ये कल्पना से बाहर की बात थी। भला ये कैसे सोचा
जा सकता है कि सोनिया गांधी हिंदी पर महान विचारक हो सकती हैं। वो भी केंद्र सरकार
के अधीन एक सरकारी कंपनी के अतिथि विश्राम गृह में। शिमला में एनएचपीसी के अतिथि
विश्राम गृह के तीनों तलों पर सीढ़ियों की शुरुआत में एक विचार पट्टिका लगी हुई
है। 
सबसे पहले मेरा ध्यान मुंशी प्रेमचद के विचार पर गया। अच्छा लगा कि सरकारी
कंपनी के अतिथि गृह में इस तरह के सद्विचार लिखने का यत्न किया है। लेकिन, एक
दूसरी ऐसी ही सद्विचार वाली तख्ती पर नजर पड़ी तो पहले उस कहे को कहने वाले से मैं
जोड़ने में थोड़ा असहज हुआ। 
उसके बाद में सोचने लगा कि आखिर सोनिया गांधी के ये
विचार किस हैसियत से एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखे हुए हैं। अब
जरा सोचिए कि क्या बीजेपी के किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष के विचार ऐसे किसी सरकारी
कंपनी के अतिथि गृह में लिखे जा सकते हैं। अभी के संदर्भ में सोचिए तो बीजेपी
पूर्ण बहुमत से केंद्र की सरकार में है। अब अगर सरकारी कंपनियों के दफ्तरों और
अतिथि गृहों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का कहा सुविचार के तौर पर ऐसे चिपका दिया
जाए तो कैसा लगेगा। सुविचार का बड़ा मतलब होता है। इस मतलब को ही सोनिया गांधी का
हिंदी पर कहा और एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखा होना ध्वस्त कर
देता है। कमाल ये भी है कि कांग्रेस की अब सरकार भी नहीं है फिर भी वो तख्ती वहां
शोभा दे रही है। 
इसके बाद तो और कमाल हो गया। कोई जानसन साहब हैं उन्होंने भी कुछ
कहा है कि जिसको एनएचपीसी ने अपने अतिथि गृह में लिखना जरूरी समझा है। 

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