 45-46 डिग्री से. पारा चढ़ते नहीं सुला था

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